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विदेशी मीडिया: भारत को बदनाम कर रहा या दिखा रहा हक़ीक़त?

भारत इस वक़्त कोरोना की सबसे भयानक मार झेल रहा है जिससे निपटने के लिए दुनिया के कई देशों ने मदद का हाथ आगे बढ़ाया है. लिहाजा ऐसे समय में दुनिया की प्रतिष्ठित Time मैगज़ीन ने अपने कवर पेज पर एक श्मशान में शव ले जाते परिजनों की तस्वीर प्रकाशित की है. इसे लेकर देश में बहस छिड़ गई है. बीजेपी इसे भारत की छवि खराब करने की कोशिश बता रही है.

भारत इस वक़्त कोरोना की सबसे भयानक मार झेल रहा है, ऐसे समय में दुनिया की प्रतिष्ठित Time मैगज़ीन ने अपने कवर पेज पर देश के एक शहर के श्मशान में शव ले जाते परिजनों की तस्वीर प्रकाशित  की है. इसे लेकर सोशल मीडिया पर बड़ा बवाल मचा है और लोग सवाल पूछ रहे हैं कि क्या विदेशी मीडिया भारत की छवि खराब करने की कोशिश कर रहा है? हालांकि एक वर्ग इसे जायज भी ठहरा रहा है कि सरकार देसी मीडिया के जरिये जिस सच को दबाने का प्रयास कर रही है, उसी हक़ीक़त को अगर अंतराष्ट्रीय मीडिया उजागर कर रहा है, तो इसमें गलत क्या है? दरअसल, ये बहस इसलिए छिड़ी है कि जब पिछले साल कोरोना की पहली लहर आई थी,तब अमेरिका,ब्रिटेन व यूरोपीय देशों में एक ही दिन में मरने वालों का आंकड़ा 5-6 हजार तक जा पहुंचा था,लेकिन तब 'टाइम' ने ऐसे किसी देश के कब्रिस्तान की हक़ीक़त बताती तस्वीर को अपना मुखपृष्ठ नहीं बनाया था.

सोशल मीडिया पर Time मैगज़ीन के इस फैसले का अगर विरोध हो रहा है, तो उसमें सच्चाई भी नज़र आती है. आपको याद होगा कि कोरोना संक्रमण की शुरुआत वैसे तो चीन के वुहान प्रांत से दिसंबर 2019 में ही हो गई थी.लेकिन Time मैगज़ीन के 20 जनवरी 2020 से लेकर 26 अप्रैल 2021 तक के सारे अंकों पर अगर आप नजर डालेंगे, तो आपको किसी भी कवर पेज पर कहीं भी, किसी भी देश की ऐसी कोई तस्वीर नजर नहींआएगी, जो ताजे अंक में भारत के एक शमशान की आपको डराती हुई नजर आयेगी.

जी हां,इसका विरोध करने वालों का यही मुख्य तर्क भी है.लेकिन हर तस्वीर के दो पहलू होते हैं और उसे कैसे देखना है,ये देश-दुनिया के लोग अपनी समझ के हिसाब से तय करते हैं.जाहिर है कि देश की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के लिए यह भारत की छवि खराब करने का विषय बनता दिख रहा है,तो वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को यह इसलिये उचित लगता है कि इससे भारत सरकार की स्वास्थ्य तैयारियों की पोल खुलने का नजारा सारी दुनिया देख रही है.

बता दें कि 'टाइम' मैगज़ीन ने अपने ताजा अंक में India in Crisis शीर्षक से कवर स्टोरी की है जिसके मुखपृष्ठ पर उक्त तस्वीर छापी गई है.इसका विरोध कर रहे लोगों का तर्क है कि उसके जरिये यह संदेश देने की कोशिश की गई है,मानो पूरा भारत ही श्मशान में तब्दील हो रहा हो जबकि हक़ीक़त में ऐसा नहीं है.फ़िलहाल ऐसा है भी नहीं और कोई भी नहीं ऐसा चाहेगा.लेकिन आगे क्या होगा, उसकी भविष्यवाणी कोई भी नहीं कर सकता.

ऐसे नाजुक मसलों पर सोशल मीडिया पर भी पूरी ताकत से अपनी सरकार की खामियों को बचाने वाले  बीजेपी के मुख्य प्रवक्ता अनिल बलूनी कहते हैं कि   "जब पिछले साल इसी कोरोना से अमेरिका,ब्रिटेन व अन्य यूरोपीय देशों में हर रोज पांच-छह हजार लोगों की मौत हो रही थी,तब तो इस मैगज़ीन ने किसी भी  देश की कोई एक भी ऐसी तस्वीर नहीं छापी.अमेरिका की आबादी तो भारत के मुकाबले एक चौथाई भी नहीं है.इटली,ब्राजील,फ्रांस तो और भी छोटे हैं और उन देशों में प्रतिदिन मरने वालों का आंकड़ा हजारों में था.फिर क्या वजह थी कि विदेशी मीडिया ने अपने यहां होने वाली मौतों को तो इस तरह से नहीं उछाला, जैसे आज भारत को सुर्खियां में लाया गया."

लेकिन कांग्रेस की तेजतर्रार प्रवक्ता रागिनी नायक तो सीधे कहती हैं कि " आज कोरोना के मामले में भारत विश्व गुरु बन गया है.अगर अंतराष्ट्रीय मीडिया में हमारी थू-थू हो रही है,तो वह सिर्फ इसलिये कि हमने पिछले एक साल में स्वास्थ्य सुविधाएं जुटाने की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया.पूरी दुनिया ने पहली लहर में लॉक डाउन लगाकर अपने मेडिकल सिस्टम को इतना  मजबूत किया,जो इससे पहले उन्हें पता ही नहीं था.इसके उलट हमारे यहां क्या हुआ,सरकार ने सोचा ही नहीं बल्कि मान लिया कि हमारे यहां तो कोई दूसरी लहर ही नहीं आने वाली."

इजरायल,न्यूज़ीलैंड जैसे देशों के इतनी जल्द कोरोना मुक्त होने का उदाहरण देते हुए वे कहती हैं कि  "आखिर आप ये भी तो सोचिये कि जिस देश में हमें अपने बच्चों को स्कूल में दाखिले के लिए नेताओं की सिफारिशें लगवाना पड़ती हों,वहां ये माहौल आखिर कैसे बन गया कि अपने किसी करीबी की लाश जलाने के लिए हमें श्मशान में भी सिफारिश की जरुरत पड़ रही है.ऐसे में,अगर Time ने इसे अपना कवर पेज बना दिया,तो उसने कोई गुनाह नहीं किया बल्कि हम सबकी भलाई ही की है.इसके लिए आप या मैं नहीं,बल्कि हमारी वो सरकार जिम्मेदार है जिसने इस तरफ जरा भी ध्यान नहीं दिया.

वैसे इस सच्चाई से कोई इनकार नहीं कर सकता कि कोरोना की पहली लहर के वक़्त दुनिया के कई देशों के अस्पतालों में बेड व ऑक्सिजन की कमी हो गई थी और कब्रिस्तानों में शव दफनाने की जगह नहीं बची थी लेकिन तब 'टाइम' या अन्य किसी प्रतिष्ठित मैगज़ीन ने इसे अपना कवर नहीं बनाया था.

बलूनी कहते हैं कि "यह सब जानते हैं कि इस समय भारत संक्रमण के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है और हम इस संकट से पूरी ताकत के साथ जूझ रहे हैं.ऐसे दौर में विदेशी मीडिया का एक वर्ग अगर सोच समझकर ऐसी तस्वीर को अपना कवर बनाता है,तो जाहिर है कि वे भारत की छवि को खराब व बदनाम करने की कोशिश में लगे हैं.इसके पीछे उनका क्या मकसद है,यह तो वे ही जानें लेकिन हमें पता है कि मुसीबत की इस घड़ी में सारे देशवासी एकजुट हैं.

लेकिन रागिनी कहती हैं कि,"ये वक़्त न तो अपने देश के मीडिया को दबाने का है और न ही विदेशी मीडिया को कोसने का.अपना अहंकार खत्म कीजिये, इस राष्ट्रीय संकट में सभी दलों के नेताओं के अच्छे सुझावों पर अमल कीजिये और आगे बढ़िये. देश की सबसे पुरानी पार्टी का यूथ मोदीजी के साथ होगा, ये मेरी गारंटी है."     

हालांकि यह भी एक कड़वा सच है कि बीते कुछ सालों में ऐसे कई लेखक उभरे हैं जो अंतराष्ट्रीय मीडिया में भारत की इमेज को बदनाम करना अपनी शान समझते हैं.सरकार की कमियों की आलोचना करने का हक़ सभी को है लेकिन दुनिया के सामने अपने देश को नीचा दिखाने का अधिकार तो हमारा संविधान भी हमें नहीं देता है.

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