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परिवहन विभाग को मिल सकता है ट्रैफिक चालान से मुकदमों को निपटाने का अधिकार

कानून मंत्री का ये सुझाव, लॉ कमीशन की उस रिपोर्ट के परिपेक्ष्य में है जिसमें अदालतों में लंबित मामलों का ब्यौरा और उससे निबटने के लिए जरुरी कदम उठाने का सुझाव दिया गया.

नई दिल्ली: मुमकिन है कि आने वाले दिनो में ट्रैफिक चलान से जुड़े मामलों को निपटाने के लिए अदालत के चक्कर नहीं लगाने पड़े. अदालतों मे अटके मुकदमों की अंबार देखते हुए सरकार इस बारे मे जरुरी कदम उठाने की तैयारी में है.

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को लिखी एक चिट्ठी में ट्रैफिक चलान से जुड़े अटके मुकदमों से निबटने का मसौदा पेश किया है. इसके मुताबिक, “मोटर व्हीकल एक्ट 1988 में फेरबदल कर कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में बदलाव और ट्रैफिक चलान से जुड़े मुकदमों को निबटाने के लिए राज्य सरकारों के परिवहन विभाग को अधिकार दिए जाने का सुझाव है.” कानून मंत्रालय का मानना है कि ऐसा किए जाने पर अदालतों पर बोझ तो घटेगा ही, ट्रैफिक चालान से जुड़े मामलों को जल्द से जल्द निबटाने में मदद मिलेगी.

कानून मंत्री का ये सुझाव, लॉ कमीशन की उस रिपोर्ट के परिपेक्ष्य में है जिसमें अदालतों में लंबित मामलों का ब्यौरा और उससे निबटने के लिए जरुरी कदम उठाने का सुझाव दिया गया.

इस रिपोर्ट के मुताबिक, 2010-12 के दौरान देश के 14 उच्च न्यायालयों के तहत औसतन 92.24 लाख से भी ज्यादा मामले अटके हुए थे. इसमें ट्रैफिक चालान/पुलिस चालान की सख्या 34.52 लाख से भी ज्यादा थी. यानी अटके हुए मामलो मे केवल ट्रैफिक चालान/पुलिस चालान की हिस्सेदारी 37 फीसदी से ज्यादा थी. इसके बाद के ताजा आंकड़े तो अभी उपलब्ध नहीं है, लेकिन कानून मंत्रालय के अधिकारियों को कहना है कि संख्या बढ़ी ही है.

सरकार के लिए अदालतों में अटके मुकदमों की बढ़ती संख्या खासा चिंता का विषय है. The National Mission on Justice Delivery ad Legal Reforms के तहत उन क्षेत्रों की पहचान की जा रही है जहां मुकदमेबाजी काफई ज्यादा होती है. साथ ही ऐसी स्थिति से निबटने के लिए कानून में जरुरी बदलाव पर भी विचार किया जा रहा है. ऐसा ही एक क्षेत्र है मोटर व्हीकल एक्ट 1988 से जुड़े प्रावधानों के उल्लंघऩ के बाद जारी किए जाने वाले ट्रैफिक चालान.

लॉ कमीशन ने भी अपनी 245 वीं रिपोर्ट में कहा था कि अदालतो में भारी संख्या में ट्रैफिक चालान से जुड़े मामले अटके हुए हैं. कमीशन के मुताबिक, ऐसे मामले अदालतों का काफी समय लेते हैं जो उचित नहीं है. कानून मंत्रालय की राय है कि अटके मामलो की बढती संख्या की वजह ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के छोटे मोटे मामले जैसे रेड लाइट जंप करना, गलत जगह पर पार्किंग, सीट बेल्ट लगाए बगैर गाड़ी चलाना, तेज रफ्तार से गाड़ी चलाना वगैरह हैं. ये सभी अपराध ‘कंपाउडेबल (मतलब अदालत के बाहर निश्चित स्तर के अधिकारी द्वारा निबटाए जाने वाले)’ हैं.

कानून मंत्रालय का कहना है कि कुछ राज्य सरकारों ने मामलो को अदालत के बाहर ही निबटाने के लिए निश्चित स्तर के अधिकारियों को अधिकार दे ऱखा है, लेकिन कई राज्यों में ऐसी स्थिति नहीं है. नतीजा, ट्रैफिक चालान से जुड़े मामले अदालतों में पहुंचते हैं. अब दिक्कत ये है कि अदालतो मे संसाधन सीमित है और उनका एक हिस्सा छोटे-मोटे मामलों पर लगा दिया जाए तो ज्यादा महत्वपूर्ण मुकदमों को निबटाने पर असर पड़ता है.

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