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देश भर के मज़दूरों की जानकारी जुटाने पर SC ने केंद्र से मांगा जवाब, कहा- मदद असली ज़रूरतमंद तक पहुंचाना ज़रूरी

प्रशांत भूषण ने प्रवासी मजदूरों को नकद राशि देने की भी मांग की. उन्होंने कहा कि कुछ राज्य सिर्फ निर्माण क्षेत्र के मजदूरों को 1 से लेकर 6 हज़ार तक की धनराशि दे रहे हैं. लेकिन रिक्शा चलाने वाले, रेहड़ी पर व्यापार करने वाले जैसे तमाम लोग हैं, जो असंगठित क्षेत्र के दायरे में ही आते हैं.

नई दिल्ली: असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है. कोर्ट ने कहा है कि मजदूरों के बारे में पूरी जानकारी जुटाए बिना उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दे पाना कठिन है. कोर्ट ने कहा है कि सरकार को असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को राष्ट्रीय पहचान पत्र देने की दिशा में भी काम करना चाहिए. कोर्ट ने कहा है कि केंद्र 2 हफ्ते में इस बारे में किए जा रहे काम का ब्यौरा दे.

सुप्रीम कोर्ट ने यह बात कोरोना और लॉकडाउन के चलते प्रवासी मजदूरों को हो रही आर्थिक दिक्कतों पर सुनवाई करते हुए कही. कोर्ट ने आज सभी राज्यों से कहा कि वह मजदूरों के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया शुरू करें. इस बारे में जुटाया गया आंकड़ा केंद्र सरकार को भी उपलब्ध करवाएं. इससे मजदूरों का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार किया जा सकेगा.

राज्य दें मज़दूरों को राशन

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अशोक भूषण और एम आर शाह की बेंच में आज यह भी कहा कि प्रवासी मजदूरों को राशन उपलब्ध करवाना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है. इसके लिए वह केंद्र सरकार की आत्मनिर्भर योजना या किसी भी और योजना का इस्तेमाल कर सकते हैं. कोई मजदूर भले ही उस राज्य के निवासी न हो, लेकिन उसे राशन देने से मना न किया जाए. उस पर कोई पहचान पत्र दिखाने का दबाव भी न बनाया जाए.

मुफ्त भोजन देने का आदेश

इसी मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 13 मई को दिल्ली और उसके नजदीकी शहरों में मजदूरों को राशन देने और उन्हें 2 समय का भोजन देने के लिए सामुदायिक रसोई चलाने का आदेश दिया था. आज कोर्ट ने इस आदेश को सभी राज्यों पर लागू कर दिया. कोर्ट ने कहा कि राज्य प्रवासी मजदूरों को भोजन देने के लिए बड़े पैमाने पर सामुदायिक रसोई शुरू करें. इस तरह की रसोई के स्थान, भोजन मिलने का समय जैसी जानकारियों का व्यापक प्रचार करें, ताकि जरूरतमंदों को सुविधा मिल सके.

मज़दूरों को आर्थिक मदद देने पर सवाल

मामले में एक आवेदनकर्ता की तरफ से पैरवी कर रहे वकील प्रशांत भूषण ने प्रवासी मजदूरों को नकद राशि देने की भी मांग की. उन्होंने कहा कि कुछ राज्य सिर्फ निर्माण क्षेत्र के मजदूरों को 1 से लेकर 6 हज़ार तक की धनराशि दे रहे हैं. लेकिन रिक्शा चलाने वाले, रेहड़ी पर व्यापार करने वाले जैसे तमाम लोग हैं, जो असंगठित क्षेत्र के दायरे में ही आते हैं. उनकी भी हालत खस्ता है. उन्हें भी नकद पैसे देने चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा आदेश तभी दिया जा सकता है, जब किसी राज्य में पहले से इसकी नीति बनी हुई हो. कोर्ट ने सभी राज्यों से इस पहलू पर भी जानकारी देने को कहा कि क्या उनके यहां असंगठित क्षेत्र के मजदूरों या दूसरे जरूरतमंदों को सीधे कैश ट्रांसफर देने की कोई योजना है. मामले की अगली सुनवाई 11 जून को होगी.

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