8 की गिरफ्तारी, 20 दिनों तक FIR का इंतजार और एक सवाल…, शक की सुई चंपत राय पर ही क्यों अटकी?
छापेमारी हो रही है, गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, एसआईटी जांच कर रही है और इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में सबसे ज्यादा जिस नाम की चर्चा है, वह है राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय.

Ram Temple Donation Row: राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी… ये सिर्फ पैसे की चोरी का मामला नहीं है, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े सबसे बड़े सवालों में बदल चुका है. जिस मंदिर की सुरक्षा को अभेद्य बताया जाता था, जहां सात लेयर की सुरक्षा व्यवस्था होने का दावा किया जाता था, वहीं अगर चढ़ावे की रकम में लगातार चोरी होती रही, तो आखिर जिम्मेदारी किसकी है? इसी सवाल ने अब उत्तर प्रदेश की राजनीति से लेकर पुलिस जांच तक सबको कठघरे में खड़ा कर दिया है. छापेमारी हो रही है, गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, एसआईटी जांच कर रही है और इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में सबसे ज्यादा जिस नाम की चर्चा है, वह है राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय.
पुलिस ने उनका बयान दर्ज किया है. सूत्रों के मुताबिक उन्होंने चोरी में किसी भी भूमिका से इनकार करते हुए कहा कि संदिग्धों की गिरफ्तारी भी उनके कहने पर ही हुई थी. हालांकि जांच एजेंसियां साफ कह रही हैं कि जरूरत पड़ी तो उन्हें दोबारा भी पूछताछ के लिए बुलाया जा सकता है. इसी बीच चंपत राय ने इस्तीफा भी दे दिया है, लेकिन उस पर अंतिम फैसला 6 जुलाई को होने वाली राम मंदिर ट्रस्ट की बैठक में होगा. चंपत राय कोई सामान्य ट्रस्ट पदाधिकारी नहीं रहे हैं. राम जन्मभूमि आंदोलन की कानूनी लड़ाई से लेकर मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा तक, हर महत्वपूर्ण फैसले में उनकी केंद्रीय भूमिका रही. आंदोलन के दौरान रामजन्मभूमि से जुड़े दस्तावेजों और साक्ष्यों को सुरक्षित रखने से लेकर 2021 के देशव्यापी ‘निधि समर्पण अभियान’ तक, चंपत राय को मंदिर आंदोलन का सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार माना गया.
चंपत राय की सबसे ज्यादा चर्चा
अयोध्या में उन्हें ‘रामलला का पटवारी’ तक कहा गया. यही वजह है कि अब जब चढ़ावा चोरी का मामला सामने आया है, तो विपक्ष सीधे उन्हीं को निशाने पर ले रहा है. कांग्रेस सवाल पूछ रही है कि जब सरकारी सुरक्षा व्यवस्था मौजूद थी, तब 400 निजी सुरक्षा गार्डों की जरूरत क्यों पड़ी? वहीं एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी भी इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं. दूसरी तरफ हनुमानगढ़ी के पुजारी तक कह चुके हैं कि सात परतों वाली सुरक्षा में बिना किसी जिम्मेदार व्यक्ति की भूमिका के इतनी बड़ी चोरी संभव नहीं लगती. पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब 7 जून को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक मीडिया रिपोर्ट साझा करते हुए राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का मुद्दा उठाया.
शुरुआत में ट्रस्ट ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया, लेकिन मामला बढ़ता गया और 13 जून को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एसआईटी जांच के आदेश दे दिए. शुरुआती जांच में जो तथ्य सामने आए, उन्होंने कई नए सवाल खड़े कर दिए. एसआईटी के मुताबिक 24 अप्रैल से 5 जून के बीच महज 43 दिनों में करीब 70 बार चढ़ावे की चोरी हुई. यही नहीं, जांच एजेंसियों को 24 अप्रैल से पहले की सीसीटीवी फुटेज ही उपलब्ध नहीं कराई गई. अब सवाल ये है कि आखिर उससे पहले की रिकॉर्डिंग कहां गई और क्यों उपलब्ध नहीं है? इस मामले में एक और बड़ा सवाल 5 जून की कार्रवाई को लेकर उठ रहा है. पुलिस ने उस दिन अविनाश शुक्ला के ठिकाने पर छापेमारी की थी, जहां से नकदी बरामद हुई.
उठ रहे कई सवाल
लेकिन उस कार्रवाई की तस्वीरें और जानकारी लगभग 23 दिन बाद सार्वजनिक हुईं. सूत्रों का दावा है कि ट्रस्ट को चढ़ावे में गड़बड़ी की जानकारी पहले ही मिल चुकी थी और 5 जून की छापेमारी भी ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारियों की जानकारी में हुई. यही वजह है कि विपक्ष पूछ रहा है कि अगर चोरी की जानकारी पहले से थी, तो पुलिस में तत्काल एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराई गई? सूत्रों के मुताबिक चंपत राय को 27 मई को ही चोरी की जानकारी मिल गई थी और वह थाने भी पहुंचे थे, लेकिन किसी फोन कॉल के बाद बिना शिकायत दर्ज कराए वापस लौट आए. अगर ये जानकारी सही है, तो सवाल उठता है कि आखिर शिकायत दर्ज कराने से किसने रोका और क्यों? अयोध्या पुलिस भी सवालों के घेरे में है.
अगर 5 जून को चोरी का पता चल गया था, तो बिना एफआईआर के छापेमारी कैसे हुई? अगर करीब 80 लाख रुपये बरामद हुए, तो केस उसी दिन दर्ज क्यों नहीं किया गया? क्या बिना मुकदमा दर्ज किए आरोपियों को सबूत मिटाने या रकम ठिकाने लगाने का मौका मिला? और सबसे अहम सवाल- क्या पुलिस किसी के मौखिक निर्देश पर कार्रवाई कर रही थी? यही कारण है कि अब पुलिस की भूमिका भी जांच के दायरे में है. 24 जून को ट्रस्ट की ओर से औपचारिक शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद आठ आरोपियों की गिरफ्तारी हुई. लेकिन गिरफ्तारी के बाद भी पुलिस ने तुरंत रिमांड लेकर पूछताछ नहीं की. जब पूरे मामले पर सवाल उठने लगे, तब अदालत से अनुमति लेकर जेल में आरोपियों से पूछताछ शुरू की गई. इसके बाद पुलिस ने एक साथ सभी आठ आरोपियों के घरों पर छापेमारी की.
जांच के दौरान नकदी, सोने-चांदी के गहने, जमीन और संपत्ति के दस्तावेज, बैंक खातों की जानकारी और मोबाइल फोन की जांच की गई. पुलिस को शक है कि कार्रवाई की भनक लगने के बाद कुछ आरोपियों ने डिजिटल सबूत मिटाने और रकम छिपाने की कोशिश भी की. इसी वजह से अब उन बैंक खातों की भी जांच की जा रही है, जिनमें मंदिर के चढ़ावे की रकम जमा होती थी. पूरे घटनाक्रम में अब तक कुल 11 प्रमुख किरदार सामने आए हैं.
चंपत राय पर क्यों शक?
इनमें आठ आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं, जबकि तीन प्रमुख नाम चंपत राय, अनिल मिश्र और गोपाल राव के हैं. चंपत राय और अनिल मिश्र इस्तीफा दे चुके हैं, जबकि गोपाल राव, जिन्हें ट्रस्ट में औपचारिक पद नहीं होने के बावजूद मंदिर प्रबंधन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं, वे भी जांच के दायरे में हैं. गोपाल राव मंदिर परिसर के दैनिक संचालन, भोग, आरती पास, दर्शन व्यवस्था और कई प्रशासनिक फैसलों से जुड़े रहे हैं तथा उन्हें चंपत राय का करीबी माना जाता है. अब सबकी नजर एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट पर है, जो जल्द मुख्यमंत्री को सौंपी जा सकती है.
6 जुलाई को राम मंदिर ट्रस्ट की बैठक में चंपत राय और अनिल मिश्र के इस्तीफों पर फैसला होगा. लेकिन उससे पहले सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ कुछ कर्मचारियों की चोरी थी, या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था? क्या करोड़ों श्रद्धालुओं के चढ़ावे में सेंध लगाने वाले सभी चेहरे सामने आ पाएंगे? और सबसे अहम-क्या इस पूरे चक्रव्यूह की हर परत खुल पाएगी या फिर कई सवाल हमेशा अनुत्तरित रह जाएंगे? यही इस पूरे मामले की सबसे बड़ी जांच है.


























