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ये दर्द कौन समझेगा, कब तक किसान ठगे जाते रहेंगे?

नई दिल्ली: संसद से सड़क तक सियासत की हर सांस बिना किसान मानों पूरी नहीं होती. लेकिन बुधवार को एबीपी न्यूज़ ने आपको बताया था कि कैसे देश के चार राज्यों के किसान टमाटर फेंकने को मजबूर हुए तो सियासत ने सांस वापस खींच ली. अब आज आलू के किसानों की बदहाली पर राजनीति के घड़ियाली आंसुओं की कहानी आपको बता रहे हैं. अपनी जांच हमने शुरु की मध्य प्रदेश में इंदौर के उन खेतों से जहां पैदा होने वाले आलू की चिप्स बनाने वाली बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां दीवानी हैं. इस वक्त ये इलाका अपने आलुओं के कारण दोबारा सुर्खियों में है. लेकिन इस बार आलू की बर्बादी के कारण. किसानों को आलू फेंकने के लिए मजबूर होने कारण. आलू उगाने वाला किसान अपना ही आलू क्यों फेंक रहा है? किसान के आलू से दस ग्राम चिप्स बनती है तो 10 रुपए की मिलती है. उसी किसान को एक किलो आलू के 2 रुपए क्यों नहीं मिल पा रहे हैं ? आलू इतना सस्ता है तो आपको आलू क्यों 10-15 रुपए का मिल रहा है ? देश में आलू किसान की बदहाली के लिए जिम्मेदार कौन है ? इन सारे सवालों का जवाब तलाशने की शुरुआत हमने सीधे आलू के खेत से की है. आलू उगाने वाले त्रिलोकी पूछ रहे हैं कैसे खुश रहें, जब आलू की लागत भी नहीं निकल रही. आप तो घर में बैठकर इसी आलू को अपनी हर सब्जी में डालते हैं. अपनी हर पार्टी में आलू के स्टार्टर का मजा उड़ाते हैं. लेकिन वही आलू उगाने वाला किसान क्यों अपनी मेहनत फेंक रहा है ? जानकारी की तो पता चला 8 क्विंटल बीज एक बीघा जमीन में आलू उगाने के लिए लगता है. 16 हजार रुपए एक बीघा में बीज लगाने में खर्च होते हैं. 2000 रुपए खेती, हकाई, जुताई में लग जाता है. 6000 रुपए की खाद लगती है. 2000 रुपए बिजली-सिंचाई का बिल आता है. 2000 रुपए मजदूरी में जाता है. 2000 रुपए आलू रखने के बोरे में लगते हैं 1000 रुपए खेत से आलू उठाने की हमाली 2000 रुपए आलू मंडी पहुंचाने का खर्च 1000 रुपए मंडी में तोलाई का लगता है इस तरह कुल खर्चा 35000 रुपए आता है. खेत पर आलू उगाने में किसान का कितना खर्च होता है ये आपने जान लिया. इंदौर की मंडी में हमें किसानों से आलू खरीदने वाले आढञती बाबूलाल मिले. हमने उन्हीं से पूछा कि आलू किस रेट पर खरीद रहे हैं. बाबूलाल 3.5 से 6 रुपए तक के आलू का रेट बताते हैं. इस आधार पर किसान के नफा नुकसान का कैलकुलेशन किया गया तो पता चला कि जो किसान एक बीघे में 35000 रुपए खर्च कर 70 बोरा आलू उगा रहा है. उसे मंडी में सिर्फ 17000 रुपए मिल रहे हैं. यानी एक बीघे आलू की खेती पर किसान 50 फीसदी का नुकसान उठा रहा है. आलू के खेत पर किसान का दर्द आपने देखा. फिर आपने देखा कि कैसे मंडी में उसे आधी कीमत ही मिल रही है. तो फिर बाहर रिटेल मार्केट में क्या रेट है . ये जानने के लिए इंदौर की मंडी के ठीक बाहर फुटकर विक्रेता से आलू का दाम पूछा. आलू फूटकर विक्रेता 6 का खरीदा, 10 रुपए का बेचा. यानी मंडी से दस कदम की दूरी पर ही आलू चार रुपए महंगा हो जा रहा है. आपके मोहल्ले तक पहुंचने पर रेट और बढ़ जाते हैं. यानी अब तक की जांच में कुल मिलाकर ये बात साफ हुई कि जो आलू आप अभी 10 से 15 रुपए का खरीद रहे हैं. वो आलू आपका सब्जी वाला 5 से 6 रुपए में मंडी से खरीद रहा है. वही आलू मंडी में किसान से 3 से 4 रुपए में खरीदा जा रहा है. और किसान को अपना आलू आधे दाम पर बेचना पड़ रहा है. यानी ना आपको फायदा हो रहा, ना किसान को ? बीच में बिचौलिए खेल कर जा रहे है? तो फिर इसका हल क्या है ? किसान को और आपको कैसे राहत मिल सकती है ? आलू पर किसान का हो रहे नुकसान और आलू फेंकने के लिए मजबूर हो रहे किसान की कहानी समझने के बाद अब वजह जानने की बारी है. हमें लगा शिवराज सिंह चौहान किसानों के दर्द पर बड़ी बड़ी बातें करते हैं. इसलिए पहले उन्हीं के कृषि मंत्री डॉक्टर गौरीशंकर बिसेन से बात की जाए. लेकिन मंत्री जी आलू के किसानों की मुश्किल सुनकर थोड़ी अजीब सी सलाह देने लगे. एमपी के कृषि मंत्री डॉक्टर गौरीशंकर बिसेन बोले कि अनुकूल मौसम में ही नहीं बल्कि प्रतिकूल मौसम में भी उगाना चाहिए. मध्य प्रदेश के कृषि कल्याण मंत्री जी की मानें तो अभी अनुकूल मौसम में आलू उगाकर जो किसान रो रहा है, वो आगे प्रतिकूल मौसम में भी आलू उगाकर रोए. अभी क्या किया जा सकता है कृषि कल्याण मंत्री नहीं बता पाए. ये दिक्कत सिर्फ एक नेता की नहीं. बाकियों की भी है. इसकी बड़ी वजह ये है कि देश में नेताओं को किसानों की चिंता तो कम है ही, आलू के किसानों की चिंता और भी कम है. जबकि आलू सिर्फ किसान नहीं बल्कि आपकी सेहत और देश की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा रोल रखता है. दुनिया में चीन के बाद आलू पैदा करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश भारत है. जहां पिछले साल करीब 4 करोड़ 80 लाख टन आलू पैदा हुआ. मक्का, गेहूं, धान के बाद दुनिया की चौथी सबसे बड़ी फसल आलू ही है. आलू की खूबी है कि ये बेहद कम पानी में भी तैयार होता है. आलू की फसल भी दो महीने में तैयार हो जाती है. लेकिन बावजूद इसके आलू को लेकर देश में उतना हल्ला नहीं मचता, जितना प्याज की बर्बादी मचा जाती है. उधर आलू के किसानों का मुद्दा उठाने के लिए दिल्ली में कृषि मंत्री राधामोहन सिंह के पास पहुंचे. पूछा कैसे किसानों को उनकी फसल की सही कीमत मिल सकती है ? कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह बोले कि राष्ट्रीय कृषि मंडी से 250 मार्केट जुड़ गए हैं, उसे अच्छा मूल्य मिलेगा. राष्ट्रीय कृषि मंडी ऐसी व्यवस्था है, जहां किसान सीधे अपनी फसल बेच सकता है. बीच में बिचौलिए का रोल खत्म हो जाता है. लेकिन फिलहाल आलू के किसानों के लिए ये रास्ता भी इतना सरल नहीं. देश में जिन फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलता है. उसमें आलू नहीं है. ऐसे में इस बात की पूरी गारंटी नहीं है कि आलू की असली कीमत किसान को मिल जाएगी. यहां एक दिक्कत और है. वो ये कि आलू की फसल जल्द खराब भी होती है. देश में कोल्ड स्टोर का सहीं ढांचा ना होने के कारण जितना आलू पाकिस्तान पैदा करता है. उसका आधा तो हिंदुस्तान में बर्बाद हो जाता है. किसान को आलू कोल्ड स्टोर में रखने में क्या दिक्कत आती है. मंडी में आलू की सही कीमत के इंतजार में अपना आलू किसान रख तो देता है. लेकिन तब तक नई फसल आ जाती है और फिर कोल्ड स्टोर के किराए भर का पैसा भी नहीं निकलता. वो आलू वहीं छोड़ देता है. जो बाद में सड़क पर फेंका जाता है. देश में प्रोसेसिंग की सुविधाओं में भारी कमी है. आपको एक तुलना करके यहां बताते हैं कि हालत कितनी बुरी है. अमेरिका अपने यहां 56% आलू नीदरलैंड 55% आलू प्रोसेस कर रख लेता है. जर्मनी चालीस फीसदी आलू प्रोसेस कर लेता है. भारत में अभी जितना आलू पैदा होता है उसका सिर्फ पांच फीसदी प्रोसेस हो पाता है. यही कारण है कि देश में आलू ज्यादा बर्बाद हो जाता है. यानी यहां भी सरकारों की नीतियां जिम्मेदार हैं. अब सवाल ये उठता है कि आलू जब इतना पैदा होता है तो क्यों नहीं उसे एक्सपोर्ट करके किसानों को राहत दी जाती ? ये दर्द आलू उगाने वाले एक किसान जितेंद्र कुमार का भी है. लेकिन आलू के एक्सपोर्ट का मामला भी देश में अभी सरल नहीं है. इसकी वजह भी जानिए. नेशनल हार्टिकल्चर रिसर्च एंड डेवलेपमेंट फाउंडेशन की एक रिसर्च बताती है कि भारत का आलू एक्सपोर्ट में इसलिए मात खा जाता है क्योंकि ज्यादातर जगहों पर आलू के उत्पादन में कीटनाशक का इस्तेमाल ज्यादा होता है. यही वजह है कि कुछ दिनों पहले रूस, अमेरिका जैसे बड़े देशों ने 5 लाख टन आलू का ऑर्डर कैंसल कर दिया था. तो फिर क्या देश में आलू का किसान मरता रहे. आलू फेंकता रहे. आपको आलू महंगा मिलता रहे. इसका कोई हल नहीं निकलेगा. कृषि विशेषज्ञ योगेश द्विवेदी ने बताया दिक्कत कहां है. कृषि विशेषज्ञ योगेश द्विवेदी बताते हैं कि जवाबदेही तय हो सिस्टम में. यकीन मानिए जिस दिन देश में सिर्फ घोषणाएं नहीं बल्कि जवाबदेही तय की जाने लगेगी, उस दिन से जय जवान जय किसान के नारे वाले देश का किसान पराजय का शिकार नहीं होगा. इसलिए जरूरी है कि किसानों को उनकी मेहनत की कीमत देने की गारंटी भी सरकारें जवाबदेही तय करके दें. आपका बेसन-सत्तू महंगा क्यों है ? सवाल ये है कि चने की दाल सस्ती हुई है तो उससे बनने वाला बेसन और सत्तू क्यों महंगा है? आखिर दाल में काला कहां है ? दुकानदार भी मान रहे हैं कि पिछले एक महीने में चने की दाल 50 फीसदी तक सस्ती हुआ है. तो ये फर्क बेसन और सत्तू के दाम में क्यों नहीं दिख रहा. ये हाल तब है जब सरकार दावा कर रही है कि देश में दाल की कोई कमी नहीं है. सरकारी आंकड़े कहते हैं सरकार...बाजार में 77 हजार 199 टन दाल बाजार में उतार चुकी है और 7 लाख 76 हजार टन का बफर स्टॉक अभी सरकारी गोदामों में है. विदेशों से खरीदी गई एक लाख 12 हजार टन दाल भी देश में आने वाली है. वहीं अगले महीने यानी मार्च में कटाई के साथ बाजार में चने की नई दाल भी आ जाएगी. यही वजह है कि जानकार मार्च में चने की दाल के भाव 60 रुपये तक आने का अनुमान लगा रहे हैं. यानी आप भी समझ गए होंगे कि चने की दाल से बनने वाले सत्तू और बेसन के महंगे होने की कोई वजह नहीं है. एक और चौंकाने वाली बात जान लीजिए. जानकार कह रहे हैं कि मुनाफाखोरी के साथ बेसन और सत्तू में मिलावटखोरी भी जमकर हो रही है. बेसन और सत्तू में पीले विलायती मटर की मिलावट हो रही है, जो 25 से 30 रुपये किलो बिकता है. यानी चने की दाल से 70 फीसदी सस्ता. इस गोरखधंधे का पता सरकारी आंकड़ों से भी चल रहा है. सरकारी आंक़ड़ों के मुताबिक साल 2016 की आखिरी तिमाही यानी अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर में विदेश से 15 लाख टन पीली मटर दाल देश में आई. जबकि साल 2015 में इसी दौरान ये आंकड़ा 8 लाख टन था. यानी लगभग आधा.
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