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जिस PoK के लिए अमित शाह ने खाई थी कसम, क्या वो अब वापस मिलने वाला है? बगावत दे रहे संकेत

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के रावलाकोट, मुज़फ्फराबाद, बाग और दूसरे इलाकों में पिछले कई सप्ताह से लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं. शुरुआत महंगाई, बिजली संकट, रोज़गार, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर हुई थी.

PoK Protest: पीओके... यानी पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर... एक बार फिर सुर्खियों में है. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के कई इलाकों में बीते कई हफ्तों से प्रदर्शन जारी हैं. प्रदर्शनकारी महंगाई, बेरोज़गारी, बिजली संकट, प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक अधिकारों जैसे मुद्दों को लेकर सड़कों पर हैं. कई जगह पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा बलों के खिलाफ भी नारेबाज़ी हुई है. इन प्रदर्शनों के दौरान हिंसा और झड़पों की भी खबरें आई हैं.

हालांकि, सोशल मीडिया पर इन विरोध प्रदर्शनों को सीधे "भारत में शामिल होने" या "पीओके भारत लौटने वाला है" जैसे दावों से जोड़कर पेश किया जा रहा है. इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है. ऐसे में सवाल यह है कि आखिर पीओके में विरोध क्यों हो रहा है? क्या ये आंदोलन सिर्फ स्थानीय अधिकारों का है या इसके पीछे कुछ और भी है? आइए समझते हैं.

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के रावलाकोट, मुज़फ्फराबाद, बाग और दूसरे इलाकों में पिछले कई सप्ताह से लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं. शुरुआत महंगाई, बिजली संकट, रोज़गार, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर हुई थी. लेकिन समय के साथ आंदोलन का दायरा बढ़ता गया और प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान सरकार की नीतियों और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल उठाने शुरू कर दिए.

कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पें हुईं. स्थानीय संगठनों का आरोप है कि आंदोलन को दबाने के लिए बल प्रयोग किया गया, जबकि पाकिस्तान की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कही गई है.

विरोध क्यों हो रहा है?

प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में शामिल हैं—

महंगाई पर नियंत्रण
लगातार बिजली कटौती खत्म करना
बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं
रोजगार के अवसर बढ़ाना
राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व को मजबूत करना
आंदोलन के दौरान गिरफ्तार लोगों की रिहाई

जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) समेत कई स्थानीय संगठनों का कहना है कि उनकी मांगें लंबे समय से अनसुनी की जा रही हैं.

चुनाव का विरोध

27 जुलाई को प्रस्तावित चुनावों को लेकर भी विरोध तेज हुआ. कुछ संगठनों ने आरोप लगाया कि आरक्षित सीटों और राजनीतिक प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की वास्तविक भागीदारी नहीं है. इसी वजह से चुनाव के बहिष्कार का भी ऐलान किया गया.

इसी दौरान कुछ राजनीतिक दलों के चुनाव प्रचार का भी विरोध हुआ और कई जगह तनाव की स्थिति बनी.

क्या आंदोलन आजादी का है?

प्रदर्शनों के दौरान कुछ वीडियो में पाकिस्तान विरोधी नारे और आजादी की मांग भी सुनाई दी है. हालांकि पूरे आंदोलन को एक ही मांग से जोड़कर देखना सही नहीं होगा. स्थानीय स्तर पर अलग-अलग समूह अलग-अलग मांगें उठा रहे हैं. कुछ संगठन प्रशासनिक सुधार चाहते हैं, कुछ ज्यादा राजनीतिक अधिकारों की मांग कर रहे हैं और कुछ समूह पाकिस्तान से अलग होने की भी बात कर रहे हैं.

ऐसे में पूरे पीओके के आंदोलन को सिर्फ "भारत में विलय" की मांग बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं माना जा सकता.

भारत का रुख

भारत लगातार यह कहता रहा है कि पूरा जम्मू-कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी शामिल है, भारत का अभिन्न अंग है.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह समेत कई वरिष्ठ नेता सार्वजनिक मंचों से कह चुके हैं कि पीओके भारत का हिस्सा है और भविष्य में वह भारत का हिस्सा बनेगा. भारत ने पीओके में प्रदर्शनकारियों पर कथित बल प्रयोग और मानवाधिकार उल्लंघन के मुद्दे भी कई बार उठाए हैं.

पाकिस्तान की चुनौती

पीओके में जारी विरोध पाकिस्तान के लिए इसलिए भी चुनौती बन गया है क्योंकि यह इलाका लंबे समय से राजनीतिक और आर्थिक असंतोष का सामना करता रहा है. आर्थिक संकट, बढ़ती महंगाई, ऊर्जा संकट और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर लोगों की नाराजगी लगातार बढ़ रही है. इन परिस्थितियों ने विरोध प्रदर्शनों को और तेज कर दिया है.

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में असंतोष गहराता दिखाई दे रहा है. लेकिन यह कहना कि पूरा पीओके भारत में शामिल होने जा रहा है या जल्द भारत को सौंप दिया जाएगा- ऐसा दावा उपलब्ध और सत्यापित तथ्यों से सिद्ध नहीं होता. वास्तविक स्थिति यह है कि पीओके में बड़े पैमाने पर राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक मुद्दों को लेकर आंदोलन जारी है, जिसकी दिशा और परिणाम आने वाले समय में ही स्पष्ट होंगे.

ये भी पढ़ें: 'सुनो तुम मुसलमान हो क्या?', जबाव सुनकर US में भारतीय शख्स के ऊपर 15 बार किया धारदार चाकू से वार

राजेश कुमार पत्रकारिता जगत में पिछले करीब 14 सालों से ज्यादा वक्त से अपना योगदान दे रहे हैं. राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों से लेकर अपराध जगत तक, हर मुद्दे पर वह स्टोरी लिखते आए हैं. इसके साथ ही, किसी खबरों पर किस तरह अलग-अलग आइडियाज के साथ स्टोरी की जाए, इसके लिए वह अपने सहयोगियों का लगातार मार्गदर्शन करते रहे हैं. इनकी अंतर्राष्ट्रीय जगत की खबरों पर खास नज़र रहती है, जबकि भारत की राजनीति में ये गहरी रुचि रखते हैं. इन्हें क्रिकेट खेलना काफी पसंद और खाली वक्त में पसंद की फिल्में भी खूब देखते हैं. पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर ऑफ ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म किया है. राजनीति, चुनाव, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर राजेश कुमार लगातार लिखते आ रहे हैं.
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