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लोकसभा सीटें बढ़ाए जाने की चर्चा, जानिए क्या है ऐसा करने की संवैधानिक प्रक्रिया

कई गणमान्य लोकसभा की सीटें बढ़ाने को जरूरी बता चुके हैं. हालांकि संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करने के बाद ही लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या और उनके आकार में बदलाव हो सकता है.

नई दिल्ली: लोकसभा की सीटें 545 से बढ़ाकर 1000 किए जाने की चर्चा है. यह चर्चा शुरू हुई है कांग्रेस नेता मनीष तिवारी के एक ट्वीट से. तिवारी ने इस ट्वीट में दावा किया है कि उन्हें इसकी जानकारी बीजेपी के कुछ नेताओं से मिली है. वैसे यह कोई नई चर्चा नहीं है. पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी समेत कई गणमान्य लोकसभा की सीटें बढ़ाने को जरूरी बता चुके हैं. खैर, सरकार ऐसा करेगी या नहीं? अगर हां, तो कब करेगी? इसे भविष्य पर छोड़ देते हैं. यहां हम बात उस संवैधानिक प्रक्रिया की करेंगे, जिसका पालन करने के बाद ही लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या और उनके आकार में बदलाव हो सकता है.

अनुच्छेद 81 में है लोकसभा सीटों की बात-

* लोकसभा की सीटों की संख्या अधिकतम 545 हो सकती है.

* 2026 तक इसमें कोई बदलाव नहीं हो सकता. इसके बाद इन सीटों की संख्या को 2021 की जनगणना के आधार पर बदला जा सकता है.

कई बार हुए है बदलाव

तो क्या लोकसभा सीटों की संख्या शुरू से 545 थी? शुरू से यह तय था कि 2026 के बाद ही इन सीटों की संख्या में बदलाव होगा? क्या यह अनिवार्य है कि सीटों की संख्या 2026 के बाद ही बढ़ सकेगी? इन सारी बातों का जवाब है संविधान संशोधन. 1952 में लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या 489 थी. इसे 2-3 बार अनुच्छेद 81 में संशोधन कर बढ़ाया गया. आखिरी बार इस तरह का बदलाव 1973 में हुआ था. तब संविधान के 31वें संशोधन के जरिए लोकसभा सीटों की संख्या 520 से बढ़ाकर 545 की गई थी.

पहले करना होगा अनुच्छेद 81 (3) में संशोधन

इस संदर्भ में अनुच्छेद 81 (3) की भी बात बहुत जरूरी है. इसी में लिखा है कि लोकसभा सीटों की संख्या में बदलाव 2026 के बाद ही हो सकता है. दरअसल, अनुच्छेद 81 (3) में भी कई बार बदलाव हो चुके हैं. 1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए यह तय किया गया कि लोकसभा सीटों की संख्या तय करने का आधार 1971 की जनगणना होगी और यह स्थिति 2001 तक बनी रहेगी. इस बात की उम्मीद थी कि 2001 के बाद लोकसभा सीटों की संख्या में बढ़ोतरी होगी. लेकिन 2003 में संसद ने फिलहाल इसे टाल देने का फैसला लिया.

संविधान के 84वें संशोधन के जरिए यह तय हुआ कि लोकसभा सीटों की संख्या तय करने का आधार 1971 की जनगणना ही रहेगी. साथ ही यह संख्या 2026 तक स्थिर रहेगी. इसके पीछे वजह यह दी गई थी कि जनसंख्या नियंत्रण को गंभीरता से लागू करने वाले दक्षिण भारतीय राज्यों को नए परिसीमन का नुकसान होगा. लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व घट जाएगा. उत्तर भारत की सीटें बढ़ जाएंगी. इसलिए 20 साल इंतजार किया जाए, जिससे जनसंख्या संतुलन बन सके.

जनसंख्या संतुलन तो खैर अब भी नहीं बन पाया है. लेकिन यह सही है कि लोकसभा सीटों को तय करने का आधार 1971 की जनगणना को हमेशा के लिए नहीं रखा जा सकता. ऐसे में अगर सरकार यह तय करती है कि उसे लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ानी है तो सबसे पहले अनुच्छेद 81 (3) में संशोधन करना पड़ेगा. संसद के दोनों सदनों में कुल सदस्य संख्या के साधारण बहुमत और मतदान करने वाले सदस्यों के 2 तिहाई बहुमत से यह संशोधन पारित हो सकता है. इसमें यह बात जोड़ी जा सकती है कि लोकसभा सीटों के परिसीमन का आधार 2011 या 2021 की जनगणना होगी और यह संख्या अब बदली जा सकती है. यानी संसद के दोनों सदन चाहें तो लोकसभा सीटों की संख्या में बदलाव के लिए 2026 तक का इंतजार जरूरी नहीं.

परिसीमन आयोग का गठन जरूरी

लोकसभा सीटें तय करने का आधार जनगणना वर्ष बदलने के बाद सरकार को एक डिलिमिटेशन कमीशन यानी परिसीमन आयोग का गठन करना पड़ेगा. डिलिमिटेशन एक्ट 2002 के मुताबिक इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान या पूर्व जज कर सकते हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त या उनकी तरफ से नामित चुनाव आयुक्त भी इसके सदस्य होते हैं. परिसीमन आयोग विस्तृत अध्ययन के बाद 2 पहलुओं पर रिपोर्ट देगा- लोकसभा की सीटें कितनी होंगी? राज्यवार सीटों की संख्या क्या होगी?

एक और संविधान संशोधन के बाद बदलेंगी सीटें

मान लीजिए कि परिसीमन आयोग लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ा कर 800 या 1000 करने की सिफारिश देता है तो सरकार को आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक संसद में फिर से एक संविधान संशोधन बिल लाना होगा. अनुच्छेद 81 (1) में बदलाव करना होगा ताकि लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाई जा सके. इसके बाद डिलिमिटेशन एक्ट के प्रावधानों के मुताबिक राज्यवार सीटों का दोबारा आवंटन किया जा सकता है.

यह भी पढ़ें: मनीष तिवारी ने किया बड़ा दावा, कहा- मोदी सरकार लोकसभा में सीटों की संख्या 1000 तक कर सकती है

करीब 2 दशक से सुप्रीम कोर्ट के गलियारों का एक जाना-पहचाना चेहरा. पत्रकारिता में बिताया समय उससे भी अधिक. कानूनी ख़बरों की जटिलता को सरलता में बदलने का कौशल. खाली समय में सिनेमा, संगीत और इतिहास में रुचि.
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