अगर समान नागरिक संहिता लागू हो गई तो उससे देश को क्या लाभ होगा?

नई दिल्ली: पीएम नरेंद्र मोदी ने आज मुस्लिम समुदाय से अनुरोध किया कि वह यह सुनिश्चित करे कि तीन तलाक के मुद्दे का ‘राजनीतिकरण’ न हो और उम्मीद जताई कि इस प्रथा से निपटने के लिए समुदाय के बुद्धिजीवी ही सामने आयेंगे.
कन्नड दार्शनिक बसवेश्वर की जयंती पर यहां एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुये मोदी ने उम्मीद जताई कि भारत के मुसलमान दुनिया भर में अपने समकक्षों को ‘आधुनिकता का मार्ग दिखायेंगे.’ उन्होंने कहा, ‘इन दिनों तीन तलाक पर काफी बहस हो रही है. भारत की महान परंपरा को देखते हुये मेरे मन में यह उम्मीद है कि देश में इस समुदाय के प्रभावशाली लोग इस पुरानी हो चुकी व्यवस्था को खत्म करने के लिये आगे आयेंगे और आधुनिक व्यवस्था विकसित करेंगे.’ अपने 40 मिनट के संबोधन में प्रधानमंत्री ने महिला सशक्तिकरण, समानता और सुशासन के बारे में बातें कीं.
तीन तलाक के संदर्भ में उन्होंने कहा, ‘यह हमारे देश की मिट्टी की ताकत है कि मुस्लिम समुदाय के लोग ही इस परेशानी से हमारी माताओं और बहनों को बचाने के लिये आगे आयेंगे.’ प्रधानमंत्री ने समारोह में मौजूद लोगों से कहा,‘मैं समुदाय के लोगों से अनुरोध करूंगा कि इस मुद्दे का राजनीतिकरण न होने दें.’ तीन तलाक पर पीएम मोदी : महिलाओं के हक की लड़ाई लड़ने आगे आए मुस्लिम समाज, राजनीति न हो
तीन तलाक के बहस के बीच समान नागरिक संहिता के बारे में भी आपको ये जानकारी होनी चाहिए संविधान बनने के समय से ही समान नागरिक संहिता पर बहस हो रही है. सुप्रीम कोर्ट ने 1985 समान नागरिक संहिता से संबंधित कानून बनाने का निर्देश दिया था. सवाल उठता है कि अगर समान नागरिक संहिता अगर लागू हो गई तो उससे देश को क्या लाभ होगा?
समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड का अर्थ होता है भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून होना, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो? समान नागरिक संहिता में शादी, तलाक और... जमीन-जायदाद के बंटवारे सहित गोद लेने में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा.
समान नागरिक संहिता लागू हुई तो देश में क्या होगा, देश में क्या बदल जाएगा? ये कहना मुश्किल है क्योंकि कोई कानून न तो लागू है, न उसका कोई प्रस्ताव. ये जरूर है कि समान नागरिक संहिता शादी और तलाक के मामले में हर धर्म को एक प्लेटफार्म पर ला सकता है.
यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने से हर मजहब के लिए एक जैसा कानून आ जाएगा. जैसे हिंदुओं को दो पत्नियां रखने की इजाजत नहीं वैसे मुस्लिमों को भी चार शादियों की इजाजत नहीं मिलेगी. जैसे हिंदू पति-पत्नी बिना अदालत से पूछे तलाक नहीं ले सकते वैसे ही मुस्लिम पति भी तीन बार तलाक कहकर पत्नी से छुटकारा नहीं पा सकता.
इस समय देश में हिन्दू धर्म को छोड़कर हर धर्म के लोग शादी-ब्याह...संपत्ति और गोद लेने में अपने पर्सनल लॉ का पालन करते हैं. फिलहाल मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय का पर्सनल लॉ है जबकि हिन्दू सिविल लॉ के तहत हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं.
इस समय देश के मुस्लिमों के लिए मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड है. जिसके तहत शादीशुदा मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को महज तीन बार तलाक कहकर तलाक दे सकता है. हालांकि मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक के और भी तरीके दिए गए हैं, लेकिन उनमें से तीन बार तलाक भी एक प्रकार का तलाक माना गया है, जिसे कुछ मुस्लिम विद्वान शरीयत के खिलाफ भी बताते हैं. तलाक के बाद अगर दोनों फिर से शादी करना चाहते हैं तो महिला को पहले किसी और पुरुष के साथ शादी रचानी होगी. उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने होंगे. इसे हलाला कहा जाता है. उससे तलाक लेने के बाद ही वो पहले पति से फिर शादी कर सकती है. इस लॉ में महिलाओं को तलाक के बाद पति से किसी तरह के गुजारे भत्ते या संपत्ति पर अधिकार नहीं दिया गया है बल्कि मेहर अदायगी का नियम है. तलाक लेने के बाद मुस्लिम पुरुष तुरंत शादी कर सकता है जबकि महिला को इद्दत के निश्चित दिन गुज़ारने पड़ते हैं. अगर समान नागरिक संहिता लागू हो जाए तो मुस्लिम महिलाओं को इन परेशानियों से मुक्ति मिल जाएगी.
क्यों है देश में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता? दरअसल अलग-अलग धर्मों के अलग कानून से न्यायपालिका पर बोझ पड़ता है. समान नागरिक संहिता लागू होने से इस परेशानी से निजात मिलेगी और अदालतों में सालों से लंबित पड़े मामलों के फैसले जल्द होंगे. समान नागरिक संहिता के लागू होने के बाद शादी, तलाक, गोद लेना और जायदाद के बंटवारे में सबके लिए एक जैसा कानून होगा फिर चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों न हो.
इस समय हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ यानी निजी कानूनों के तहत करते हैं. सभी के लिए कानून में एक समानता से देश में एकता बढ़ेगी और जिस देश में नागरिकों में एकता होती है वह देश तेजी से विकास के पथ पर आगे बढ़ता है.
इतना ही नहीं हर भारतीय पर एक समान कानून लागू होने से देश की राजनीति पर भी असर पड़ेगा और राजनीतिक दल वोट बैंक वाली राजनीति नहीं कर सकेंगे और वोटों का ध्रुवीकरण नहीं होगा. सुप्रीम कोर्ट के बहुत सारे फैसले हैं जिसमें कहा गया है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार ये सेक्युलरिज्म का पार्ट हैं, ये पर्सनल कानून या आस्था से नहीं चल सकते. ऐसा नहीं हो सकता कि एक महिला तलाक ले तो उसे दस रुपये मिलें और दूसरी महिला तलाक ले तो उसे एक पैसा न मिले.
पिछले ही साल ईसाई समुदाय के एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी कि देश में समान नागरिक संहिता लागू की जाए. याचिका में कहा गया था कि ईसाई दंपति को तलाक लेने के लिए दो वर्ष तक अलग रहने का कानून है जबकि हिंदू और दूसरे कानूनों में स्थिति अलग है. इसी सिलसिले में समान नागरिक संहिता की बात उठी थी जिस पर कोर्ट ने केंद्र से अपना रुख स्पष्ट करने को कहा था.
संविधान में व्यक्तिगत रूप से हमें अपने धर्म के मुताबिक जीवन जीने की आजादी मिली है. दो व्यक्ति धर्म और उसके रीति रिवाज के हिसाब से विवाह बंधन में बंध सकते हैं लेकिन जब इनके बीच संबंधों में टकराव आता है तो जाहिर है ये धर्म नहीं बल्कि संविधान में दिये गए इंसान के अधिकारों और उससे जुड़े कानून का मामला बन जाता है.
Source: IOCL


























