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ढाई साल से खाली पड़ा है लोकसभा के डिप्टी स्पीकर का पद, आखिर क्या है सरकार के मन में?

लोकसभा 45 महीने बाद भी अपना उपाध्यक्ष नहीं चुन पाई है. मीडिया से बात करते हुए स्पीकर ने कहा है कि समय आने पर चुनाव होगा. लोकसभा उपाध्यक्ष के चुनाव में 3 वजहों से पेंच फंसा है.

लोकसभा गठन के 45 महीने बाद उपाध्यक्ष यानी डिप्टी स्पीकर का पद खाली है. सुप्रीम कोर्ट में इसको लेकर एक याचिका भी दाखिल की गई है. सोमवार (13 फरवरी) को याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने केंद्र और राज्यों से इस पर जवाब मांगा. 

बेंच ने इसे बहुत जरूरी बताते हुए अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि से भी सहयोग मांगा है. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं का कहना था कि संविधान में डिप्टी स्पीकर का चुनाव अनिवार्य है. इसके बावजूद लोकसभा और 5 राज्यों के विधानसभा में डिप्टी स्पीकर का चुनाव नहीं हो सका है. 

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल होने के बाद कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने लोकसभा अध्यक्ष और केंद्र सरकार पर निशाना साधा है. अधीर ने कहा कि बीजेपी परंपरा को नष्ट कर रही है. उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को देने की प्रथा है पर बीजेपी किसी को नहीं देना चाहती है.

संविधान में उपाध्यक्ष पद का भी जिक्र है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद-93 में लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद का जिक्र किया गया है. इसके तहत लोकसभा गठन के बाद तुरंत अपने दो सदस्यों को अपना अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनेगी. अगर बीच में दोनों में से कोई पद रिक्त होता है, तब भी लोकसभा को प्राथमिकता के आधार पर इन्हें भरना होगा.

लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव राष्ट्रपति और उपाध्यक्ष का चुनाव अध्यक्ष को कराने का अधिकार दिया गया है. दोनों का चुनाव आपसी सहमति या मत-विभाजन के आधार पर किया जा सकता है. इसी तरह अनुच्छेद 178 में राज्य विधानसभाओं में डिप्टी स्पीकर के चुनाव का प्रावधान किया गया है.

संविधान सभा की बैठक में बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर, एचवी कामथ और शिब्बन लाल सक्सेना के बीच डिप्टी स्पीकर पद को लेकर खूब बहस भी हुई थी. कामथ का तर्क था कि अध्यक्ष को अपना इस्तीफा उपाध्यक्ष के बजाय राष्ट्रपति को सौंपना चाहिए. अंबेडकर ने इसका विरोध किया. 1969 में लोकसभा अध्यक्ष नीलम संजीव रेड्डी ने अपना इस्तीफा उपाध्यक्ष को सौंपा था. 

उपाध्यक्ष पद की जरुरत क्यों?
लोकसभा में अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष ही सदन का संचालन करते हैं. उपाध्यक्ष पर सदन का अनुशासन बनाए रखने की भी जिम्मेदारी होती है. उपाध्यक्ष कोई विधेयक वित्त विधेयक है या नहीं, यह भी तय करता है.

दो ऐसे मौके भी आए हैं, जब उपाध्यक्ष ने अध्यक्ष का कार्यभार भी संभाला. पहला, 1956 में जब तत्कालीन अध्यक्ष जीवी मावलंकर के निधन के बाद सत्र का संचालन उपाध्यक्ष एमए आयंगर ने किया. 2022 में दूसरा मौका तब आया जब अध्यक्ष जीएमसी बालयोगी का निधन हो गया. उस वक्त संसद में आतंकवाद निरोधी विधेयक पेश किया गया था. 

महत्वपूर्ण विधेयक को देखते हुए सत्र का संचालन खुद उपाध्यक्ष पीएम सईद ने किया. उपाध्यक्ष नहीं होते, तो उस वक्त यह विधेयक अगले सत्र के लिए टल सकता था. 

उपाध्यक्ष के 2 महत्वपूर्ण अधिकार

  • जब भी संसद में कोई प्रस्ताव 2 वोटों से फंसता है, तो उपाध्यक्ष वोटिंग कर सकता है. अध्यक्ष के नहीं रहने की स्थिति में निर्णायक वोटिंग का भी अधिकार उपाध्यक्ष को है.
  • लोकसभा में संसदीय समिति के गठन में अगर उपाध्यक्ष का नाम शामिल किया जाता है तो कमेटी में उन्हें ही चेयरमैन बनाना होता है.

उपाध्यक्ष पद के लिए नहीं होता है शपथ
लोकसभा का कोई भी सदस्य उपाध्यक्ष बनने का अधिकार रखता है, लेकिन संसद पद छोड़ने के तुरंत बाद उसे उपाध्यक्ष पद से भी इस्तीफा देना होता है. उपाध्यक्ष को अपना इस्तीफा अध्यक्ष को देना होता है.

लोकसभा के उपाध्यक्ष को किसी भी तरह का शपथ या प्रतिज्ञा नहीं लेनी होती है. संसद के नियम के मुताबिक ही उपाध्यक्ष को सुविधाएं और वेतन दिया जाता है. उपाध्यक्ष को संसद में विरोधी दल के नेता की बगल वाली कुर्सी आवंटित किया जाता है.

अब 4 कहानी, जब सुर्खियों में रहा लोकसभा उपाध्यक्ष का पद

1. मधु लिमए ने स्थापित करवाई परंपरा- साल 1977 तक लोकसभा में कांग्रेस अपने या सहयोगी पार्टी के सदस्यों को ही उपाध्यक्ष बनाती थी. संसद के चौथी सत्र के दौरान समाजवादी नेता मधु लिमए ने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर सत्ताधारी दलों को लोगों को बिठाने का विरोध किया था. 

आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सरकार बनी, जिसके बाद मधु लिमए और डॉ समर गुहा ने उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को देने की बात कही. प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई समेत अधिकांश सदस्य इससे सहमत हो गए और कांग्रेस के गोडे मुरहरि को उपाध्यक्ष बनाया गया. 

लिमए का कहना था कि जब लोकसभा में संतुलन नहीं रहेगा, तो लोगों की आवाज दब जाएगाी. जनता पार्टी ने पहली बार विपक्षी नेता को उपाध्यक्ष बनाकर एक संसदीय परंपरा स्थापित किया. 

2. इंदिरा और राजीव ने तोड़ दी परंपरा- 1980 में जनता पार्टी की सरकार गिरने के बाद कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई. इसके बाद माना जा रहा था कि इंदिरा गांधी की सरकार परंपरा के मुताबिक उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को देगी. 

लेकिन इंदिरा ने परंपरा को तोड़ते हुए सहयोगी डीएमके के जी लक्ष्मणन को उपाध्यक्ष बनवा दिया. जनता पार्टी के नेताओं ने इसकी तीखी आलोचना भी की. 

1984 में इंदिरा की हत्या के बाद फिर से लोकसभा के चुनाव हुए और राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने. राजीव भी इंदिरा के कदम पर चलते हुए सहयोगी एआईडीएमके के एम थंबीदुरई को उपाध्यक्ष की कुर्सी सौंप दी. 

1991 में कांग्रेस ने पीवी नरसिम्हा राव की नेतृत्व में सरकार बनाई. राव ने फिर से परंपरा की शुरुआत करते हुए बीजेपी के एस मल्लिकार्जुनैया को उपाध्यक्ष को बनवाया. 

3. अटवाल को कुर्सी तक लेकर गए मनमोहन सिंह- 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए गठबंधन की सरकार बनी. कांग्रेस ने उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को देने का फैसला किया. 

बीजेपी ने उपाध्यक्ष का पद शिरोमणि अकाली दल के खाते में डाल दी. अकाली दल ने चरणजीत सिंह अटवाल को उपाध्यक्ष बनाने का ऐलान किया. सोमनाथ चटर्जी लोकसभा के अध्यक्ष थे.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अटवाल को स्पीकर की कुर्सी तक खुद लेकर गए. अभिवादन के बाद फिर उन्हें डिप्टी स्पीकर के लिए आवंटित कुर्सी तक ले जाकर बैठाया. 

4. 30 साल बाद फिर उपाध्यक्ष बने थंबीदुरई- 1984 में पहली बार लोकसभा के सांसद बने एम थंबीदुरई कांग्रेस की सरकार में लोकसभा के स्पीकर बने. थंबीदुरई की उम्र उस वक्त मात्र 37 साल थी. राजीव गांधी की सरकार ने समझौते के तहत सहयोगी एआईडीएमके को यह पद दिया था. 

2014 में थंबीदुरई फिर से लोकसभा के उपाध्यक्ष बनाए गए, लेकिन इस बार उनकी पार्टी का किसी से कोई गठबंधन नहीं था. बीजेपी ने लोकसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी एआईडीएमके को उपाध्यक्ष का पद देने का ऐलान किया.

इस ऐलान के तहत थंबीदुरई उपाध्यक्ष बनाए गए. थंबीदुरई सबसे ज्यादा दिनों तक उपाध्यक्ष पद पर रहे हैं. बीजेपी के सूरजभान सबसे कम दिनों तक इस पद पर रहे हैं. 

अब जानिए उपाध्यक्ष के चुनाव पर क्यों फंसा है पेंच?

1. सरकार और स्पीकर एक दूसरे के पाले में गेंद डाल रहे- अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक उपाध्यक्ष का चुनाव कराने की जिम्मेदारी लोकसभा अध्यक्ष की है, लेकिन जब अध्यक्ष से इस पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने समय आने पर कराए जाने की बात कही है.

लोकसभा अध्यक्ष के करीबी सूत्रों ने अखबार को बताया कि यह सरकार का विशेषाधिकार है और सरकार को ही इस पर निर्णय करना है. 

2021 में भी यह मुद्दा जोर-शोर से उछला था और उस वक्त संसदीय कार्यमंत्री प्रह्लाद जोशी ने इस पर किसी भी तरह की टिप्पणी करने से इनकार कर दिया था. 

2. बीजेडी ने पद लेने से कर दिया है इनकार- डेक्केन हेराल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी लोकसभा में डिप्टी स्पीकर का पद बीजेडी सांसद भर्तृहरी महताब को देना चाहती थी. बीजेपी ने इसके पीछे राज्यसभा में उपसभापति का उदाहरण दिया था. पार्टी ने तत्कालीन सहयोगी जेडीयू के हरिवंश को राज्यसभा में उपसभापति बनवाया था. 

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि जब यह प्रस्ताव बीजेडी सुप्रीमो नवीन पटनायक के पास गया तो उन्होंने इसे खारिज कर दिया. इसके बाद से ही इस पद को लेकर पेंच फंसा हुआ है. बीजेडी के पास लोक सभा में कुल 12 सांसद हैं. 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में बीजेडी ने एनडीए उम्मीदवार का समर्थन किया था. 

3. कोई नियमित अंतराल का प्रावधान नहीं- 2021 में आरएसपी सांसद एनके प्रेमचंद्रन ने एक प्राइवेट बिल लोकसभा में पेश किया था. प्रेमचंद्रन ने बिल में कहा था कि सरकार डिप्टी स्पीकर के चुनाव के लिए नियमित समय सीमा तय करे.

उन्होंने कहा कि अभी जो प्रावधान है, उसमें लिखा है कि जल्द से जल्द चुनाव हो और सरकार इसका दुरुपयोग करती है. प्रेमचंद्रन का कहना था कि जब समय सीमा तय हो जाएगा तो मजबूरन सरकार को डिप्टी स्पीकर पद के लिए चुनाव कराना होगा. 

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