लेफ्ट का आखिरी किले पर कांग्रेस का कब्जा, झंडाबरदारी कौन करेगा: क्या यह कांग्रेस की जीत है या लेफ्ट की अस्वीकृति?
केरल की राजनीति अक्सर अपने अलग मिज़ाज के लिए जानी जाती है, जहां सत्ता का झूला परंपरागत रूप से यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) के बीच झूलता रहा है.

केरल की राजनीति अक्सर अपने अलग मिज़ाज के लिए जानी जाती है. जहां सत्ता का झूला परंपरागत रूप से यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) के बीच झूलता रहा है. इस बार जो तस्वीर उभरती दिख रही है, वह सामान्य सत्ता परिवर्तन से कहीं अधिक गहरी राजनीतिक कथा बयां करती है. करीब एक दशक बाद UDF की वापसी को सिर्फ कांग्रेस की जीत के रूप में पढ़ना अधूरा विश्लेषण होगा; यह उतना ही, बल्कि उससे अधिक, वामपंथी राजनीति के प्रति मतदाता के असंतोष का संकेत है.
सीपीएम के नेतृत्व वाले LDF ने पिछले कार्यकाल में अपेक्षाकृत स्थिर शासन दिया था, लेकिन लगातार सत्ता में बने रहने के साथ एंटी-इंकम्बेंसी का दबाव बढ़ता गया. सोने की तस्करी जैसे विवाद, नौकरशाही पर बढ़ते आरोप और कुछ मामलों में राजनीतिक संरक्षण की धारणा ने सरकार की छवि को प्रभावित किया.
ये भी पढ़ें: Kerala Assembly Election: केरल में तीन सीटों पर BJP ने खिलाया कमल, पिछली बार शून्य था रिकॉर्ड
लेफ्ट के खिलाफ जनादेश और कांग्रेस की वापसी: अवसर या चुनौती?
केरल का मतदाता परंपरागत रूप से राजनीतिक रूप से सजग और निर्णायक रहा है. यहां अक्सर वोट “किसे जिताना है” से ज्यादा “किसे हटाना है” के आधार पर पड़ते हैं. इस बार भी यही पैटर्न उभरता दिख रहा है—जहां मतदाता ने LDF को स्पष्ट संदेश दिया है कि सत्ता का निरंतर केंद्रीकरण स्वीकार्य नहीं है. 28.79 प्रतिशत वोट के साथ कांग्रेस और 11 प्रतिशत वोट के साथ मुस्लिम लीग वाले गठबंधन ने 102 सीटों पर कब्जा किया. यानि कि तकरीबन 40 प्रतिशत वोट तो सिर्फ कांग्रेस और मुस्लिम लीग को ही मिले.
इतिहास देखें तो केरल लगातार उच्च मतदान वाले राज्यों में रहा है. लेकिन इस बार का 78.27% कई मायनों में महत्वपूर्ण है. यह उस समय दर्ज हुआ है जब मुकाबला अपेक्षाकृत सीधा था—United Democratic Front बनाम Left Democratic Front—और मतदाता के सामने विकल्प स्पष्ट थे. ऐसे परिदृश्य में उच्च मतदान अक्सर “मूड ऑफ द नेशन” का संकेत देता है, खासकर तब जब एंटी-इंकम्बेंसी की चर्चा पहले से मौजूद हो.
कांग्रेस के लिए यह जीत निस्संदेह मनोबल बढ़ाने वाली है, खासकर ऐसे समय में जब केंद्र में पार्टी लगातार संघर्ष कर रही है. केरल जैसे राजनीतिक रूप से परिपक्व राज्य में वापसी कांग्रेस को वैचारिक और संगठनात्मक पुनर्स्थापन का अवसर देती है.
लेकिन यह जीत जितनी बड़ी दिखती है, उतनी सरल नहीं है. UDF की सफलता दरअसल एक “संयुक्त वोट” का परिणाम है—जिसमें अल्पसंख्यक, ईसाई समुदाय, परंपरागत कांग्रेस समर्थक और कुछ हद तक एंटी-लेफ्ट वोट शामिल हैं. इस विविध सामाजिक गठबंधन को बनाए रखना ही कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती होगी.
केरल: चार चेहरे, एक कुर्सी—कांग्रेस के सामने संतुलन की असली परीक्षा
केरल में UDF की संभावित वापसी के साथ सबसे बड़ा सवाल अब सत्ता नहीं, नेतृत्व का है. VD Satheesan, Ramesh Chennithala और KC Venugopal के बीच मुकाबला पहले से चर्चा में था, लेकिन अब Shashi Tharoor का नाम इस समीकरण को और जटिल बना देता है. चारों एक साथ चार मई को प्रेस कांफ्रेस में नजर आए और एक दूसरे के गले मिले. लेकिन राजनीति में ये भी सबको पता है कि जो बातें कैमरे के सामने होती हैं अकसर वो बंद कमरों में होने वाले घमासान से मेल नहीं खाती है.
वीडी सतीशन “परिवर्तन” का चेहरा बनकर उभरे हैं. नेता प्रतिपक्ष के रूप में उनका आक्रामक तेवर और साफ छवि उन्हें बढ़त देता है. लेकिन प्रशासनिक अनुभव की कमी और गुटीय संतुलन साधने की चुनौती उनके सामने बड़ी बाधा हो सकती है. इसके उलट रमेश चेन्नीथला अनुभव और संगठनात्मक पकड़ के साथ स्थिरता का भरोसा देते हैं, हालांकि 2021 की हार और “पुराने चेहरे” की छवि उनके पक्ष को कमजोर करती है.
केसी वेणुगोपाल का मामला अलग है. राहुल गांधी के करीबी होने के कारण उनकी दावेदारी सीधे हाईकमान की राजनीति से जुड़ती है. वे समझौते के उम्मीदवार बन सकते हैं, लेकिन विधायक न होने और “दिल्ली के प्रतिनिधि” की धारणा उन्हें जोखिम भरा विकल्प बनाती है. बाकी नामों सिर्फ केरल में जमे हुए हैं, वेणुगोपाल दिल्ली के करीब पहुंचे हुए हैं और परिणाम के अगले ही दिन दिल्ली की तरफ कूच कर चुके हैं. साथ ही चुने हुए विधायकों में भी उनकी अच्छी पकड़ है क्योंकि टिकट बांटते समय भी "हाईकमान" के सामने सिर्फ उनकी ही चली थी.
यहीं शशि थरूर एक दिलचस्प आयाम जोड़ते हैं. अंतरराष्ट्रीय छवि, बौद्धिक अपील और शहरी मध्यमवर्ग में पकड़ उन्हें एक अलग तरह का नेता बनाती है. वे कांग्रेस को “नए नैरेटिव” के साथ पेश कर सकते हैं—लेकिन राज्य संगठन में उनकी सीमित जमीनी पकड़ और पारंपरिक गुटों से दूरी उनकी राह मुश्किल करती है.
असल चुनौती यह है कि कांग्रेस किस संदेश पर दांव लगाती है—आक्रामक बदलाव, अनुभवी स्थिरता, हाईकमान का नियंत्रण या नई छवि की राजनीति। केरल में मुख्यमंत्री का चयन सिर्फ नेतृत्व तय नहीं करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि कांग्रेस अपनी अगली राजनीति किस दिशा में ले जाना चाहती है।
हाईकमान बनाम स्थानीय नेतृत्व: पुराना द्वंद्व फिर सामने
कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री चुनने की प्रक्रिया हमेशा से “हाईकमान संस्कृति” से प्रभावित रही है. Tariq Anwar ने भी साफ किया है कि अंतिम निर्णय विधायक दल की सिफारिश के बाद अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) ही करेगी.
चुनाव जीतने के बाद शशि थरूर ने सीएम के सवाल पर कहा कि चुनाव परिणाम आने के बाद सभी जीते हुए विधायक पार्टी अध्यक्ष के प्रतिनिधि से मिलते हैं और उस प्रतिनिधि को ये बताया जाएगा कि विधायक चाहते क्या हैं. उन्होंने बताया इसके बाद प्रतिनिधि दिल्ली जाएगा और हाई कमान से मिलकर विधायकों के मंतव्य से उनको परिचित कराएगा.
इसके बाद हाई कमान उनके मत के अनुसार अंतिम फैसला लेगा. उन्होंने कहा कि हाईकमान किसी नियम या फिर सीमा से बंधा हुआ नहीं है. उनको जो पसंद होगा वह उसे चुनेंगे. यह उनके ऊपर निर्भर करता है कि वो क्या फैसला करते हैं.
केरल का "एम-सी" कनेक्शन
केरल की राजनीति में सामाजिक समीकरण केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि निर्णयकारी ढांचा तय करते हैं. नायर–एझावा संतुलन जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही निर्णायक मुस्लिम और ईसाई समुदायों का राजनीतिक रुख भी है—खासकर तब, जब मुकाबला UDF और LDF के बीच सीधा हो. मुस्लिम वोट बैंक पर IUML की पकड़ लंबे समय से UDF के लिए गेम-चेंजर रही है. मालाबार क्षेत्र—मलप्पुरम, कोझिकोड, कन्नूर—में यह समर्थन अक्सर निर्णायक बढ़त में बदलता है. इस बार भी संकेत यही हैं कि LDF के खिलाफ वोट का एक बड़ा हिस्सा UDF की ओर कंसोलिडेट हुआ, जिसने सीटों के समीकरण को पलटने में भूमिका निभाई.
ईसाई समुदाय का रुख और भी दिलचस्प है. मध्य केरल—कोट्टायम, इडुक्की, एर्नाकुलम—में चर्च नेटवर्क और स्थानीय संस्थागत प्रभाव चुनावी व्यवहार को सूक्ष्म तरीके से प्रभावित करते हैं. हाल के वर्षों में LDF और चर्च के बीच कुछ मुद्दों पर दूरी बढ़ने से UDF को यहां फायदा मिला. यह “सॉफ्ट शिफ्ट” भले खुलकर राजनीतिक न दिखे, लेकिन परिणामों में स्पष्ट परिलक्षित होता है.
यही वजह है कि मुख्यमंत्री चुनना इतना आसान भी नहीं होगा. कांग्रेस को ऐसा चेहरा चुनना होगा, जो इन दोनों समुदायों में भरोसा बनाए रख सके—चाहे वह प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व के जरिए हो या संतुलित कैबिनेट और नीति संकेतों के माध्यम से.
ये भी पढ़ें: Election Results 2026 Live: अमित शाह को भाजपा ने बनाया बंगाल का पर्यवेक्षक, नड्डा को असम की जिम्मेदारी
Source: IOCL




























