भारत-म्यांमार में ज़मीन की होगी अदला-बदली? क्या हो सकती है चुनौती
रणधीर जायसवाल ने इन खबरों की पुष्टि तो नहीं की, लेकिन यह ज़रूर माना कि सीमा के अनसुलझे हिस्सों को सुलझाने के लिए बातचीत चल रही है.

खबरों के मुताबिक, भारत और म्यांमार मणिपुर से लगी अपनी साझा सीमा के उस हिस्से को लेकर जमीन की अदला-बदली पर विचार कर रहे हैं, जिसकी सीमा रेखा दशकों से तय नहीं हो पाई है. मंगलवार को नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, "सीमा पर कुछ ऐसे इलाके हैं, जिन्हें अभी सुलझाया जाना बाकी है. उन हिस्सों पर बातचीत चल रही है."
जायसवाल उस सवाल का जवाब दे रहे थे, जिसमें कहा गया था कि भारत मणिपुर सीमा पर म्यांमार के साथ ज़मीन की अदला-बदली पर विचार कर रहा है. उन्होंने इन खबरों की पुष्टि तो नहीं की, लेकिन यह ज़रूर माना कि सीमा के अनसुलझे हिस्सों को सुलझाने के लिए बातचीत चल रही है.
गृह मंत्रालय के अनुसार, सीमा के लगभग 1,472 किलोमीटर हिस्से को सीमा-स्तंभों (Boundary Pillars) के ज़रिए चिह्नित किया जा चुका है, जबकि लगभग 171 किलोमीटर का हिस्सा अब भी अनसुलझा है. यह मुख्य रूप से अरुणाचल प्रदेश के लोहित सेक्टर और मणिपुर की कबाव घाटी में स्थित है.

उनका यह बयान अमेरिका की मैगज़ीन 'द डिप्लोमैट' की उस रिपोर्ट के कुछ सप्ताह बाद आया है, जिसमें दावा किया गया था कि नई दिल्ली ऐसे एक प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर रही है. 17 जुलाई को प्रकाशित रिपोर्ट, जिसमें एक 'सरकारी दस्तावेज़' का हवाला दिया गया था, के अनुसार भारत सरकार म्यांमार के साथ मणिपुर सीमा पर मौजूद बॉर्डर पिलर 65 और 68 के बीच सीमांकन पूरा करने के लिए एक प्रस्ताव पर विचार कर रही है. इस प्रस्ताव के तहत लगभग 1.4 वर्ग मील ज़मीन की अदला-बदली की बात कही गई है. पिलर 65 और 68 के बीच की दूरी लगभग 2.8 किलोमीटर है.
आइए, पहले पूरी खबर को समझते हैं.
क्या है प्रस्ताव?
रिपोर्ट के अनुसार, भारत और म्यांमार मणिपुर के चंदेल ज़िले और म्यांमार के सागाइंग क्षेत्र की कबाव (Kabaw) वैली से लगे लगभग 2.8 किलोमीटर लंबे एक अविनिर्धारित सीमा-खंड को अंतिम रूप देने पर विचार कर रहे हैं.
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लगभग 1.4 वर्ग मील क्षेत्र के आदान-प्रदान (Territory Exchange) का विकल्प एक आधिकारिक दस्तावेज़ में विचाराधीन है, ताकि सीमा का स्थायी निर्धारण किया जा सके.
आपको बता दें कि, पड़ोसी देशों के साथ इलाकों का आदान-प्रदान कोई नई बात नहीं है. 2015 में भारत और बांग्लादेश ने भूमि सीमा समझौते को लागू किया था. इसके तहत भारत ने अपने क्षेत्र में स्थित 111 एन्क्लेव बांग्लादेश को सौंपे थे, जबकि बदले में 51 बांग्लादेशी एन्क्लेव भारत को मिले थे. इससे 41 वर्ष पुराने सीमा विवाद का समाधान हुआ था.
भारत म्यांमार के साथ इलाकों के आदान-प्रदान पर क्यों विचार कर सकता है?
2024 में भारत ने 1,643 किलोमीटर लंबी पूरी भारत-म्यांमार अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बाड़ लगाने की योजना की घोषणा की थी. इसके साथ ही भारत-म्यांमार सीमा पर लागू फ्री मूवमेंट रिजीम (Free Movement Regime) को भी समाप्त करने का फैसला लिया गया.
यह व्यवस्था 2018 से लागू थी, जिसके तहत सीमा के पास रहने वाले आदिवासी समुदायों को बॉर्डर पास के आधार पर बिना वीज़ा के एक-दूसरे के क्षेत्र में 16 किलोमीटर तक आने-जाने की अनुमति थी.
मौजूदा भारत-म्यांमार सीमा 1967 के द्विपक्षीय समझौते के तहत तय की गई थी, लेकिन इसके कुछ हिस्से अब भी अनसुलझे हैं. 2018 में सरकार ने संसद को बताया था कि शेष हिस्सों का सीमांकन द्विपक्षीय सीमा तंत्र (Bilateral Boundary Mechanism) के माध्यम से किया जाएगा. इसके तहत नौ सीमा-स्तंभों (Boundary Pillars) की पहचान और स्थापना का काम शामिल है.
मणिपुर में सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में बॉर्डर पिलर 64 और 68 के बीच मोल्चम सेक्टर, पिलर 75 और 79 के बीच मोरेह सेक्टर तथा पिलर 88 और 95 के बीच चोरो खुनौ सेक्टर शामिल हैं.
भारत का हमेशा से यह कहना रहा है कि म्यांमार के साथ उसका कोई बड़ा सीमा विवाद नहीं है, बल्कि केवल नौ सीमा-स्तंभ ऐसे हैं जिनका सीमांकन अभी बाकी है और जिन्हें द्विपक्षीय तंत्र के माध्यम से सुलझाया जा रहा है.
अगर ज़मीन की अदला-बदली हुई तो मणिपुर में कैसी होगी प्रतिक्रिया?
अगर भारत-म्यांमार के बीच भूमि विनिमय या सीमा निर्धारण का कोई समझौता होता है, तो मणिपुर में अलग-अलग समुदायों और संगठनों की प्रतिक्रियाएं भी अलग-अलग हो सकती हैं. मैतेई संगठन इसका विरोध कर सकते हैं और विरोध उग्र रूप भी ले सकता है. वहीं कांग्रेस समेत विपक्षी दल भी इसे केंद्र सरकार के खिलाफ एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना सकते हैं.
आइए देखते हैं कि किन स्तरों पर प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है.
1. मैतेई संगठनों का विरोध
COCOMI जैसे संगठनों ने पहले ही साफ कर दिया है कि यदि मणिपुर की एक इंच ज़मीन भी किसी दूसरे देश को दी जाती है, तो वे इसका विरोध करेंगे. ऐसे में यदि सरकार इस दिशा में कोई फैसला लेती है, तो व्यापक जनआंदोलन शुरू हो सकता है.
इम्फाल घाटी में बंद, धरना, रैलियां और अन्य विरोध प्रदर्शन देखने को मिल सकते हैं. सरकार के लिए यह चुनौती इसलिए भी बड़ी होगी, क्योंकि मणिपुर में पहले भी "क्षेत्रीय अखंडता" के मुद्दे पर बड़े जनआंदोलन हो चुके हैं.

2. कुकी और मैतेई समुदायों के बीच बहस
यह मुद्दा पहले से जारी जातीय तनाव को और बढ़ा सकता है. ऐसे में स्थिति और अधिक संवेदनशील हो सकती है. अलग-अलग समुदाय सीमा, सुरक्षा और ऐतिहासिक दावों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं. इसलिए इस विषय पर राजनीतिक और सामाजिक बयानबाज़ी तेज़ होने की आशंका है.
हालांकि, यह सभी केवल आशंकाएं हैं. अभी तक भारत सरकार ने किसी भूमि विनिमय को मंज़ूरी देने या किसी अंतिम समझौते की आधिकारिक घोषणा नहीं की है. विदेश मंत्रालय ने केवल इतना कहा है कि भारत और म्यांमार के बीच कुछ अविनिर्धारित सीमा-खंडों (Undemarcated Border Stretches) को लेकर बातचीत जारी है.






















