एक साल बाद भी जिंदा है दर्द: पहलगाम हमले की कहानियां, जहां समय थम गया और जख्म नहीं भरे
Pahalgam Terror Attack: आम लोगों के लिए भले ही यह घटना अब खबरों का हिस्सा भर रह गई हो, लेकिन जिन परिवारों ने अपने अपनों को खोया, उनके लिए समय जैसे वहीं थम गया है.

- पहलगाम हमले के एक साल बाद भी परिवार अपनों की यादों में जी रहे हैं।
- कई परिवारों ने त्रासदी के बाद चुप्पी को सहारा बनाया, जीवन सामान्य किया।
- सरकार से किए वादों को पूरा करने का इंतजार, नौकरी और शहीद का दर्जा।
- पीड़ित परिवारों को भावनात्मक सदमा, लेकिन अब भी सामान्य जीवन जीने की कोशिश।
पहलगाम की उस दोपहर को एक साल बीत चुका है, लेकिन जिन घरों ने अपने अपनों को खोया, उनके लिए घड़ी वहीं अटकी हुई है. समय आगे बढ़ गया, खबरें बदल गईं, दुनिया अपनी रफ्तार में लौट आई, लेकिन इन परिवारों की जिंदगी अब भी उसी पल में ठहरी है, जहां गोलियों की आवाज, चीखें और बिछड़ने का दर्द हमेशा के लिए दर्ज हो गया.
हर छोटी चीज उस दिन की याद दिला देती है, फोन की घंटी, किसी खबर का जिक्र या किसी भाषण में उठे शब्द. रातें अब भी लंबी हैं, नींद अधूरी है और दिल में एक खालीपन है, जिसे कोई भर नहीं सकता. यह दर्द बार-बार लौट आता है, कभी किसी सरकारी बयान से, कभी पुलिस अपडेट से तो कभी सोशल मीडिया पर उस घटना के जिक्र से.
लोग कहते हैं वक्त हर जख्म भर देता है, लेकिन यहां जख्म नहीं भरे, बस जीना सीख लिया गया है, टूटे बिना, बिखरे बिना… या शायद बिखरकर भी संभलने की कोशिश में. आम लोगों के लिए भले ही यह घटना अब खबरों का हिस्सा भर रह गई हो, लेकिन जिन परिवारों ने अपने अपनों को खोया, उनके लिए समय जैसे वहीं थम गया है. उनकी जिंदगी अब “पहले” और “बाद” में बंट चुकी है, जहां हर दिन यादों, खालीपन और अधूरे वादों के साथ गुजरता है. ऐसी कहानियां अलग-अलग शहरों में कई परिवारों की हैं, जहां दर्द, खामोशी और सामान्य दिखने की कोशिश ही नई हकीकत बन गई है.
कानपुर की ऐशान्या की फोटो तो याद होगी!
कानपुर के व्यापारी शुभम द्विवेदी की पत्नी ऐशान्या के लिए पहलगाम हमले की याद आज भी जिंदा है. शादी को महज दो महीने ही हुए थे, जब उनकी आंखों के सामने उनके पति को गोली मार दी गई. ऐशान्या ने हमलावरों से खुद को भी मार देने की गुहार लगाई, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.
उस दिन शुभम सबसे पहले शिकार बनने वालों में शामिल थे. एक साल बाद, लखनऊ से करीब 100 किलोमीटर दूर कानपुर के श्याम नगर स्थित फ्लैट में ऐशान्या अपने ससुराल वालों के साथ रह रही हैं, लेकिन उनके लिए समय जैसे थम गया है. वह कहती हैं कि ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब शुभम की याद न आती हो.
परिवार आज भी अपने नुकसान के साथ जी रहा है और सरकार से किए गए वादों के पूरा होने का इंतजार कर रहा है. उनकी मांग है कि ऐशान्या को सरकारी नौकरी दी जाए और इस हमले में मारे गए लोगों को शहीद का दर्जा मिले. परिवार का कहना है कि वादे तो बहुत हुए, लेकिन अब तक उन्हें पूरा नहीं किया गया. दर्द आज भी उतना ही गहरा है.
जयपुर में चुप्पी ही मजबूरी
जयपुर में नीरज उदवानी के परिवार ने इस त्रासदी के बाद चुप्पी को ही सहारा बना लिया है. उनकी 70 वर्षीय मां, जिन्होंने यह यात्रा सुझाई थी, अब घर से बाहर कम ही निकलती हैं, जबकि परिवार के बाकी सदस्य भी उन यादों को दोहराने से बचते हैं. वे हमले की बात करने के बजाय उन्हें प्रार्थनाओं में याद करना ही बेहतर समझते हैं. परिवार के लिए जिंदगी अब आगे बढ़ने की एक मजबूरी बन गई है. नीरज की चीजें आज भी वैसे ही रखी हैं, जैसे वह छोड़कर गए थे, मानो समय वहीं ठहर गया हो.
एक मां का दर्द, जिसने गोद और सुहाग एक साथ खोया
गुजरात के भावनगर में परमार परिवार ने इस हमले में यतेश परमार और उनके 16 वर्षीय बेटे सुमित को खो दिया. इस त्रासदी ने परिवार की पूरी जीवनशैली बदल दी है, जो परिवार पहले साथ घूमने-फिरने जाता था, अब सफर से कतराता है और हर कदम बेहद सतर्कता के साथ उठाता है. यतेश की पत्नी और सुमित की मां, जिन्होंने अपनी आंखों के सामने यह भयावह घटना देखी, आज भी गहरे सदमे में हैं. वे सामान्य जीवन से लगभग दूर हो गई हैं और चुप्पी में अपना दर्द समेटे हुए हैं.
आर्टिफिशियल नॉर्मल लाइफ जीने की कवायद
बेंगलुरु में भरत भूषण के परिवार के लिए यह नुकसान अब भी अविश्वसनीय सा लगता है. परिवारिक छुट्टी के दौरान उनकी हत्या कर दी गई थी. हमले के बाद उनकी पत्नी सुजाता ने उनके भाई प्रीतम को फोन कर पूरी घटना बताई कि कैसे भरत को गोली मारी गई. अपने अंतिम पलों में भरत अपने परिवार की सुरक्षा की गुहार लगा रहे थे. अब परिवार एक आर्टिफिशियल नॉर्मल लाइफ जीने की कोशिश कर रहा है.
सुजाता उस क्लिनिक को शुरू करने की उम्मीद कर रही हैं, जिसका सपना उन्होंने अपने पति के साथ देखा था. उनका बेटा फिर से स्कूल जाने लगा है. प्रीतम कहते हैं, ‘हम रोते नहीं, क्योंकि हम टूट नहीं सकते. हम जानते हैं कि हम अंदर से कमजोर हैं, फिर भी सामान्य होने का दिखावा करते हैं.’ यह परिवार हर दिन को संभलकर जी रहा है, एक-दूसरे का सहारा बनते हुए इस दर्द के साथ आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है.
पति ने बचा लिया था, लेकिन सदमा भूल नहीं रहा
इंदौर में रहने वाली जेनिफर के लिए अपने 58 वर्षीय पति सुशील नाथानिएल की यादें आज भी उतनी ही ताजा हैं. हमले के दौरान सुशील ने उन्हें बचाने के लिए पेड़ के पीछे धकेल दिया था, लेकिन खुद गोली का शिकार हो गए. जेनिफर बताती हैं कि वह उनके शव के पास ठंडी वादी में पड़ी रहीं, चारों तरफ गोलियों की आवाज गूंज रही थी और खून बहता देख वे सुन्न हो गई थीं.
एक साल बाद भी जेनिफर उस भयावह पल से बाहर नहीं निकल पाई हैं. उनका बेटा ऑस्टिन बताता है कि मां अब काफी निर्भर और भूलने वाली हो गई हैं, इसलिए परिवार उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ता. बेटी आकांक्षा भी उनकी देखभाल के लिए इंदौर आकर रहने लगी है. इस हादसे ने पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी है. वे अब सामाजिक कार्यक्रमों से दूर रहते हैं. ऑस्टिन पर घर की जिम्मेदारी आ गई है और विदेश में पढ़ाई का सपना भी छूट गया. वह कहता है कि वादे तो हुए, लेकिन मदद नहीं मिली.
पैसा तो मिला, लेकिन नौकरी नहीं
ओडिशा के बालासोर की प्रियदर्शिनी सतपथी के लिए पहलगाम हमले का दर्द आज भी ताजा है. उनके पति प्रशांत सतपथी इस हमले में मारे गए थे और वह उस दिन की भयावह यादों से अब तक उबर नहीं पाई हैं. प्रियदर्शिनी का कहना है कि सरकार ने कई वादे किए थे कि आर्थिक सहायता, नौकरी और बेटे की पढ़ाई की जिम्मेदारी, लेकिन सभी पूरे नहीं हुए. उन्हें आर्थिक मदद तो मिल गई, लेकिन लगभग एक साल बाद भी नौकरी नहीं मिली है, जबकि उन्होंने सभी दस्तावेज जमा कर दिए हैं. सांसद और विधायक से मिलने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई. उनका सवाल है कि जब दूसरे राज्यों ने अपने वादे निभाए तो मेरा राज्य क्यों पीछे रह गया?
नौकरी पिता की कमी पूरी नहीं करती
करीब एक साल बीत जाने के बाद भी संतोष जगदाले की हत्या का दर्द उनके परिवार के लिए कम नहीं हुआ है. जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले में संतोष की मौत उनकी पत्नी प्रगति और बेटी असावरी के सामने हुई थी. उस भयावह घटना की यादें आज भी उनके साथ हैं. परिवार को भावनात्मक सदमे के साथ-साथ आर्थिक संकट का भी सामना करना पड़ा, क्योंकि संतोष घर के मुख्य कमाने वाले थे.
असावरी को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी ताकि वह अपनी मां का सहारा बन सके. सरकार की ओर से नौकरी का वादा किया गया था, लेकिन उसे पूरा कराने के लिए परिवार को महीनों तक संघर्ष करना पड़ा. आखिरकार 11 महीने बाद असावरी को पुणे नगर निगम में प्रशासनिक अधिकारी के पद पर नियुक्ति मिली, जिससे परिवार को कुछ राहत मिली है. फिर भी, असावरी कहती हैं कि यह नौकरी पिता की कमी को कभी पूरा नहीं कर सकती. परिवार आज भी मानसिक रूप से टूट चुका है और धीरे-धीरे सामान्य जीवन में लौटने की कोशिश कर रहा है.
यह भी पढ़ेंः Exclusive: ‘बंगाल की जनता TMC के व्यवहार से त्रस्त’, भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन का CM ममता पर हमला
Source: IOCL



























