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सैलरी, छुट्टी... घरों में काम करने वाले नौकरों के साथ नहीं हो सकेगी धोखेबाजी, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को दिया ये अहम आदेश

कोर्ट ने कहा कि घरों में काम करने वालों को बड़े पैमाने पर सुरक्षा नहीं मिलती. उन्हें कोई व्यापक कानूनी मान्यता नहीं मिलती, जिससे उन्हें अक्सर कम वेतन, असुरक्षित माहौल और लंबे समय तक काम करना पड़ता है.

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (29 जनवरी, 2025) को घरों में काम करने वाले नौकरों के लिए कोई कानूनी सिस्टम नहीं होने पर चिंता जताई और बेहद अहम टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि घरेलू कामगारों की मांग तेजी से बढ़ रही है फिर भी उनके शोषण और अधिकारों को लेकर कोई कानूनी संरक्षण नहीं है.

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच डीआरडीओ के पूर्व वैज्ञानिक अजय मलिक की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने बताया कि उन पर उनकी नौकरानी को बंधक बनाने और उसकी तस्करी करने के आरोप लगाए गए हैं. कोर्ट ने उन पर चल रहे आपराधिक मामले को खारिज कर दिया और ध्यान दिया कि घरों में काम करने वाले नौकरों के लिए कोई लीगल सिस्टम ही नहीं है.

बेंच ने कहा कि फिलहाल ऐसा कोई प्रभावी विधायी या कार्यकारी उपाय नहीं दिख रहा है जिससे कानून बनाया जा सके और देशभर में लाखों असहाय घरेलू कामगारों को राहत मिल सके. कोर्ट ने कहा, 'इस उत्पीड़न और बड़े पैमाने पर दुर्व्यवहार का साधारण कारण घरेलू कामगारों के अधिकारों और संरक्षण को लेकर कानूनी शून्यता है.' कोर्ट ने कहा कि भारत में घरेलू कामगारों को बड़े पैमाने पर सुरक्षा नहीं मिलती और उन्हें कोई व्यापक कानूनी मान्यता नहीं मिलती. अदालत ने कहा कि इसके परिणामस्वरूप उन्हें अक्सर कम वेतन, असुरक्षित माहौल और लंबे समय तक काम करना पड़ता है.

एडवोकेट राजीव कुमार दुबे के माध्यम से दायर अपनी याचिका में अजय मलिक ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था. शिकायतकर्ता का कहना है कि नौकरानी के ये कहने के बावजूद कि उसे गलत तरीके से बंधक नहीं बनाया गया था या याचिकाकर्ता ने उसकी तस्करी नहीं की थी, कोर्ट ने प्राथमिकी रद्द नहीं की. अजय मलिक का कहना है कि नौकरानी का विवाद उस एजेंसी से था, जिसने उसको काम पर रखवाया था.

बेंच ने कहा, 'यह निर्विवाद तथ्य है कि भारत में तेजी से हो रहे शहरीकरण और विकास को देखते हुए घरेलू कामगारों की मांग बढ़ रही है. हालांकि हाशिए पर पड़ी महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर खुलना खुशी की बात है, लेकिन हमें यह देखकर दुख हो रहा है कि उनकी बढ़ती मांग के बावजूद, यह अपरिहार्य कार्यबल शोषण और दुर्व्यवहार के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील रहा है.'

कोर्ट ने कहा कि उसकी राय में, घरेलू कामगार अक्सर हाशिए पर पड़े समुदायों जैसे कि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) से आते हैं और वित्तीय कठिनाई या विस्थापन के कारण उन्हें घरेलू काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है. बेंच ने इस मुद्दे पर विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मानदंडों और मानकों का हवाला दिया.

फैसला लिखने वाले जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कोर्ट ने न केवल घरेलू कामगारों की कमजोर स्थिति को स्वीकार किया है, बल्कि उन्हें अन्य मजदूरों के समान व्यापक सुरक्षा और समानता प्रदान करने का भी प्रयास किया है. फैसले में घरेलू कामगारों के अधिकारों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए विधायी ढांचे में कुछ हद तक खामियों की ओर संकेत किया गया.

कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया कि घरेलू कामगारों के शोषण और उनके अधिकारों की सुरक्षा को लेकर कानूनी संरक्षण नहीं होने के मद्देनजर उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए एक कानूनी ढांचा तैयार किया जाए. अदालत ने श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के साथ-साथ सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय तथा विधि एवं न्याय मंत्रालय को निर्देश दिया कि वे घरेलू कामगारों के अधिकारों के संरक्षण के वास्ते कानूनी ढांचे के लिए क्षेत्रीय विशेषज्ञों की एक समिति का संयुक्त रूप से गठन करें.

पीठ ने कहा कि विशेषज्ञ समिति का गठन केंद्र और उसके संबंधित मंत्रालयों के विवेक पर छोड़ दिया गया है. कोर्ट ने कहा, 'यह सराहनीय कदम होगा यदि समिति छह महीने की अवधि के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करे और इसके बाद भारत सरकार एक कानूनी ढांचा प्रस्तुत करने की आवश्यकता पर विचार कर सकती है जो घरेलू कामगारों के हितों और चिंताओं को प्रभावी ढंग से उठा सके.'

 

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