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IN DEPTH: क्या अमेरिका को लेकर टूट गया मोदी सरकार का भ्रम?
हालांकि बीते चार बरस के दौर में भारत के पाकिस्तान से सबसे खट्टे रिश्ते बन गये. श्रीलंका की समुद्री सीमा में चीन का दखल बढ गया. नेपाल वामपंथी होकर चीन के करीब जा पहुंचा.

नई दिल्लीः 4 साल पहले 26 मई 2014 को मोदी सरकार ने प्रचंड बहुमत के साथ जब देश की बागडोर संभाली थी तो इस बड़े वादे के साथ आई थी कि भारत के संबंध अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर सभी देशों के साथ बेहतर होंगे. हालांकि 4 साल बाद आज देश के कूटनीतिक संबंध दुनिया के अन्य देशों के साथ कैसे हैं? शपथग्रहण में दिखा था अभूतपूर्व नजारा 26 मई 2014 यानि चार बरस पहले देश के इतिहास में ये पहली बार हुआ था कि कोई पीएम शपथ लेने जा रहा है और सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्ष उसमें पहुंचे. शपथग्रहण का उस समय का दृश्य देखकर यही लगा था कि मोदी काल में सार्क देशों की धुरी ना सिर्फ भारत बनेगा बल्कि सार्क देशों को एक छतरी तले लाकर भारत दुनिया में नया संदेश देगा. वो संदेश ये होगा कि आंतकवाद से लेकर व्यापार और हथियारों की होड़ खत्म करने से लेकर आपसी सदभाव के नये हालात पैदा होगें. चार बरस में भारत के विदेश से रिश्तों में आई खटास हालांकि बीते चार साल के दौर में भारत के पाकिस्तान से सबसे खट्टे रिश्ते बन गये. श्रीलंका की समुद्री सीमा में चीन का दखल बढ गया. नेपाल वामपंथी होकर चीन के करीब जा पहुंचा. मालदीव में चीनी पूंजी का दखल साफ दिखायी देने लगा. अफगानिस्तान में भारत की भूमिका के सामने पाकिस्तान ही बार बार खड़ा हो गया. डोकलाम ने भूटान से भारत की निकटता तो दिखा दी पर दूसरी तरफ नेपाल ने खामोशी बरती. वहीं जो सकारात्मक चेहरा मोदी मंत्रिमंडल के शपथग्रहण में देखा गया वो इन्ही चार साल में इतना नकारात्मक हो गया कि सार्क देशों के सम्मेलन ठप हो गये और चीन का वर्चस्व सार्क देशों में बढ गया. पाकिस्तानी आंतक के साथ चीन खड़ा हुआ तो यूएन में भारत कुछ ना कर सका. क्या अमेरिका को लेकर टूट गया मोदी सरकार का भ्रम सिर्फ सार्क ही क्यों चीन-अमेरिका-रुस के त्रिकोण तले भारत का रुख कैसे संतुलित बन पायेगा इसकी मशक्कत करते हुये प्रधानमंत्री मोदी इसी महीने चीन और रुस की अनौपचारिक यात्रा करते नजर आये जिसके बाद ये सवाल भी उठा कि क्या अमेरिका को लेकर मोदी सरकार का भ्रम टूट गया है? क्या चीन को बड़ा भाई मानने के अलावे कोई रास्ता नहीं है और क्या रुस से पारंपरिक दोस्ती ही काम आयेगी? यानी 26 मई 2014 के अक्स तले ये सवाल अभी 4 बाद भी अनसुलझा ही है कि भारत दुनिया के मानचित्र में ताकतवर देशों की कतार में शामिल है तो किसके साथ खड़ा है. क्या ताकतवर होने के पीछे सिर्फ भारत का वह बाजार है जिसमें माल बेचने के लिये दुनिया का हर विकसित देश बैचेन है और मोदी सरकार ने भारतीय बाजार के लिये हर बंदिशें खत्म करते हुये नये रास्ते बना दिये है.
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Source: IOCL























