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LAC पर चीन के खिलाफ भारत की चुनौती को है अमेरिका का मजबूत समर्थन हासिल

इस बदलाव के निशान बीते दो महीनों के दौरान अमेरिका की तरफ से भारत के समर्थन में आए बयानों और दोनों मुल्कों के रक्षा और सुरक्षा से जुड़े नेताओं के बीच हुए संवाद में नजर आते हैं.

नई दिल्ली: कोरोन वायरस महामारी से आए भूकंप ने यूं तो दुनिया में अंतरराष्ट्रीय सियासत की जमीन काफी बदली है. इसने जहां अमेरिका और चीन के बीच खाई को गहरा दिया है, वहीं भारत और अमेरिका के बीच करीबी बढ़ा दी है. रही-सही कसर वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन के आक्रामक तेवरों ने पूरी कर दी, जिसके चलते अमेरिका अब भारत के साथ लगातार संवाद और साझेदारी गहराने में लगा है.

इस बदलाव के निशान बीते दो महीनों के दौरान अमेरिका की तरफ से भारत के समर्थन में आए बयानों और दोनों मुल्कों के रक्षा और सुरक्षा से जुड़े नेताओं के बीच हुए संवाद में नजर आते हैं. अमेरिका के रक्षा मंत्री मार्क एस्पर ने एक कार्यक्रम के दौरान मंगलवार को कहा कि भारत और चीन के सीमा तनाव में अमेरिका बारीकी से नजर बनाए हुए है. इतना ही नहीं एस्पर ने अपने बयान को लेकर भारतीय मीडिया में छपी खबर को भी ट्वीट कर कहा कि अमेरिका वाकई काफी बारीकी से नजर बनाए हुए है. इससे पहले अमेरिकी रक्षा मंत्री एस्पर भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से भी फोन पर बात कर चुके हैं, जिसमें चीन के सीमा तनाव का मामला भी उठा था.

अमेरिकी रक्षा मंत्री का बयान भारत और अमेरिका की नौसेनाओं के बीच हिंद महासागर में हुए पासेक्स नौसैनिक अभ्यास के बाद आया. इस अभ्यास में अमेरिकी विमान वाहक पोत यूएसएस निमित्स और उसके कैरियर स्ट्राइक ग्रुप के जहाज तथा भारतीय नौसेना के आधा दर्जन से अधिक युद्धपोत शामिल हुए थे. महत्वपूर्ण है कि दक्षिण चीन सागर में चीन के खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ाने में जुटे अमेरिका ने बीते कुछ हफ्तें के दौरान कई बार भारत को एक अहम रणनीतिक साझेदार करार दिया है.

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो की तरफ से गत 9 जुलाई को आए बयान में कहा गया था कि मैंने इस बारे में भारत के विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर से कई बार बात की है. चीन ने सीमा पर काफी आक्रामक कार्रवाई की है और भारत ने इसका अच्छे से जवाब दिया है. इतना ही नहीं पॉम्पियो ने चीन की आक्रामक रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा था कि हिमालय के पहाड़ों से लेकर वियतनाम के समुद्री इलाकों तक सीमा विवाद खड़ा करने का एक रवैया नजर आ रहा है. दुनिया इसकी इजाजत नहीं दे सकती. अमेरिका ने 15 जून को हुए गलवान घाटी के संघर्ष के बाद भी बयान जारी कर जहां भारतीय सैनिकों की शहादत पर शोक जताया था वहीं हालात को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराई थी.

दोनों देशों की साझेदारी केवल बयानों तक ही सीमित नहीं है. बल्कि जानकार सूत्रों के मुताबिक अमेरिका ने चीन के पैंतरों को लेकर कई अहम सूचनाएं भी भारत के साथ साझा की हैं. सूत्रों की मानें तो चीन के बड़े सैन्य जमावड़े को लेकर महत्वपूर्ण जानकारियां मई की शुरुआत में ही भारत को दे दी थी. इसके चलते भारत को इस बात का आकलन लग गया था कि चीन बड़ी तैयारी के साथ विवाद के अखाड़े में उतरा है.

सूत्रों के मुताबिक अमेरिका की तरफ से भारत को हाई-रैज्योलूशन और 25 मीटर से कम की दृश्यता वाली सैटेलाइट तस्वीरों, सैन्य सैटेलाइट के इंटरसेप्ट समेत कई संवेदनशील जानकारियां उपलब्ध कराई हैं. बताया जाता है कि बीते दिनों दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों और वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के बीच भी बातचीत हुई है.

इतना ही नहीं इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को अपनी प्राथमिकता करार दे रहे अमेरिका ने भारत को सैन्य तरीके से मजबूत करने के भी बराबर संकेत दिए हैं. अमेरिकी रक्षा मंत्री के शब्दों में यह उम्मीद है कि चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी अपने रवैये में बदलाव करेगी. लेकिन हमें इसके खिलाफ तैयारी मजबूत रखनी होगी. अमेरिका इसके लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी को भविष्य की चुनौतियों के लिहाज से बढ़ा रहा है.

एस्पर ने कहा कि अमेरिका की ताकत है, उसके सहयोगियों का व्यापक नेटवर्क. अमेरिकी रक्षा मंत्री ने भारत के साथ सहयोग को निर्णायक साझेदारी भी करार दिया. उनके मुताबिक, भारत और अमेरिका का रक्षा सहयोग बहुत अहम है. इसे 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण साझेदारी कहा जा सकता है.

भारत और अमेरिका जल्द ही जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर मालाबार संयुक्त नौसैनिक अभ्यास करेंगे. यह कई सालों बाद होगा कि चीन के दबदबे को चुनौती देने के लिए बनी अंतरराष्ट्रीय चौकड़ी के चारों में मुल्क एक साथ भारत की मेजबानी में संयुक्त अभ्यास करेंगे. इतना ही नहीं अमेरिका ने अपनी नए रक्षा तैयारी दस्तावेजों में भारत समेत कई देशों के साथ अधिक सैन्य सहयोग, संयुक्त अभ्यास और साझा प्रशिक्षण पर जोर दिया है.

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