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प्रवासी मजदूरों को गांव वापस भेजने की मांग पर SC ने बंद की सुनवाई, कहा- सरकार उठा रही है कदम

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स नाम की संस्था के जयदीप छोकर ने प्रवासी मजदूरों को वापस भेजने की मांग वाली याचिका दाखिल की थी.

नई दिल्ली: प्रवासी मजदूरों को उनके गांव वापस भेजने की मांग करने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आज सुनवाई बंद कर दी. कोर्ट ने कहा कि ''केंद्र और राज्य सरकारें इस दिशा में कदम उठा रही है.'' याचिकाकर्ता ने अभी भी सभी लोगों को घर वापस लौटने का मौका न मिलने की शिकायत की, राज्य सरकारों की तरफ से मजदूरों से 15 फ़ीसदी किराया लिए जाने की भी बात कही, लेकिन कोर्ट ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की.

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स नाम की संस्था के जयदीप छोकर ने प्रवासी मजदूरों को वापस भेजने की मांग वाली याचिका दाखिल की थी. इस पर सुनवाई करते हुए 27 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि क्या इन मजदूरों को वापस भेजने की कोई योजना बनाई जा रही है? इस बीच सरकार ने मजदूरों को वापस भेजने की अनुमति देते हुए आदेश जारी कर दिया. ट्रेन और बसों के जरिए एक राज्य से दूसरे राज्य में मजदूरों को भेजा जाना शुरू हो गया.

आज सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने जब यह मामला लगा तो जजों ने कहा, ''आप ने याचिका में जो मांग की थी, वह पूरी हो चुकी है. सरकार ने मजदूरों को उनके घर भेजे जाने की इजाजत दे दी है. मजदूरों का वापस जाना शुरू भी हो गया है.'' इस पर जवाब देते हुए याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि अभी इस प्रक्रिया में कई कमियां नजर आ रही हैं.

भूषण ने कहा, ''सरकार का आदेश फंसे हुए मजदूरों को वापस भेजने की बात कहता है. फिलहाल फंसा हुआ मजदूर उसी को माना जा रहा है, जो हाल ही में किसी इलाके में रोजगार के लिए गया था. ऐसा भेदभाव नहीं होना चाहिए. जो लोग कहीं पहले से भी रह रहे हों, उन्हें भी गांव वापस लौटने का मौका मिलना चाहिए.'' इस पर कोर्ट ने कहा, ''आप यह चाहते हैं कि हम फंसे हुए मजदूरों की परिभाषा का विस्तार करें.''

केंद्र सरकार की तरफ से मौजूद सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका पर आगे सुनवाई का विरोध करते हुए कहा, ''मैंने पिछली सुनवाई में बताया था कि सरकार पहले ही मजदूरों की वापसी को लेकर विचार की प्रक्रिया में है अब इसे शुरू किया जा चुका है. याचिका पर आगे सुनवाई की कोई जरूरत नहीं है. याचिकाकर्ता चाहते हैं कि उनकी पीआईएल के जरिए ही हर बात का माइक्रो मैनेजमेंट हो. कुछ बातें सरकार के ऊपर छोड़ देनी चाहिए. हमें लोगों को भेजते वक्त यह देखना पड़ता है कि सोशल डिस्टेंसिंग का पूरी तरह से पालन हो. जहां उन्हें भेजा गया है, वहां पर उनको क्वॉरेंटाइन में रखने की पूरी सुविधा मौजूद हो.''

प्रशांत भूषण ने आगे दलील रखते हुए कहा, ''मजदूरों के पास पैसे नहीं है लेकिन उन्हें किराया देने के लिए कहा जा रहा है.'' इस पर बेंच के सदस्य जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा, ''हमने तो पढ़ा है कि 85 फ़ीसदी किराया केंद्र सरकार दे रही है?'' भूषण का जवाब था, ''85 फीसदी किराया केंद्र सरकार दे रही हो, तब भी कुछ राज्य मजदूरों को 15 फीसदी किराया देने को कह रहे हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए.''

हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर आगे विचार करने से मना कर दिया. कोर्ट ने कहा, ''याचिका में जो मांग रखी गई थी, वह पहले ही पूरी हो चुकी है. अब इस मामले पर आगे सुनवाई की कोई जरूरत नहीं है. इसे बंद किया जाता है.''

करीब 2 दशक से सुप्रीम कोर्ट के गलियारों का एक जाना-पहचाना चेहरा. पत्रकारिता में बिताया समय उससे भी अधिक. कानूनी ख़बरों की जटिलता को सरलता में बदलने का कौशल. खाली समय में सिनेमा, संगीत और इतिहास में रुचि.
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