सेना में स्थाई सर्विस कमीशन में महिला अधिकारियों के साथ भेदभाव के आरोपों का केंद्र ने दिया जवाब, SC में कहा- 177 वूमेन...
याचिकाकर्ताओं ने केंद्र के तर्क का विरोध करते हुए दावा किया कि भारतीय वायु सेना में स्थायी कमीशन देने के मामले में पुरुष अधिकारियों की तुलना में महिला अधिकारियों के साथ उचित व्यवहार नहीं किया जाता है.

केंद्र सरकार ने बुधवार (10 दिसंबर, 2025) को सुप्रीम कोर्ट में वायुसेना की महिला अधिकारियों को स्थाई कमीशन दिए जाने में भेदभाव के आरोपों का जवाब दिया. सरकार ने बताया कि 2019 से अब तक 243 पुरुष और 177 महिलाओं को भर्ती किया गया है. वायुसेना के शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के तहत भर्ती महिला अधिकारियों ने स्थाई कमीशन में पुरुषों को अहमियत देने का आरोप लगाया था. कई महिला अधिकारियों ने इस मामले में कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की हैं.
सशस्त्र बलों में स्थाई कमीशन एक ऐसा करियर मार्ग है जो एक अधिकारी को रिटायरमेंट की आयु तक सेवा करने की अनुमति देता है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने दलीलें सुनने के बाद याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया. अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि केंद्र ने 2022 में मंजूरी दी थी, जिसके बाद भारतीय वायुसेना ने एनडीए के जरिए से महिला अधिकारियों की भर्ती शुरू की और ट्रेनिंग पूरी होने के बाद अधिकारियों को सीधे स्थाई कमीशन दिया जाएगा.
एएसजी ऐश्वर्या भाटी ने कहा, 'इन अधिकारियों पर एचआरपी 01/2019 (मानव संसाधन नीति 2019) के प्रावधानों के तहत तीन योग्य अवसरों पर निष्पक्ष रूप से विचार किया गया था, लेकिन न्यूनतम प्रदर्शन मानदंड (MPC) को पूरा न करने और/या अपने-अपने विभागों में उपलब्ध रिक्तियों के लिए योग्यता के आधार पर अर्हता प्राप्त न कर पाने के कारण उन्हें स्थाई कमीशन नहीं दिया जा सका.'
उन्होंने कहा कि साल 2019 की मानव संसाधन नीति मई 2006 के बाद नियुक्त सभी जीडी (ग्राउंड ड्यूटी) शाखा के एसएससी अधिकारियों को स्थाई कमीशन प्रदान करती है. एएसजी भाटी ने कहा, 'यह नीति एसएससी कार्यकाल के 11वें, 12वें और 13वें वर्ष के पूरा होने पर विचार के तीन अवसर प्रदान करती है. पिछली नीतियों में एसएससी अधिकारियों को केवल उनके एसएससी कार्यकाल के अंतिम वर्ष में ही अवसर मिलता था. 2019 से अब तक 243 पुरुष एसएससी अधिकारियों और 177 महिला एसएससी अधिकारियों को स्थायी कमीशन दिया जा चुका है.'
उन्होंने कहा कि मापदंड इस प्रकार निर्धारित किए गए हैं कि सेना युवा और प्रतिस्पर्धी बनी रहे, इसलिए सीमित रिक्तियों के मुकाबले सभी अधिकारियों को स्थाई कमीशन नहीं दिया जा सकता. सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अदालत इस नीति की समीक्षा करेगी, लेकिन सीमित रिक्तियों के संबंध में कुछ नहीं किया जा सकता क्योंकि यह एक नीतिगत निर्णय है.
याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखने के लिए सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी पेश हुईं. उन्होंने एएसजी भाटी के तर्क का विरोध करते हुए दावा किया कि भारतीय वायु सेना में स्थायी कमीशन देने के मामले में पुरुष अधिकारियों की तुलना में महिला अधिकारियों के साथ उचित व्यवहार नहीं किया जाता है. इसके बाद कोर्ट ने दोनों पक्षों को 19 दिसंबर को लिखित में अपनी दलीलें देने के लिए कहा है.
एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने इससे पहले सशस्त्र बलों की 2019 की मानव संसाधन नीति का हवाला देते हुए इसकी आलोचना की थी और कहा था कि स्थाई कमीशन के लिए विचार किए जाने के मानदंड बदल दिए गए हैं और यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है. एसएससी के तहत भर्ती कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के विशिष्ट मामलों का हवाला देते हुए वरिष्ठ वकील ने कहा था कि उनके पास अपेक्षित सीजीपीए (संचयी ग्रेड प्वाइंट औसत) था, फिर भी उन पर विचार नहीं किया गया क्योंकि उनके मामले श्रेणीबद्ध नहीं किए गए थे क्योंकि वे मेटरनिटी लीव पर थीं.
उन्होंने विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि यह माना गया है कि महिला कर्मचारियों के साथ गर्भावस्था और मातृत्व अवकाश के कारण भेदभाव नहीं किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने 22 मई को केंद्र और भारतीय वायु सेना को निर्देश दिया था कि वे उस महिला अधिकारी को सेवा से मुक्त न करें, जो ऑपरेशन बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर का हिस्सा थी, लेकिन उसे स्थाई कमीशन देने से इनकार कर दिया गया था.
इस मामले में केंद्र और भारतीय वायु सेना से विंग कमांडर निकिता पांडे की याचिका पर जवाब मांगा गया था, जिन्होंने स्थाई कमीशन से वंचित किए जाने पर भेदभाव का दावा किया था.






















