Xप्लेन: ईरान-अमेरिका युद्ध रोकेगा भारत? जानिए राष्ट्रपति पेज़ेशकियन ने क्यों जताया भरोसा
ऐसे संकटपूर्ण समय में ईरान के राष्ट्रपति का भारत से सहयोग मांगना यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की साख कितनी मजबूत है. ईरान जैसे देश यह विश्वास रखते हैं कि मोदी सरकार की पहल से युद्ध विराम की राह निकल सकती है.

बिश्केश (Bishkek) में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान हुई द्विपक्षीय बैठक में, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया कि वे पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को समाप्त कराने के लिए भारत के वैश्विक प्रभाव और कूटनीतिक संपर्कों का उपयोग करें.
महीनों से जारी अमेरिका-इजराइल और ईरान के संघर्ष ने न केवल मध्य पूर्व बल्कि पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. वैश्विक स्तर पर महंगाई तेज़ी से बढ़ रही है. ऐसे संकटपूर्ण समय में ईरान के राष्ट्रपति का भारत से सहयोग मांगना यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की साख कितनी मजबूत है. ईरान जैसे देश यह विश्वास रखते हैं कि मोदी सरकार की पहल से युद्ध विराम की राह निकल सकती है.
राष्ट्रपति पेज़ेशकियन और पीएम मोदी के बीच क्या हुई बातचीत
युद्ध समाप्त करने की अपील: राष्ट्रपति पेज़ेशकियन ने कहा कि युद्ध को जारी रखना न तो ईरान, न ही इस क्षेत्र और न ही संपूर्ण मानवता के हित में है. उन्होंने क्षेत्र में भारत के ऐतिहासिक और संतुलित कूटनीतिक संबंधों का ज़िक्र करते हुए पीएम मोदी से आग्रह किया कि वे संबंधित पक्षों को संघर्ष का मार्ग छोड़कर बातचीत और समझौते की मेज़ पर लाने में मदद करें.
एकतरफा कार्रवाई की आलोचना: पेज़ेशकियन ने इस बात पर अफ़सोस जताया कि कूटनीतिक तंत्र को नज़रअंदाज़ किया गया. उन्होंने वाशिंगटन पर बातचीत के बजाय युद्ध और बल-प्रयोग का रास्ता चुनने का आरोप लगाया.
भारत का स्पष्ट रुख: पीएम नरेंद्र मोदी ने भारत की स्पष्ट नीति को दोहराते हुए कहा कि सभी क्षेत्रीय विवादों को केवल बातचीत और कूटनीति के ज़रिए ही सुलझाया जाना चाहिए. उन्होंने क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता लाने वाले सभी प्रयासों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता जताई.
व्यापार और नौवहन की सुरक्षा: पीएम मोदी ने वाणिज्यिक जहाजरानी (commercial shipping), नाविकों और नागरिक बुनियादी ढांचे को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर बल दिया, विशेष रूप से होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे अत्यंत संवेदनशील जलमार्गों की सुरक्षा को रेखांकित किया.
आर्थिक और रणनीतिक संबंध: दोनों नेताओं ने भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने और उसमें विविधीकरण लाने के साथ-साथ चाबहार बंदरगाह जैसी महत्वपूर्ण संयुक्त परियोजनाओं को गति देने पर चर्चा की.
क्या भारत रुकवा सकता है यह युद्ध?
क्या भारत अकेले इस जटिल वैश्विक संघर्ष को पूरी तरह समाप्त करवा सकता है? यह सीधे तौर पर कहना कठिन है. हालांकि, यह स्पष्ट है कि भारत के पास कुछ ऐसी अद्वितीय रणनीतिक ताकतें हैं जो उसे एक निष्पक्ष और प्रभावी कूटनीतिक सेतु (Diplomatic Bridge) की भूमिका निभाने के योग्य बनाती हैं.
भारत निम्नलिखित 5 मुख्य तरीकों से शांति वार्ताओं को दिशा दे सकता है:
1-"मल्टी-अलाइंड" (बहु-पक्षीय) संबंध: भारत वैश्विक संघर्ष के परस्पर विरोधी पक्षों के साथ भी मजबूत संबंध बनाए रखने में सक्षम है. एक तरफ जहां भारत की इज़राइल के साथ रणनीतिक व रक्षा साझेदारी है, वहीं ईरान के साथ गहरे आर्थिक और ऊर्जा संबंध हैं. इसके साथ ही, भारत के सऊदी अरब, यूएई और अमेरिका के साथ भी प्रगाढ़ रिश्ते हैं. चूंकि भारत किसी सैन्य गठबंधन से नहीं बंधा है, इसलिए वह उन गिने-चुने देशों में शामिल है जिनकी बात पर वाशिंगटन, तेल अवीव और तेहरान तीनों भरोसा कर सकते हैं.
2-भरोसेमंद बैक-चैनल डिप्लोमेसी : सार्वजनिक बातचीत अक्सर राजनीतिक बयानबाज़ी और मीडिया के दबाव के कारण अटक जाती है. भारत का निष्पक्ष रुख पर्दे के पीछे की गुप्त वार्ताओं के लिए एक सुरक्षित मंच प्रदान करता है. भारतीय राजनयिक बिना किसी सार्वजनिक दबाव के वाशिंगटन, तेल अवीव और तेहरान के बीच मतभेदों को कम करने और न्यूनतम शर्तों पर सहमति बनाने में मदद कर सकते हैं.
3-होर्मुज़ जलडमरूमध्य में आर्थिक और ऊर्जा हित: भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए फारस की खाड़ी की स्थिरता पर अत्यधिक निर्भर है. होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे समुद्री रास्तों पर तनाव बढ़ने से भारत को भारी आर्थिक क्षति, व्यापारिक रुकावटों और आपूर्ति शृंखला के संकट का सामना करना पड़ता है. भारत अपने आर्थिक प्रभाव का उपयोग करके युद्ध से होने वाले वैश्विक वित्तीय नुकसान को रेखांकित कर सकता है और क्षेत्रीय साझेदारों को युद्धविराम के लिए एकजुट कर सकता है.
4-ग्लोबल साउथ (Global South) का नेतृत्व: भारत एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों की एक सशक्त आवाज़ है. इन देशों को इस युद्ध का सीधा नुकसान जैसे महंगे ईंधन और खाद्य असुरक्षा के रूप में आदि झेलना पड़ रहा है. भारत 'ग्लोबल साउथ' के देशों को एकजुट करके युद्धरत पक्षों पर एक नैतिक और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव बना सकता है.
5-निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका: भारत निष्पक्ष शांति वार्ताओं की मेज़बानी कर सकता है या मानवीय सहायता, समुद्री गलियारों की सुरक्षा और कैदियों की अदला-बदली जैसे विश्वास-वर्धक उपायों में मध्यस्थ बन सकता है. चूंकि भारत एकतरफा प्रतिबंधों के बजाय अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीति का पक्षधर है, इसलिए संबंधित पक्ष भारत को एक तटस्थ और निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में स्वीकार कर सकते हैं.





















