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स्टडी में दावा- कोरोना वायरस के स्वरूप सुपर-सेल में फैलकर एंटीबॉडीज से बच सकते हैं

न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडी ऐसी एंटीबॉडी होती हैं जो किसी संक्रमण से कोशिकाओं की रक्षा करने के लिए जिम्मेदार होती है.

बर्मिंघम: किसी वायरस से संक्रमित होने या उसे रोकने के लिए टीका लगाने के बाद हमारे शरीर में जो एंटीबॉडी बनती है, वह काफी शक्तिशाली हो सकती है. कोई वायरस आमतौर पर एक कोशिका में प्रवेश करके हमारे शरीर में फैलता है और अपनी प्रतियां बनाने के लिए इसे एक फैक्ट्री के तौर पर इस्तेमाल करता है, जो काफी हद तक फैल जाता है और संक्रमण फैलाने के लिए नयी कोशिकाओं को ढूंढता है.

हमारी एंटीबॉडीज इस वायरस को रोककर काम करती हैं और यह वायरस को हमारी कोशिकाओं में प्रवेश करने से रोकता है. लेकिन क्या होगा अगर वायरस को आसपास की कोशिकाओं तक फैलने के लिए कोशिका से निकलने की आवश्कयता नहीं होगी? क्या हमारी एंटीबॉडी इसके खिलाफ भी कारगर होगी?

वैज्ञानिकों ने हाल ही में सार्स-सीओवी2 के संबंध में यह सवाल पूछा जो कोविड-19 की वजह है. अत्यधिक संक्रामक कोरोना वायरस मानव कोशिकाओं में बदलाव कर सकता है. वह संक्रमित कोशिका को आसपास की कोशिकाओं के साथ जोड़कर उन्हें सुपर-सेल में बदल सकता है. आकार में सामान्य कोशिकाओं के मुकाबले बड़े होने और जेनेटिक मटेरियल में समृद्ध होने के कारण ये सुपर-सेल कोरोना वायरस के लिए बेहतरीन फैक्ट्री का काम करेंगी.

इस सुपर-सेल को सिंथिया भी कहा जाता है और एक से ज्यादा कोशिकाओं के आपस में जुड़कर बनने के कारण इनमें एक से ज्यादा केन्द्रक (कोशिका के भीतर जेनेटिक मटेरियल को सुरक्षित रखने वाला केन्द्र) और प्रचुर मात्रा में साइटोप्लाज्म (कोशिका झिल्ली) होती है.

एक बड़ी कोशिका में ज्यादा संख्या में केन्द्रकों और साइटोप्लाज्म की मौजूदगी के कारण कोरोना वायरस आसानी से विभाजन कर पाता है (अपनी संख्या बढ़ा पाता है). कोशिकाओं को आपस में जोड़कर सार्स-सीओवी-2 उसे मारने में सक्षम एंटीबॉडी के संपर्क में आए बगैर अपनी संख्या बढ़ा पाता है.

न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडी ऐसी एंटीबॉडी होती हैं जो किसी संक्रमण से कोशिकाओं की रक्षा करने के लिए जिम्मेदार होती है.

एलेक्स सिगल और उनके सहकर्मियों ने इस अध्ययन में कोरोना वायरस के दो स्वरूपों (अल्फा और बीटा) की एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक जाने और संचरण के दौरान उनके एंटीबॉडी के प्रति संवेदनशील होने की जांच की. सबसे पहले ब्रिटेन में पाया अल्फा स्वरूप एंटीबॉडीज के प्रति संवेदनशील (अर्थात एंटीबॉडी वायरस के इस स्वरूप से शरीर की रक्षा करने में सक्षम है) और दक्षिण अफ्रीका में पाया गया बीटा स्वरूप इन एंटीबॉडीज के प्रति कम संवेदनशील हैं.

इस अध्ययन में बताया गया है कि कोरोना वायरस के दोनों स्वरूप एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक संचरण के दौरान एंडीबॉडी से सफलतापूवर्क बच सकते हैं. यह दिखाता है कि अगर कोई वायरस शरीर में प्रवेश करता है तो उसे कोशिकाओं में खत्म करना ज्यादा मुश्किल होगा.

वायरस सदियों तक मनुष्यों और पशुओं के साथ रहते हैं तो वह हमारे प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा पहचाने जाने से बचने के तरीके ईजाद कर लेते हैं. यह माना जाता है कि एंटीबॉडीज मेजबान कोशिका में प्रवेश को रोकने के लिए सबसे प्रभावी हैं और शरीर के उन हिस्सों में कम प्रभावी हैं जहां संक्रमण पहले से मौजूद है.

क्या इसका यह मतलब है कि हमारे टीके उन वायरसों के खिलाफ अप्रभावी हैं जो एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक प्रवेश करते हैं?

‘टी’ कोशिकाएं श्वेत रक्त कोशिकाएं होती है जो टीकाकरण या संक्रमण के बाद संक्रमित कोशिकाओं को मार देती हैं. एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक वायरस के संचरण से उनके संक्रमण फैलाने की क्षमता कम नहीं होती. ये कोशिकाएं एंटीबॉडीज बनाने में भी सक्षम होती है. टी कोशिकाएं पुराने संक्रमण को याद रख सकती हैं और जब वही वायरस दोबारा हमला करता है तो वह तेजी से उसे रोकने का काम करती हैं.

उन लोगों में क्या होता है जो बुजुर्ग हो गए हैं या हमारे प्रतिरक्षा तंत्र के हिस्से बेकार हो गए हैं? कोरोना वायरस संक्रमण आम तौर पर युवाओं, स्वस्थ किशोरों और बच्चों में दो हफ्तों के भीतर नियंत्रित हो जाता है.

जिन लोगों में बेकार टी कोशिका होती है उनमें एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक संचरण न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज को रोक सकता है और संक्रमण लंबे वक्त तक रह सकता है.

हमें इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक संचरण हमारे टीकों को बेसर कर देते हैं लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि कोई वायरस कैसे फैलता है कि हम उसे अधिक प्रभावी तरीके से रोक सके.

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