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(Source: ECI/ABP News)

क्या भविष्य में गेहूं की जगह बनेंगी ज्वार की रोटियां, समझिए बढ़ती जा रही गर्मी से क्या है इसका कनेक्शन

जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे भारत में फसलों पर भी गहरा असर पड़ा है. खासतौर से गेंहू पर इसका असर पड़ना चिंता का विषय है, लेकिन सवाल ये है कि आने वाले समय में क्या गेंहू का कोई विकल्प हो सकता है.

भारत में पिछले साल मार्च में आई लू और रूस-यूक्रेन संघर्ष ने अनाज की जरूरतों खासतौर से गेहूं के लिए देश की निर्भरता को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं. मार्च में आई गर्मी की लहरों ने भी फसलों को बहुत हद तक प्रभावित किया. रूस-यूक्रेन संकट की वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गेहूं की आपूर्ति और कीमतों में इजाफा हुआ. ऐसे में हमें ये समझने की जरूरत है कि क्या आने वाले वक्त में गेहूं की जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी विकल्प की जरूरत होगी. लेकिन सवाल ये है कि क्या गेहूं का कोई विकल्प हो सकता है. 

एक नए रिसर्च पेपर में ये बताया गया कि पारंपरिक रूप से उगाया जाने वाला ज्वार जलवायु परिवर्तन के लिए अपने लचीलेपन की वजह से गेहूं का एक बेहतर विकल्प हो सकता है. 

नेचर्स साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित विश्लेषण में तापमान में वृद्धि के लिए गेहूं और ज्वार की पैदावार की संवेदनशीलता की जांच की गई और अलग-अलग परिदृश्यों के तहत पानी की जरूरतों पर गौर किया गया. 

नेचर्स साइंटिफिक रिपोर्ट्स के क्लाइमेट रेज़िलियेंट ऑफ ड्राई सीजन सीरेल्स ऑफ इंडिया नाम के रिसर्च पेपर में ये बताया गया कि भारत गेंहू का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं का उत्पादक देश है. 2000 के दशक की शुरुआत से यह उत्पादन 40 प्रतिशत बढ़ा है. हालांकि बढ़ते तापमान ने गर्मी के प्रति फसल की संवेदनशीलता के बारे में चिंताओं को बढ़ा दिया है, जिससे पानी की कमी के बीच सिंचाई में पानी की जरूरतों को गंभीर समस्या बना दिया है.

गेंहू का 10वां सबसे बड़ा निर्यातक देश है गेहूं

2021 में भारत ने गेहूं निर्यात करने वाला 10वां सबसे बड़ा निर्यातक देश बना. उसी साल गेहूं भारत में 34 वां सबसे ज्यादा निर्यात किया जाने वाला उत्पाद था. भारत से गेहूं निर्यात बांग्लादेश , श्रीलंका , संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया, और फ़िलिपींस होता है.

2020 और 2021 के बीच भारत के गेहूं के लिए सबसे तेजी से बढ़ते निर्यात बाजार बांग्लादेश , श्रीलंका. और संयुक्त अरब अमीरात थे.

आयात
2021 में भारत गेहूं का 174 वां सबसे बड़ा आयातक बन गया. उसी साल गेहूं भारत में 1191 वां सबसे ज्यादा आयात किए जाने वाला था. भारत मुख्य रूप से गेहूं आयात ऑस्ट्रेलिया , टर्की, यूनाइटेड किंगडम , मेक्सिको, और थाईलैंड से करता है. 

भारत ने किया था गेहूं निर्यात पर बैन लगाने का फैसला

भारत ने यूक्रेन युद्ध के मद्देनजर वैश्विक खाद्य आपूर्ति की स्थिति खराब होने की आलोचना के बाद गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया था. प्रतिबंध की घोषणा के बाद जर्मन खाद्य और कृषि मंत्री सेम ओज़डेमिर ने कहा, "यह संकट को और खराब कर देगा. 

लेकिन भारत के वाणिज्य मंत्री, पीयूष गोयल ने कहा था कि निर्यात प्रतिबंध से वैश्विक बाजारों पर असर नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि भारत एक प्रमुख गेहूं निर्यातक नहीं है. तो भारत के इस कदम का क्या असर हुआ है?

वैश्विक स्तर पर गेहूं की कीमतों में वृद्धि
भारत के प्रतिबंध की घोषणा 13 मई को की गई थी, जब बेमौसम गर्म मौसम ने गेहूं की फसल को प्रभावित किया, जिससे स्थानीय कीमतें बढ़ गईं.  हालांकि भारत एक प्रमुख गेहूं निर्यातक नहीं है, लेकिन इस कदम ने शिकागो बेंचमार्क गेहूं सूचकांक में लगभग 6% की वृद्धि के साथ वैश्विक बाजारों को अस्थिर कर दिया. इस फैसले के बाद गेहूं की कई किस्मों की कीमतों में भी इजाफा हुआ. 


क्या भविष्य में गेहूं की जगह बनेंगी ज्वार की रोटियां, समझिए बढ़ती जा रही गर्मी से क्या है इसका कनेक्शन

लेकिन ज्यादा खपत के अलावा जलवायु परिवर्तन गेहूं की पैदावार में सबसे बड़ा रोड़ा बन कर उभरा है. हाल ही में कृषि मंत्रालय ने संसदीय समिती को दिए एक बयान में कहा " जलवायु परिवर्तन और बढ़ते प्रदूषण के प्रभाव न केवल जनता को, बल्कि कृषि फसलों पर भी डाला है. जलवायु परिवर्तन धान, गेहूं, मक्का, ज्वार, सरसों, आलू, कपास और नारियल जैसी फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है. 

मंत्रालय ने वरिष्ठ भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति को बताया कि अगर समय पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो 2050 तक गेहूं उत्पादन में भारी कमी आएगी.


क्या भविष्य में गेहूं की जगह बनेंगी ज्वार की रोटियां, समझिए बढ़ती जा रही गर्मी से क्या है इसका कनेक्शन

मंत्रालय ने समिति को यह भी बताया कि 2050 तक मक्का के उत्पादन में 18% की गिरावट आ सकती है. मंत्रालय ने समिति को यह भी बताया कि 2050 तक मक्का के उत्पादन में 18% की गिरावट आ सकती है. लेकिन अगर उचित कदम उठाए जाते हैं, तो इसके उत्पादन में वास्तव में 21% की वृद्धि हो सकती है. जलवायु परिवर्तन के कारण 2020 तक धान के उत्पादन में 4-6% की गिरावट आई थी. 

जलवायु परिवर्तन का फसल की पैदावार पर कितना असर 

जलवायु परिवर्तन चारे की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है. कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ोत्तरी के साथ, अनाज में प्रोटीन, जस्ता, लोहा और अन्य खनिजों की मात्रा में कमी होती है.

ज्वार की पैदावार को लेकर क्या कह रही है नई स्टडी

नए शोध में ये पाया गया कि ज्वार न केवल जलवायु परिवर्तन के लिए ज्यादा लचीला है, बल्कि इसकी पैदावार में बहुत कम पानी की जरूरत होती है. जलवायु परिवर्तन पर के अध्ययन में ये तर्क दिया गया है कि भारत में गेहूं की खेती के प्रबंधन में व्यावहारिक बदलाव के बिना, पैदावार में 5 प्रतिशत की कमी होने की संभावना है, साथ ही 2040 तक वाटर फुट प्रिंट में बढ़ोतरी देखी जाएगी. वाटर फुटप्रिंट पानी के इस्तेमाल का एक संकेतक है. ये उपभोक्ता या उत्पादक के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष पानी के इस्तेमाल को बताता है. 

भारत के रिसर्चर भी रहे इस शोध में शामिल

यह अध्ययन अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया था. चीनी कृषि विज्ञान अकादमी,  इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस; डेलावेयर विश्वविद्यालय, अमेरिका; भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे; येल विश्वविद्यालय, अमेरिका; और वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी, यूएस इस रिसर्च का हिस्सा थे.

जलवायु परिवर्तन के दौर में ज्वार कैसे है गेहूं का विकल्प

इस शोध में भारत में पैदा होने वाली दो मुख्य रबी अनाजों गेहूं और ज्वार पर शोध किया गया कि पैदावारी के मौसम में कौन सी फसल जलवायु परिवर्तन के बावजूद बेहतर उपज दे सकती है. भारत में रबी अनाज उत्पादन के ऐतिहासिक पैटर्न और रुझानों की जांच की गई. दोनों अनाजों के लिए तापमान संवेदनशीलता और पानी की आवश्यकताओं की तुलना की गई और भविष्य में बढ़ते तापमान के लिए पैदावार और पानी की आवश्यकताओं की उनकी संवेदनशीलता का आकलन किया गया. 

शोधकर्ताओं ने पाया कि गेहूं मानसून के बाद शुष्क सर्दियों के मौसम के दौरान पैदावार के कई चरणों में तापमान के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं. इसकी तुलना में ज्वार पैदावार तापमान का बहुत कम प्रभाव पड़ता है. इसके अलावा गर्मियों में पैदालर के दौरान गेहूं को ज्वार के मुकाबले में 1.4 गुना ज्यादा पानी की जरूरत होती है. 

डाउन टू अर्थ में छपी खबर के मुताबिक अध्ययन के सह-लेखक और भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी, इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस के कार्यकारी निदेशक प्रोफेसर अश्विनी छत्रे ने कहा, "पारंपरिक रूप से उगाया जाने वाला ज्वार एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है. जो लगातार हो रहे जलवायु परिवर्तनों के लिए काफी लचीला है. ज्वार की पैदावार में गेहूं की तुलना में काफी कम पानी की जरूरत होती है. 

बता दें कि भारत चीन के बाद विश्व स्तर पर गेहूं का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है. बांग्लादेश, नेपाल, अफगानिस्तान, सोमालिया और श्रीलंका के पड़ोसी देशों को भारत गेहूं निर्यात करता है. 

डाउन टू अर्थ को प्रोफेसर अश्विनी छत्रे ने बताया कि 2012-2017 के अंत तक गेंहू की पैदावार 26 प्रतिशत हुई. दूसरी तरफ ज्वार के उत्पादन में इसी अवधि में 5 प्रतिशत की गिरावट आई है. लेकिन अब नई रिसर्च को देखते हुए ज्वार की पैदावार पर ध्यान देने की जरूरत है. 

इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक उत्तरी कर्नाटक के लोगों ज्वार  की दो उच्च उपज वाली किस्में विकसित की हैं. इसका नाम बीजीवी-44 और सीएसवी-29 है. बताया जा रहा है कि इन दोनों किस्मों से ज्वार के उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा. 

इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक वैज्ञानिक और ज्वार विकास कार्यक्रम के प्रमुख एसएस करभंतनल ने कहा कि बीजों की नई किस्मों की बुवाई परीक्षण के आधार पर सीमित क्षेत्रों में पूरी कर ली गई है. उन्होंने कहा, " ज्वार के पौधे लंबे होते हैं और बाकी अनाज खासतौर से गेंहू के मुकाबले में कम से कम 25 प्रतिशत ज्यादा अनाज पैदा कर सकते हैं.

उन्होंने कहा कि ये दोनों नई किस्में पुरानी किस्मों से बेहतर हैं. जो भविष्य में गेहूं की कमी को पूरा करने में मददगार साबित हो पाएंगे. आगे और भी किस्में बोई जाएगी.

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