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क्या अखिलेश के 'यादवराज' के जवाब में योगी के निशाने पर होंगे यादव सरनेम वाले अफसर ?

नई दिल्ली: यूपी में सरकार बदल चुकी है. रोज रोज नए फरमान आ रहे हैं लेकिन अभी तक वो फरमान नहीं आया जो अमूमन नई सरकार के आने पर सबसे पहले आ जाता है. थोक में ट्रांसफर-पोस्टिंग का. योगी ट्रांसफर की पुरानी परम्परा को आगे ले जाएंगे या नहीं, ये कोई नहीं जानता लेकिन इससे पहले ट्रांसफर को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया यूपी में पोस्टेड एक आईपीएस अफसर के टवीट से. हिमांशु कुमार नाम के आईपीएस ने आशंका जता दी कि योगी सरकार यादवों को निशाना बनाएगी. चूंकि चुनाव प्रचार में अखिलेश सरकार में यादव बड़ा राजनीतिक मुद्दा थे इसलिए सवाल खड़ा हो गया है कि क्या योगी के निशाने पर यादव सरनेम वाले अफसर होंगे? आईपीएस हिमांशु ने आशंका जताई कि योगी आदित्यनाथ अब यादव सरनेम वाले अफसरों को निशाना बनाएंगे. आईपीएस हिमांशु कुमार ने टवीट किया कि योगी सरकार बनते ही अफसरों में यादव सरनेम वाले पुलिसकर्मियों को सस्पेंड या रिजर्व लाइन में भेजने की होड़ लग गई है. अपने बॉस डीजीपी जाविद अहमद पर निशाना साधते हुए हिमांशु ने लिखा कि क्यों डीजीपी दफ्तर अफसरों को मजबूर कर रहा है कि वो जाति के नाम पर लोगों को सजा दे. यूपी के एक आईपीएस का इतना लिखना था कि हंगामा मच गया. योगी ने अभी तक बड़े पदों पर न तो किसी को बिठाया है, न हटाया है. करेंगे या नहीं करेंगे, ये भी कोई दावा नहीं कर सकता है लेकिन यादव ब्रांडेड समाजवादी पार्टी फौरन ये कहने के लिए मैदान में कूद गई कि जो हो रहा है गलत हो रहा है. मतलब योगी राज में यादवों को निशाना बनाना गलत है. गौर करने वाली बात ये है कि हिमांशु कुमार खुद यादव जाति के नहीं हैं. अभी लखनऊ में डीजीपी हेडक्वाटर में तैनात हैं. मैनपुरी और फिरोजाबाद के एसपी चुके हैं. हिमांशु पर टिवटर पर सक्रिय रहते हैं. उनके टिवटर पेज पर गौर कीजिए. वो पीएम मोदी, योगी आदित्यनाथ, बीजेपी सरकार के मंत्रियों से जुड़े टवीट औऱ खबरों को रीटवीट करते रहते हैं. यहां तक कि 18 मार्च को टवीट करके उन्होंने योगी आदित्यनाथ को बधाई भी दी और ये आशंका भी जताई कि उनको ट्रोल्स यानी टिवटर पर सक्रिय आलोचकों का सामना करना पड़ेगा. इतनी देर मे तो हिमांशु को समझ आ गया कि कुछ कांड हो गया इसलिए उन्होंने योगी सरकार में यादवों को निशाना बनाने की आशंका वाले अपने इस टवीट को डिलीट कर दिया. ये कहते हुए कि उनके टवीट को गलत समझा गया. वो सरकार का समर्थन करते हैं. यूपी में यादवों की आबादी करीब 9 प्रतिशत है लेकिन चूंकि समाजवादी पार्टी का नेतृत्व यादव है इसलिए जब जब समाजवादी पार्टी की सरकार बनी तब तब यादव जाति के अफसरों की पूछ बढ़ी. वैसे जो अखिलेश ने किया वो मायावती ने भी अपने वक्त में अपनी पसंद की जातियों के साथ किया था. अब सवाल ये है कि जो अखिलेश औऱ मायावती कर चुके हैं क्या उसी रास्ते पर योगी चलेंगे और अपनी पसंद की जाति के अफसरों को तैनात करके यूपी को बदलने का दावा करेंगे? यूपी के एक आईपीएस के यादव अफसरों को निशाना बनाने की आशंका ने ये सवाल जिंदा कर दिया है कि क्या यूपी में यादव सरनेम वाले पुलिस वाले योगी सरकार के निशाने पर होंगे. अगर ये सवाल है तो इस सवाल के पीछे एक अतीत है और अतीत में अखिलेश के राजपाट में यादवों की ऐश को लेकर बीजेपी नेताओं की 5 साल तक जकड़ी खुन्नस. यूपी चुनाव में अखिलेश यादव का यादव प्रेम बड़ा चुनावी मुद्दा बना रहा है. मोदी जब अखिलेश के काम नहीं कारनामे गिनाते थे तब उनके निशाने पर यूपी के थाने भी होते थे जिन पर दिखता थी समाजवादी पार्टी की यादव छाप. खुद पीएम मोदी ने लखीमपुर खीरी की रैली में आरोप लगाया था कि अखिलेश यादव सरकार में हर थाने को समाजवादी पार्टी का कार्यालय बना दिया गया. जाति देखकर यूपी में काम होता है. आदित्यनाथ योगी की भी नजर तब से यूपी के थाने पर थी जब वो सीएम उम्मीदवार प्रोजेक्ट भी नहीं किए गए थे. चुनाव प्रचार के दौरान योगी खुलेआम आरोप लगा चुके हैं कि समाजवादी पार्टी की सरकार में सिर्फ और सिर्फ यादवों की बहाली होती है. बीएसपी प्रमुख मायावती जब खुद मुख्यमंत्री थी तब अघोषित रूप से यूपी के 30 प्रतिशत थाने अनुसूचित जाति के थानेदारों के लिए रिजर्व हुआ करते थे लेकिन जब अखिलेश के राज में यादवों की तूती बोलने लगी तो मायावती ने खुद उनके खिलाफ आवाज उठाई थी. देश का संविधान किसी को इजाजत नहीं देता कि वो जाति या धर्म देखकर किसी की नियुक्ति करे या किसी का काम करने या नहीं करने का फैसला करे लेकिन समाजवादी पार्टी के राज में अलग संविधान चला. नाम के साथ यादव सरनेम हो तो समझो रंगदारी, दादागीरी, रौब झाड़ का लाइसेंस मिल गया हो. एबीपी न्यूज संवाददाता पंकज झा ने अखिलेश के राजपाट में जुलाई 2015 में गहरी जांच करके रिपोर्ट तैयार की थी. तब जांच में पता चला था कि यूपी के कुल 75 जिलों के 1526 थाने में करीब 600 थानेदार यादव हैं. लखनऊ में 43 पुलिस थाने में से 20 थानों पर यादव थानेदार नियुक्त थे. गाजियाबाद के 17 में से 9 थानों पर, फिरोजाबाद के 21 में से 9 थानों पर, कानपुर में 44 में से 17 थानों पर, बदायूं के 22 में से 11 थानों पर, मथुरा में 21 में से 10 पुलिस थानों पर, इटावा के 21 में से 8 थानों पर, संभल जिले के 11 पुलिस स्टेशनों में से 7 पर यादव जाति के थानेदार तैनात थे. इस पड़ताल के बाद काफी कुछ बदल चुका है. ऐसा माना जाता है कि हंगामा मचने के बाद अखिलेश यादव ने थानों के यादव ब्रैंड को बदलने कुछ कोशिश की लेकिन थाने यादव मुक्त नहीं हुए. कई यादव थानेदारों के बारे में तो यहां तक कहा जाता था कि उनकी पहुंच सीधे मुलायम परिवार तक होती है. उन पर एसपी, आईजी यहां तक कि डीजीपी का भी जोर नहीं चलता था. मुलायम और अखिलेश यादव पर यादवों को ही नौकरी देने के भी आरोप लगते रहे हैं. मुलायम के समय 2005-2006 में यूपी में बड़े पैमाने पर पुलिस भर्ती हुई थी. करीब 18 हजार पुलिसवालों को नौकरी दी गई थी. कहा जाता था तब 35 प्रतिशत भर्तियां यादवों की हो गई थी. 2007 में मायावती ने सरकार बनते ही नौकरियों को रद्द कर दिया. 5 साल कोर्ट में केस चला. 2012 में अखिलेश के आने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने नौकरियों को बहाल कर दिया. पिता के समय बहाल बेटे के मुलाजिम बन गए. यूपी में 2002 में थानों में आरक्षण का एक आदेश निकला था. 1447 में से 724 थानों में सामान्य जाति, 303 में अनुसूचित जाति, 420 में ओबीसी थानेदारों की नियुक्ति होनी थी. अखिलेश के समय 2014 में नियम की ऐसी धज्जियां उड़ी कि 597 थाने सामान्य को, 120 दलितों को, 614 पिछड़ों को और 102 पर अल्पसंख्यक थानेदारों को बिठा दिया गया. पिछड़ों में से 80 थानेदारों के पद यादवों के हिस्से में चले गए. सरकारी रिकॉर्ड ऐसा नहीं बनता जिससे पता चले कि आज कहां किस पद पर किस जाति का अधिकारी तैनात है लेकिन ये एक सच्चाई थी कि अखिलेश के राजपाट में यहां वहां जहां देखो यादव मिल जाते थे. ढूंढना ये पड़ता था कि कहां यादव तैनात नहीं है.
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