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गांधी जयंती: PM मोदी ने ब्लॉग में लिखा, 'उन सपनों को पूरा करना है जिनके लिए बापू ने दिया था बलिदान'

गांधी जी की 150वीं जयंती मनाई जा रही है. आपको बता दें कि गांधी जयंती के दिन उनके सम्मान में विश्व अहिंसा दिवस भी मनाया जाता है. देश की आजादी के आंदोलन में गांधी का योगदान सर्वोपरि रहा है. ऐतिहासिक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की जब भी गाथा लिखी जाएगी उसमें राष्ट्रपिता गांधी का नाम पहली पंक्ति में होगा. इन्हीं पहलुओं को जेहन में रखते हुए पीएम मोदी ने भी एक लेख लिखा है.

दुनिया में जब प्रतिरोध के सबसे उत्तम तरीके की बात आती है तो गांधी का नाम सबसे पहले आता है. भारत को आज़ादी दिलाने के लिए उन्होंने सत्य और अंहिसा का जो मार्ग चुना उसका इस्तेमाल बाद में जाकर अफ्रीका के नेलसन मंडेला से लेकर अमेरिका के मार्टिन लूथर किंग जूनियर और म्यांमार की आंग सान सू की तक ने किया. अहिंसा के सबसे बड़े पुजारी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती 2 अक्टूबर को यानी आज है.

यह गांधी जी की 150वीं जयंती है. आपको बता दें कि गांधी जयंती के दिन उनके सम्मान में विश्व अहिंसा दिवस भी मनाया जाता है. देश की आजादी के आंदोलन में गांधी का योगदान सर्वोपरि रहा है. ऐतिहासिक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की जब भी गाथा लिखी जाएगी उसमें राष्ट्रपिता गांधी का नाम पहली पंक्ति में होगा. इन्हीं पहलुओं को जेहन में रखते हुए पीएम मोदी ने भी एक लेख लिखा है.

नीचे पढें पीएम मोदी का ब्लॉग

"आज हम बापू की 150वीं जयंती के आयोजनों का शुभारंभ कर रहे हैं. बापू आज भी विश्व में उन लाखों-करोड़ों लोगों के लिए आशा की एक किरण हैं, जो समानता, सम्मान, समावेश और सशक्तीकरण से भरपूर जीवन जीना चाहते हैं. विरले ही लोग ऐसे होंगे, जिन्होंने मानव समाज पर उनके जैसा गहरा प्रभाव छोड़ा हो.

महात्मा गांधी ने भारत को सही अर्थों में सिद्धांत और व्यवहार से जोड़ा था. सरदार पटेल ने ठीक ही कहा था, "भारत विविधताओं से भरा देश है. इतनी विविधताओं वाला कोई अन्य देश धरती पर नहीं है. अगर कोई ऐसा व्यक्ति था, जिसने उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए सभी को एकजुट किया, जिसने लोगों को मतभेदों से ऊपर उठाया और विश्व मंच पर भारत का गौरव बढ़ाया, तो वे केवल महात्मा गांधी ही थे और उन्होंने इसकी शुरुआत भारत से नहीं, बल्कि दक्षिण अफ्रीका से की थी. बापू ने भविष्य का आकलन किया और स्थितियों को व्यापक संदर्भ में समझा. वे अपने सिद्धांतों के प्रति अंतिम सांस तक प्रतिबद्ध रहे."

21वीं सदी में गांधी के विचार उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे. वे ऐसी कई समस्याओं का समाधान कर सकते हैं, जिनका सामना आज दुनिया कर रही है. आज आतंकवाद, कट्टरपंथ, उग्रवाद और विचारहीन नफरत देशों और समुदायों को विभाजित कर रही है, वहां शांति और अहिंसा के बापू के स्पष्ट आह्वान में मानवता को एकजुट करने की शक्ति है.

एक ऐसे समय में जब जलवायु-परिवर्तन और पर्यावरण की रक्षा का विषय चर्चा के केंद्र बिंदु में है, दुनिया को गांधी के विचारों से सहारा मिल सकता है. उन्होंने सन् 1909 में मनुष्य की जरूरतों और उसके लालच के बीच अंतर स्पष्ट किया था. प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते समय संयम और करुणा- दोनों के अनुपालन करने की सलाह दी, और खुद इनका पालन करके मिसाल कायम करते हुए नेतृत्व दिया. वे शौचालय खुद साफ करते थे. वे यह सुनिश्चित करते थे कि पानी कम से कम बर्बाद हो और अहमदाबाद में उन्होंने इसका विशेष ध्यान दिया कि दूषित पानी साबरमती के जल में न मिले.

कुछ ही समय पहले बापू द्वारा लिखित एक सारगर्भित, समग्र और संक्षिप्त लेख ने मेरा ध्यान आकर्षित किया. 1941 में बापू ने ‘रचनात्मक कार्यक्रम: उसका अर्थ और स्थान नाम से एक लेख लिखा था. उसमें उन्होंने 1945 में उस समय बदलाव भी किए थे, जब स्वतंत्रता आंदोलन को लेकर एक नया उत्साह था. उस दस्तावेज में बापू ने विविध विषयों पर चर्चा की थी जिनमें ग्रामीण विकास, कृषि को सशक्त बनाने, साफ-सफाई को बढ़ावा देने, खादी को प्रोत्साहन देने, महिलाओं का सशक्तीकरण और आर्थिक समानता जैसे विषय शामिल थे.

मैं देशवासियों से अनुरोध करूंगा कि वे बापू के ‘रचनात्मक कार्यक्रम’ को पढ़ें (इसका मुद्रित संस्करण और इंटरनेट संस्करण उपलब्ध है), यह ऑनलाइन एवं ऑफलाइन उपलब्ध है. गांधी के व्यक्तित्व के सबसे खूबसूरत आयामों में से एक बात यह थी कि उन्होंने अध्यापक, वकील, चिकित्सक, किसान, मजदूर, उद्यमी, सभी में आत्म-विश्वास की भावना भर दी थी कि जो कुछ भी वे कर रहे हैं उसी से वे भारत के स्वाधीनता संग्राम में योगदान दे रहे हैं.

स्वच्छ भारत अभियान’ के जरिए 130 करोड़ भारतीयों ने गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की है. ‘स्वच्छ भारत अभियान’, जिसके चार साल आज पूरे हो रहे हैं. प्रत्येक भारतीय के कठोर परिश्रम से यह अभियान आज जीवंत जन-आंदोलन के रूप में बदल चुका है. साढ़े आठ करोड़ से ज्यादा परिवारों के पास अब पहली बार शौचालय की सुविधा है. चार सालों में स्वच्छता का दायरा 39% से बढ़कर 95% पर पहुंच गया है. 21 राज्य और संघशासित क्षेत्र और साढ़े चार लाख गांव अब खुले में शौच से मुक्त हैं.

'वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर परायी जाने रे’, ये बापू की सबसे प्रिय पंक्तियों में से एक थी. इसका अर्थ है कि भली आत्मा वो है जो दूसरों के दु:ख का अहसास कर सके. यही वो भावना थी जिसने उन्हें दूसरों के लिए जीवन जीने के लिए प्रेरित किया. हम, 130 करोड़ भारतीय, आज उन सपनों को पूरा करने के लिए मिलकर काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो बापू ने देश के लिए देखे और जिसके लिए उन्होंने अपने जीवन का बलिदान दिया था."

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