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Explained: सांसदों को क्यों किया जाता है निलंबित, कौन कर सकता है कार्रवाई, जानें हर सवाल का जवाब

Who Can Suspend MP: राज्यसभा से विपक्ष के 19 सदस्यों को एक हफ्ते के लिए निलंबित कर दिया गया है. यहां जानिए आखिर कौन इन्हें सस्पेंड करता है और इसके लिए क्या नियम-कायदे हैं.

Who Can Suspend MP: राज्यसभा (Rajya Sabha) से मंगलवार 26 जुलाई को 19 विपक्षी सांसदों को एक हफ्ते के लिए निलंबित (Suspend) कर दिया गया है. इस निलंबन को लेकर आप भी जानना चाहते होंगे कि आखिर एक सांसद को क्यों निलंबित किया जाता है? किन नियमों के तहत पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) को सांसदों को निलंबित करने का अधिकार है? क्या संसद में सांसदों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई एक आम बात है? आज यहां इन सारे सवालों के जवाब जानिए. 

कौन-कौन सांसद हुए निलंबित

गौरतलब है कि राज्यसभा के पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) ने मंगलवार को राज्यसभा से 19 विपक्षी सांसदों (MP) को एक हफ्ते के लिए निलंबित कर दिया है. इन सांसदों में तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress-TMC) के नेता डेरेक ओ ब्रायन (Derek O’Brien) के राज्यसभा के सात सहयोगियों सहित द्रमुक (DMK) के छह, टीआरएस (TRS) के तीन, सीपीएम( CPM) के दो और भाकपा ( CPI) के एक सांसद शामिल है. इन सभी सांसदों को उनके सदन में अनियंत्रित व्यवहार की वजह से निलंबित किया गया है. टीएमसी नेता ब्रायन इससे खासे नाराज दिखे और उन्होंने सरकार पर तंज कसा कि सरकार ने संसद को एक गहरे अंधेरे कुएं में धकेल दिया है. गौरतलब है कि बीते साल 29 नवंबर को शीतकालीन सत्र (Winter Session) के पहले दिन राज्यसभा से 12 विपक्षी सदस्यों को निलंबित कर दिया था. इन सांसदों पर 11 अगस्त के पिछले मानसून सत्र के आखिरी दिन कदाचार, अवमानना, अनियंत्रित और हिंसक व्यवहार और सुरक्षा कर्मियों पर जानबूझकर हमले की वजह से ये कार्यवाही की गई थी. इससे पहले, राज्यसभा के आठ सांसदों को बीते साल 20 सितंबर को सदन में अभद्र व्यवहार के लिए 21 सितंबर, 2020 को निलंबित किया गया था.

क्या है सांसद को सस्पेंड करने की वजहें?

सामान्य सिद्धांत यह है कि पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) यानी लोकसभा के अध्यक्ष (Speaker Of Lok Sabha) और राज्यसभा के सभापति (Chairman Of Rajya Sabha) की भूमिका और कर्तव्य सदन की व्यवस्था बनाए रखना है. उनका काम सदन को सुचारू तौर पर चलाना और सदन की कार्यवाही सही तरीके से हो यह सुनिश्चित करना है. स्पीकर और चेयरमैन दोनों को ही इस काम में बाधा डालने वाले किसी भी सदस्य को सदन से हटने के लिए मजबूर करने का अधिकार है. विपक्षी सांसद 18 जुलाई सत्र की शुरुआत के बाद से ही विरोध कर रहे थे. मंगलवार को इन सभी सांसदों ने वेल (Well) में प्रवेश किया और उपसभापति हरिवंश ( Deputy Chairman Harivansh) के बार-बार अपनी सीटों पर लौटने के अनुरोधों को अनदेखा कर दिया. इसे पर डिप्टी चेयरमैन हरिवंश ने ट्रेजरी (Treasury ) से उनके निलंबन के लिए एक प्रस्ताव पेश करने को कहा. इसके बाद संसदीय मामलों (Parliamentary Affairs) के राज्य मंत्री वी मुरलीधरन ने "कदाचार" के लिए शेष सप्ताह के लिए 10 सांसदों को निलंबित करने का प्रस्ताव पेश किया. हरिवंश ने मतदान के लिए प्रस्ताव रखा और 19 विपक्षी सदस्यों के नाम पढ़े.

पीठासीन अधिकारी किन नियमों के तहत कार्य करता है?

प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियमों के तहत नियम संख्या 373 में कहा गया है कि यदि स्पीकर की नजर में सदन में किसी सदस्य का आचरण घोर अव्यवस्थित पाया जाता है तो वह ऐसे सदस्य को सदन से तुरंत हटने का निर्देश दे सकता है और उस सदस्य को यह आदेश तत्काल मानना पड़ता है. इसी के साथ ऐसे सदस्य को शेष दिन की बैठक के दौरान अनुपस्थित रहना होता है. सदन में अधिक अड़ियल सदस्यों से निपटने के लिए अध्यक्ष नियम 374 और 374A का सहारा लेते हैं.

नियम 374 कहता है

नियम संख्या 374 के मुताबिक, लोकसभा स्पीकर संसद की गरिमा में बाधा डालने वाले उस सदस्‍य (एक या अधिक) के नाम का एलान कर सकते हैं, जिसने या जिन्होंने आसन की मर्यादा तोड़ी हो या नियमों का उल्‍लंघन किया हो. सोच-समझकर, जानबूझ कर अपने व्यवहार से सदन की कार्यवाही में बाधा डाली हो. जब लोकसभा अध्‍यक्ष ऐसे सांसद या सांसदों के नाम एलान करते हैं, तो वे सदन के पटल परएक प्रस्‍ताव रखते हैं. इस प्रस्‍ताव में हंगामा मचाने वाले सांसद का नाम लेते हुए उसके निलंबन की बात कही जाती है. इसमें निलम्बन की अवधि का भी जिक्र होता है. यह अवधि अधिकतम सत्र की समाप्‍त‍ि तक की हो सकती है. सदन चाहे तो वह किसी भी वक्त इस प्रस्‍ताव को रद्द करने का अनुरोध भी कर सकता है. इस नियम के तहत निलम्बित सदस्‍य को निलंबन तक की अवधि में किसी प्रकार से भी सदन की कार्यवाही में  शामिल होने का अधिकार नहीं रहता.

नियम 374 A कहता है

लोकसभा के प्रक्रि‍या तथा कार्य-संचालन नि‍यमों में 374 ए का प्रावधान है. इसके तहत यदि सदन में कोई भी सदस्‍य अध्‍यक्ष के आसन के पास आकर या सभा में नारे लगाकर या फिर अन्‍य तरह से सभा की कार्यवाही में बाधा डालता है. जानबूझकर सभा के नि‍यमों का दुरूपयोग कर घोर अव्‍यवस्‍था पैदा करता है, तो इस स्थिति में स्पीकर के उसका नाम लिए जाने पर वह सभा की सेवा से लगातार पांच बैठकों के लि‍ए या सत्र की शेष अवधि‍ के लि‍ए, जो भी कम हो खुद ही तुंरत नि‍लंबि‍त हो जाता है. इस नियम का इस्तेमाल पहली बार लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने 2013 में किया था.

राज्यसभा में कैसे होता है निलंबन?

राज्य सभा में भी निलंबन प्रक्रिया काफी हद लोकसभा जैसी ही होती है. यहां राज्यसभा के सभापति को अपनी नियम पुस्तिका के नियम संख्या 255 के तहत किसी भी सदस्य को, जिसका आचरण उसकी राय में घोर उद्दड़ता की श्रेणी में आता है, उसे वो सदन से तुरंत हटने का निर्देश दे सकता है. नियम 256 के तहत, अध्यक्ष एक सदस्य का नाम दे सकता है, जो अध्यक्ष के अधिकार की अवहेलना करता है या लगातार और जानबूझकर बाधा डालकर परिषद के नियमों का दुरुपयोग करता है. ऐसी स्थिति में, सदन सदस्य को सदन की सेवा से निलंबित करने का प्रस्ताव पारित कर सकता है, जो शेष सत्र से अधिक नहीं होगा.

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