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भारत में मेडिसिनल प्लांट की खेती की क्या हैं संभावनाएं, किसान इसके दम पर कैसे बदल सकते हैं किस्मत

औषधीय पौधों की खेती ने किसानों के सामने कमाई का नया विकल्प दे दिया है. कई पौधें ऐसे होते हैं, जिनमें लागत ना के बराबर होती है. औषधीय फसल को एक बार लगाने के बाद 3-4 साल तक इससे कमाई की जा सकती है.

कोरोना काल के बाद देश और दुनिया में औषधीय पौधों (मेडिसिनल प्लांट) की मांग में तेजी आई है. इसी वजह देश के कई हिस्सों में इसकी खेती भी शुरू हो गई है. मौसमी फसलों की तुलना में औषधीय पौधों में कम लागत के साथ ज्यादा कमाई हो रही है. 

भारत सरकार ने एक साल में 75 हजार हेक्टेयर में मेडिसिनल प्लांट को उपजाने का लक्ष्य रखा है. किसानों को इसके लिए सब्सिडी भी दी जा रही है. साथ ही एमपी, राजस्थान समेत कई राज्यों में भी मेडिसिनल प्लांट की खेती के लिए सब्सिडी की व्यवस्था है.

क्यों फायदेमंद, 3 फैक्ट्स...
1. मेडिसिनल प्लांट के उगाने में मौसम को लेकर कोई टेंशन नहीं रहता है. अमूमन पौधे किसी भी महीने में लगाए जा सकते हैं.
2. कम उपजाऊ की भूमि पर भी इसकी खेती की जा सकती है. राजस्थान के रेगिस्तान में गिलोय और तुलसी की भी खेती हो जाती है.
3. आम फसलों की तुलना में इसका बाजार मूल्य काफी ज्यादा है. इसलिए इसकी खेती करना लाभदायक हो सकता है.

6 औषधीय पौधे, जिनकी खेती का क्रेज बढ़ा है...
1. अश्वगंधा- भारत में इसकी खेती समुंद्री तल से 1500 मीटर की ऊंचाई तक के सभी क्षेत्रों में की जा सकती है. खासकर पश्चिमोत्तर भाग राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब, गुजरात, यूपी एंव हिमाचल प्रदेश में अश्वगंधा की तेजी बहुयात में की जा रही है. अश्वगंधा के पौधे एंटी ट्यूमर और एंटी बॉयोटिक होता है. इसलिए इसका उपयोग जैविक बीमारियों में किया जाता है.

2. ईसबगोल- भारत में इसकी खेती दोमट या बलुई दोमट मिट्टी पर की जाती है. इसका उत्पादन प्रमुख रूप से गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में होता है. ईसबगोल की बीज के छिलके में पानी सोखने की क्षमता होती है, इसलिए उसका उपयोग कब्जियत और अल्सर में किया जाता है.

3. गिलोय- समुंद्री तट से 1200-3000 मीटर की ऊंचाई तक इसकी खेती की जा सकती है. गिलोय की खेती रेतीली, दोमट, बलुई दोमट, हल्की चिकनी मृदा तथा अच्छी जल निकास वाली चिकनी मिट्टी में होती है. कोरोना काल में गिलोय की खपत में अचानक बढ़ोतरी देखी गई थी. गिलोय शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का काम करता है. 

4. तुलसी- इसकी खेती पूरे भारत में होती है. यह अमूमन जलजमाव वाली जगह को छोड़कर हर जगह उग जाता है. तुलसी का पत्ता 90 दिन में तैयार हो जाता है. इसका उपयोग खांसी, मच्छर काटने से होने वाली बीमारी और पथरी में किया जाता है.

5. काली हल्दी- काली हल्दी की खेती के लिए भुरभुरी दोमट मिट्टी सबसे बेहतर होती है. यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को तेजी से बढ़ाता है. काली हल्दी की खेती दक्षिण भारत में बहुयात में होती है. इसका उपयोग माइग्रेन, गैस्ट्रिक आदि में किया जाता है.

6. करी पत्ता- करीपत्ता का इस्तेमाल मसालों के अलावा जड़ी-बूटी के तौर पर भी किया जाता है. वजन घटाने से लेकर पेट की बीमारी और इंफेक्शन में करीपत्ता का अहम रोल है. भारत के ज्यादातर घरों में करी पत्ता का पौधा जरूर लगाते हैं. इसकी खेती पूरे भारत में होती है.

75 हजार हेक्टेयर में खेती करने का लक्ष्य
देश में मेडिसिनल प्लांट की मांग को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक साल में 75 हजार हेक्टेयर में इसकी खेती करने का लक्ष्य रखा है. सराकारी रिपोर्ट के मुताबिक पिछले ढ़ाई साल में मेडिसिनल प्लांट की डिमांड में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है. इसलिए अब इनकी खेती पर फोकस किया जा रहा है. 

75% की सब्सिडी देती है सरकार
भारत में मेडिसिनल प्लांट और जड़ी-बूटियों का उत्पादन बढ़ाने के लिये राष्ट्रीय आयुष मिशन योजना चलाई जा रही है. इस योजना के तहत 140 जड़ी-बूटियां और हर्बल प्लांट्स की खेती के लिये किसानों को अलग-अलग दरों से सब्सिडी प्रदान की जाती है. इस योजना के तहत आवेदन करने वाले लाभार्थी किसानों को औषधीय पौधों की खेती की लागत पर 30 प्रतिशत से लेकर 50 और 75 प्रतिशत तक आर्थिक अनुदान दिया जा रहा है. 

आयुष मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, राष्ट्रीय आयुष मिशन के तहत मेडिसिनल प्लांट और जड़ी-बूटी उत्‍पादन के लिये करीब 59,350 से ज्यादा किसानों को आर्थिक सहायता मिल चुकी है.

फायदा है, लेकिन ये चुनौती भी
किसान संगठन से जुड़े परमजीत सिंह बताते हैं- पिछले कुछ सालों में मेडिसिनल प्लांट का चलन बढ़ा है. लोग पारंपरिक खेती की बजाय मेडिसिनल प्लांट की ओर बढ़ रहे हैं. कमाई इसकी सबसे बड़ी वजह है. 

कई राज्यों में मेडिसिनल प्लांट को लेकर हम लोग किसानों से बातचीत करते हैं. इसमें 2 बड़ी समस्याएं भी है. पहला, लोकल लेवल पर मार्केट का नहीं होना और दूसरा खेती में वक्त लगना.

1. स्थानीय स्तर पर मार्केट नहीं- मेडिसिनल प्लांट के बाद उसके प्रोडक्ट को बेचने के लिए स्थानीय स्तर पर अभी बाजार नहीं है. किसानों को इसके लिए सीधे कंपनियों से डील करनी पड़ती है. स्थानीय स्तर पर अगर इसका बाजार हो जाए, तो किसानों को सहूलियत मिलेगी और इसका प्रसार भी बढ़ेगा.

2. तुरंत लाभ नहीं मिल पाता- फसली खेती में किसानों को 3-4 महीने में फसल का दाम मिल जाता है, लेकिन मेडिसिनल प्लांट में ऐसा नहीं है. कई ऐसे फसल भी है, जिसके लिए 2-2 साल का इंतजार करना पड़ता है. ऐसे में किसान की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं रह पाती है.

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