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Explained: भारत में लोग एक ही बच्चा पैदा करेंगे! महिलाओं की नौकरी-शिक्षा और देर से शादी कैसे बनेगी वजह?

India Fertility Crisis: आने वाले सालों में भारत में बच्चे पैदा करना सिर्फ पर्सनल डिसीजन नहीं, बल्कि देश की सामूहिक जरूरत बन सकता है. आबादी के मामले में संतुलन ही सबसे बड़ी पूंजी है- न ज्यादा, न कम.

भारत की जन्म दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे गिर चुकी है. देश में जन्म और मृत्यु के आधिकारिक आंकड़े जुटाने वाली संस्था SRS की लेटेस्ट रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि  दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश अब आबादी के सिकुड़ने की तरफ बढ़ रहा है. जिस देश को हम हमेशा बढ़ती आबादी के लिए कोसते रहे, वह अब एक नई मुसीबत की दहलीज पर खड़ा है. यह मुसीबत है कम होती जन्म दर, जो भविष्य में हमारी अर्थव्यवस्था, समाज और यहां तक कि सुरक्षा तक पर गहरा असर डालने वाली है. आइए एक्सप्लेनर में समझते हैं कि यह चिंता की बात क्यों है, इसके पीछे क्या वजहें हैं और आगे क्या हो सकता है...

पहले समझिए कि 'रिप्लेसमेंट लेवल' और भारत की स्थिति क्या है?

इसे ऐसे समझिए कि कोई भी आबादी स्थिर बनी रहे, इसके लिए जरूरी है कि एक मां अपने जीवनकाल में औसतन 2.1 बच्चों को जन्म दे. इसे टोटल फर्टिलिटी रेट यानी TFR कहते हैं. 2.1 का मतलब है कि मां-बाप दोनों की जगह लेने के लिए दो बच्चे तो चाहिए ही, साथ में शिशु मृत्यु दर और अन्य कारणों से होने वाली क्षति की भरपाई के लिए 0.1 का एक्स्ट्रा कुशन भी जरूरी है. अगर TFR 2.1 से ऊपर रहेगा तो आबादी बढ़ेगी. अगर 2.1 से नीचे गिर जाए तो आबादी घटने लगती है, पहले धीरे-धीरे और फिर तेजी से.

अब बात करते हैं भारत की. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) जो 2019-21 के बीच हुआ था, उसके अनुसार भारत का TFR उस दौरान 2.0 रहा यानी ठीक रिप्लेसमेंट लेवल के आसपास. लेकिन अभी द लांसेट में प्रकाशित ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी 2021 और सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) के ताजा आंकड़ों में भारत का TFR 1.9 पर आ गया है.

1950 में यह दर 6.18 थी यानी तब एक महिला औसतन छह से ज्यादा बच्चों को जन्म देती थी. वहां से अब 1.9 तक का सफर अपने आप में एक ऐतिहासिक गिरावट है. अल जजीरा ने अपनी हालिया रिपोर्ट में इसे भारत के लिए एक टर्निंग प्वाइंट बताया है.

भविष्य के अनुमान और भी डराने वाले हैं. लैंसेट की उसी स्टडी के मुताबिक, 2050 तक भारत का TFR 1.29 तक गिर सकता है और 2100 तक तो 1.04 तक पहुंचने का अनुमान है. यह स्थिति उन देशों जैसी है जहां आबादी तेजी से सिकुड़ रही है, जैसे दक्षिण कोरिया, जापान या चीन. तो जिस देश ने अभी-अभी चीन को पीछे छोड़कर सबसे ज्यादा आबादी वाले देश का तमगा हासिल किया, वह अगली ही सदी में आबादी के मामले में सिकुड़ता हुआ नजर आ सकता है.

महिलाओं की बदलती जिंदगी और शहरी महंगाई ने कैसे रची कहानी?

 पुरुष आयोग NGO की प्रेसीडेंट और सोशल एक्टिविस्ट बरखा त्रेहान इस गिरावट के पीछे तीन बड़े और आपस में गुंथे कारण बताती हैं:

  1. महिला शिक्षा और वर्कफोर्स में बढ़ती भागीदारी: जिन राज्यों में लड़कियों की स्कूली शिक्षा और महिला रोजगार दर जितनी ऊंची है, वहां का TFR उतना ही नीचे है. अब महिलाएं देर से शादी कर रही हैं और करियर पहली प्राथमिकता है. जब परिवार बढ़ाने का वक्त आता है तो सोच-समझकर एक या ज्यादा से ज्यादा दो बच्चों पर रुक जाना पसंद करती हैं. केरल में यह ट्रेंड दशकों पहले शुरू हो गया था और अब बाकी देश तेजी से उसी राह पर चल पड़ा है.
  2. शहरीकरण का दबाव और परवरिश का खर्च: शहरी-ग्रामीण आंकड़ों पर नजर डालें तो शहरी इलाकों में TFR 1.6 के आसपास है जबकि ग्रामीण भारत अभी भी 2.1 से थोड़ा ऊपर टिका हुआ है. शहरों में रहन-सहन का खर्च, अच्छे स्कूलों की फीस, महंगा इलाज और फिर आगे चलकर बच्चों के भविष्य की चिंता. ये सब मिलकर युवा जोड़ों पर ऐसा प्रेशर डाल रहे हैं कि वे दूसरा या तीसरा बच्चा पैदा करने से कतराते हैं. अब बच्चों को बुढ़ापे का सहारा मानने वाली सोच खत्म हो चुकी है. आज का युवा जोड़ा क्वालिटी ऑफ लाइफ को क्वांटिटी से ऊपर रखता है. वो दो बच्चों को बेहतरीन जिंदगी देना चाहता है, बजाय इसके कि तीन-चार को जन्म देकर सबकी जिंदगी औसत बना दे.
  3. बांझपन और स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें: खराब लाइफस्टाइल, तनाव, प्रदूषण, शादी में हो रही लगातार देरी और PCOD जैसी समस्याओं की वजह से ऐसे जोड़ों की तादाद लगातार बढ़ रही है जो चाहकर भी एक से ज्यादा बच्चे पैदा नहीं कर पा रहे. भारत में शहरी क्षेत्रों की हर छह में से एक जोड़ा इनफर्टिलिटी की समस्या से जूझ रहा है. यह सिर्फ एक मेडिकल समस्या नहीं रह गई है, बल्कि अब इसने जनसांख्यिकीय बदलाव की रफ्तार को और तेज कर दिया है.

एक भारत लेकिन उत्तर-दक्षिण की अलग तस्वीरें

भारत की यह गिरावट भी एक समान नहीं है. देश के अंदर दो तस्वीरें हैं, जो बिलकुल उलट हैं. केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और पंजाब जैसे राज्यों में TFR बहुत पहले ही 2.0 से नीचे जा चुका है. केरल का TFR तो करीब 1.5 है, जो यूरोपीय देशों के बराबर है. वहीं दूसरी तरफ बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में TFR अभी भी 2.1 के आसपास या उससे थोड़ा ऊपर है. केरल में जन्म दर 5.2 से सीधे 1.9 पर आ गई, जबकि बिहार में यह अभी भी 2.5 से 3.0 के बीच घूम रही है.

इस असमान गिरावट के बड़े राजनीतिक और सामाजिक मतलब हैं. जो राज्य ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं, वे भविष्य में ज्यादा लोकसभा सीटों और संसाधनों की मांग करेंगे, जबकि परिवार नियोजन में सफल रहे दक्षिणी राज्यों को इसका 'दंड' भुगतना पड़ सकता है. साउथ के राज्य पहले से ही परिसीमन को लेकर चिंतित हैं, जिसमें जनसंख्या के आधार पर संसदीय सीटों की रिशेड्यूलिंग हो सकती है. इसके अलावा कम आबादी वाले राज्यों में बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक दूसरे राज्यों से आते हैं, जिससे स्थानीय जनसंख्या का संतुलन भी बदल रहा है. यह अपने आप में एक सामाजिक तनाव का कारण बन रहा है.

तो क्या अब जवान देश बूढ़ा होने लगेगा?

इस गिरती जन्म दर का सबसे बड़ा और पहला असर होगा बुजुर्गों की बढ़ती आबादी और युवाओं की घटती संख्या. भारत को अभी तक अपनी 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' यानी युवा आबादी के बड़े हिस्से पर बहुत नाज था. कहा जाता था कि भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा शक्ति है, जो अर्थव्यवस्था को गति देगी. लेकिन अब जब जन्म दर 1.9 है, तो अगले 20-30 सालों में इस युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा बुजुर्ग हो जाएगा.

बुजुर्गों की जगह लेने के लिए नई पीढ़ी पर्याप्त संख्या में नहीं आएगी. मीडिया रिपोर्ट में इसी बात की चेतावनी दी गई है कि बढ़ती डिपेंडेंसी रेशियो (यानि कामकाजी लोगों पर बुजुर्गों का बढ़ता बोझ) देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा संकट हो सकता है.

चीन और जापान का उदाहरण हमारे सामने है. जापान में तो स्थिति इतनी खराब है कि स्कूल बंद हो रहे हैं और नर्सिंग होम खुल रहे हैं. चीन ने एक बच्चे की नीति खत्म करने के बाद अब तीन बच्चों तक की अनुमति दे दी, लेकिन लोग फिर भी बच्चे नहीं पैदा करना चाहते. भारत में भी यही हो सकता है. सरकार चाहे जितना लालच दे, लेकिन लोगों का भरोसा और आर्थिक स्थिति ही यह तय करेगी कि वे परिवार बढ़ाना चाहते हैं या नहीं.

स्पेसएक्स के फाउंडर एलन मस्क ने X पर ट्वीट करते हुए कहा, 'जनसंख्या विस्फोट एक धीमी गति का विस्फोट है, लेकिन इसके नतीजे उतने ही विनाशकारी होंगे.' आने वाले समय में पेंशन सिस्टम पर दबाव, स्वास्थ्य सेवाओं की बदलती मांग और सेना में युवाओं की भर्ती में कमी, ये सब सीधे-सीधे गिरती जन्म दर से जुड़ी समस्याएं होंगी.

क्या वाकई वो दिन दूर नहीं जब लोग एक ही बच्चा पैदा करेंगे?

इस सवाल का जवाब बिल्कुल सीधा है कि वो दिन अब दूर नहीं, बल्कि कई इलाकों में तो आ चुका है. दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में एक बच्चे वाले परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. यह ट्रेंड अब छोटे शहरों और कस्बों में भी पहुंच रहा है. ऐसे में डर यह नहीं है कि भारत की आबादी कम हो जाएगी, बल्कि डर यह है कि यह कमी बहुत तेज और बहुत असंतुलित होगी. अगले 30-40 साल तक तो भारत की आबादी बढ़ती ही रहेगी क्योंकि अभी भी प्रजनन आयु वर्ग में बड़ी संख्या में लोग हैं, लेकिन 2060 के बाद जब यह पीढ़ी बुजुर्ग होने लगेगी, तब हकीकत सामने आएगी.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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