Explained: क्या सवाल पूछने की आजादी छिनेगी? भंडाफोड़ पत्रकारिता के लिए जंजीर बना DPDP एक्ट!
27 अक्टूबर को सुनवाई में CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि नागरिकों की प्राइवेसी और मीडिया की आजादी के बीच संतुलन बनाना जरूरी है. कोर्ट ने पूछा कि कानून का दुरुप्योग होने से कैसे बचाएंगे?

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 और इसके तहत बने नियम 2025, आम नागरिकों की प्राइवेसी की रक्षा के लिए बनाए गए थे. डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की अगुवाई में 21 बड़े मीडिया संस्थानों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके दावा किया है कि यह कानून खोजी पत्रकारिता के लिए 'प्री-सेंसरशिप' का पूरा तंत्र खड़ा कर देगा. 27 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है, लेकिन कानून पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया है. अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होनी है. मीडिया संस्थानों की तीन बड़ी आपत्तियां हैं, जिनका सीधा असर जांच की बुनियादी प्रक्रिया पर पड़ता है...
तो क्या मान लिया जाए कि खोजी पत्रकारिता मुश्किल है?
DPDP एक्ट में पत्रकारिता के लिए 'छूट' ही नहीं
इस पूरे विवाद की जड़ एक बहुत सीधी बात है कि DPDP एक्ट में पत्रकारिता या खोजी रिपोर्टिंग के लिए कोई अलग से छूट नहीं दी गई है.
DPDP एक्ट के सेक्शन 7 में उन 'वैध उद्देश्यों' का जिक्र है जिनके तहत व्यक्तिगत डेटा का इस्तेमाल बिना सहमति के किया जा सकता है. सेक्शन 17 में उन मामलों की सूची है जहां कानून लागू ही नहीं होता. दोनों जगहों पर पत्रकारिता का कोई जिक्र नहीं है. यही नहीं, सेक्शन 17(2) में 'शोध, संग्रह (archiving) और सांख्यिकीय उद्देश्यों' के लिए छूट दी गई है, लेकिन पत्रकारिता को इस सूची में शामिल नहीं किया गया. इसे याचिकाकर्ता मनमाना भेदभाव बताते हैं.
दिलचस्प बात यह है कि 2018, 2019 और 2021 के ड्राफ्ट बिलों में पत्रकारिता के लिए छूट का प्रावधान था, लेकिन 2022 के ड्राफ्ट और 2023 के अंतिम कानून में इसे हटा दिया गया. DNPA का तर्क है कि यह कानून 'पत्रकारिता के लिए बनाया ही नहीं गया था.'
तीन बड़ी आपत्तियां: जो खोजी पत्रकारिता की 'रीढ़' तोड़ सकती हैं
1. सहमति लेना: अपराधी को पहले ही 'चेतावनी' दे देना
DPDP एक्ट की धारा 5 और 6 के तहत, किसी भी व्यक्ति का व्यक्तिगत डेटा इस्तेमाल करने से पहले उसे सूचित करना और उसकी सहमति लेना अनिवार्य है. अगर कोई पत्रकार किसी भ्रष्ट अधिकारी, कंपनी या नेता पर जांच कर रहा है, तो उसे उसी व्यक्ति से सहमति मांगनी पड़ सकती है.
DNPA की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान ने कहा कि यह 'पूर्ण पूर्व-सेंसरशिप' है. माधवी ने कहा, 'अगर मुझे इस बात के लिए डेटा प्रिंसिपल की दया पर छोड़ दिया जाए कि वह सहमति देगा या नहीं, तो खबर कैसे बनेगी? न्यूजरूम बंद हो जाएंगे.'
इसका सबसे बड़ा खतरा यह है कि जांच का सबूत नष्ट हो सकता है. अगर पत्रकार सहमति मांगने के लिए संपर्क करता है, तो जिस पर जांच हो रही है, उसे पहले ही पता चल जाएगा और वह सबूत मिटाने या गवाहों को भटका सकता है. यह खोजी पत्रकारिता के मूल सिद्धांत 'बिना चेतावनी दिए सच का पता लगाना' के खिलाफ है.
2. डेटा हटाने का अधिकार: प्रकाशित स्टोरी से छेड़छाड़
DPDP एक्ट की धारा 12 के तहत लोगों को अपने डेटा को सुधारने, अपडेट करने और मिटाने का अधिकार है. अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके बारे में छपी खबर उसके डेटा का गलत इस्तेमाल है, तो वह उसे हटाने की मांग कर सकता है.
इसका मतलब यह है कि जिस व्यक्ति पर भ्रष्टाचार या गलत काम का आरोप लगा हो, वह खुद उस खबर को हटाने या बदलने की मांग कर सकता है. DNPA की याचिका में कहा गया है कि इससे पत्रकारों को 'प्रकाशित रिपोर्टों को बदलने या हटाने' का दबाव बनाया जा सकता है. यह पत्रकारिता के रिकॉर्ड की विश्वसनीयता को ही खत्म कर सकता है.
3. सरकारी पहुंच: सोर्स की पहचान उजागर होने का खतरा
यह सबसे गंभीर आपत्ति है. DPDP एक्ट की धारा 36, नियम 23 और सातवीं अनुसूची के तहत केंद्र सरकार को यह शक्ति है कि वह किसी भी डेटा फिड्यूशरी या इंटरमीडियरी से कोई भी जानकारी मांग सकती है. यह शक्ति बिना किसी न्यायिक निगरानी के इस्तेमाल की जा सकती है.
DNPA का तर्क है कि यह प्रावधान 'पत्रकारिता के स्रोतों की पहचान और उन्हें निशाना बनाने' के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. अगर सरकार किसी न्यूज ऑर्गनाइजेशन से 'स्टोरी से जुड़ा डेटा' मांगती है, तो उससे पता चल सकता है कि जानकारी किसने दी. अगर सोर्स की पहचान सार्वजनिक हो जाएगी, तो कोई भी व्यक्ति डर की वजह से जानकारी देने को तैयार नहीं होगा और खोजी पत्रकारिता की जड़ ही सूख जाएगी.
RTI का 'पेंच': जानकारी पाने का अधिकार भी हुआ कमजोर
DPDP एक्ट की धारा 44(3) ने सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम को भी बदल दिया है.
पहले RTI के सेक्शन 8(1)(j) के तहत, अगर जानकारी का 'बड़ा जनहित' जुड़ा हो, तो सार्वजनिक अधिकारियों की व्यक्तिगत जानकारी भी सार्वजनिक की जा सकती थी. अब नए प्रावधान में बस यह लिख दिया गया है कि 'व्यक्तिगत जानकारी से जुड़ी सूचना' छूट में आएगी, यानी जनहित का पैमाना हटा दिया गया है. इससे पत्रकारों के लिए सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही तय करना और भी मुश्किल हो सकता है.
सुप्रीम कोर्ट की स्थिति: संतुलन की तलाश
27 अक्टूबर 2026 की सुनवाई में CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि नागरिकों की प्राइवेसी और मीडिया की आजादी के बीच संतुलन बनाना जरूरी है. कोर्ट ने DNPA से पूछा कि वे कैसे तय करेंगे कि इस कानून का दुरुपयोग न हो.
DNPA ने साफ किया कि उन्हें कानून का पालन करना है और गलत रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी भी उठानी है, लेकिन प्रकाशन से पहले 'परमिशन' लेने की व्यवस्था नहीं चल सकती.
'अच्छे इरादे' वाला कानून, खोजी पत्रकारिता के लिए 'जहर'
DPDP एक्ट का मकसद नागरिकों की प्राइवेसी की रक्षा करना है और यह जरूरी भी है. इसका डिजाइन ऐसा है कि वह पत्रकारिता को एक 'डेटा प्रोसेसर' मानकर चलता है, न कि 'जनहित के प्रहरी' के रूप में.
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कानून पर रोक नहीं लगाई है और 17 नवंबर को अगली सुनवाई तय की है. अगर कोर्ट ने पत्रकारिता के लिए स्पष्ट, संवैधानिक संरक्षण नहीं दिया, तो यह कानून 'निजता की रक्षा' के नाम पर 'सच की आवाज' को दबाने का जरिया बन सकता है. यही सबसे बड़ा खतरा है.






















