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कपिल सिब्बल ने अब नए आपराधिक कानूनों पर उठाए सवाल, बोले- ऐसे देश में लोकतंत्र नहीं...

New Criminal Laws: राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि नये आपराधिक कानून को लेकर बीजेपी सरकार पर निशाना साधा है. उन्होंने इसे दमनकारी बताया है.

New Criminal Laws: राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि नये आपराधिक कानून पहले से अधिक दमनकारी हैं और इनका उद्देश्य देश के नागरिकों को नियंत्रित करना है. उन्होंने कहा कि ऐसे देश में लोकतंत्र नहीं हो सकता जहां सरकार का कामकाज व्यक्तियों और संस्थाओं को धमकाने के उद्देश्य से कानूनों के दुरुपयोग पर आधारित हो.

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष कपिल सिब्बल ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के प्रावधानों में कुछ विसंगतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन कानूनों के शीर्षक में भी पूरी तरह से विवेक का इस्तेमाल नहीं किया गया है. बीएनएस और बीएनएसएस ने क्रमशः भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) का स्थान लिया है. ये कानून एक जुलाई, 2024 से लागू हो चुके हैं.

'देश के नागरिकों को नियंत्रित करना है'

विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी द्वारा आयोजित अपराध और सजा पर व्याख्यान में सिब्बल ने कहा कि नए कानूनों का उद्देश्य सोशल मीडिया, किसानों, छात्रों सहित इस देश के नागरिकों को नियंत्रित करना है.

उन्होंने कहा, 'हम एक अधिनायकवादी व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं. नए कानून आपदा के लिए एक आदर्श नुस्खा हैं और सत्तारूढ़ पार्टी को विपक्ष को निशाना बनाने और उन पर मुकदमा चलाने का मौका देंगे.' सिब्बल ने कहा, 'आपने कानूनों को पहले की तुलना में कहीं अधिक दमनकारी बना दिया है.'

अमित शाह के दावे का विरोध

कपिल सिब्बल ने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का दावा है कि इन नए आपराधिक कानूनों को लागू करना औपनिवेशिक युग से बाहर निकलना है और इन कानूनों को और अधिक उदार बनाया गया है. वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि हालांकि, उन्होंने (शाह) जो किया है वह इसके ठीक विपरीत है.

उन्होंने कहा, 'इससे देश में अराजकता फैल रही है. जिस तरह से वे लोगों को गिरफ्तार कर रहे हैं, जिस तरह से वे गिरफ्तारियां कर रहे हैं और जिस तरह से दस्तावेजों का सहारा लिया जा रहा है, वह बेहद संदिग्ध है.'

कानून राजनीति का बना साधन 

सिब्बल ने कहा, 'यह सब दिखाता है कि अब इस देश में राजनीति या कहें कि इस देश में कानून राजनीति का साधन बन गया है. इन तीन कानूनों का इस्तेमाल अब न्याय के लिए नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाएगा कि आप लोगों को सजा दें, चाहे आपके पास सबूत हों या नहीं. यही बात गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के साथ भी है.'

सिब्बल ने कहा कि सवाल यह उठता है कि क्या ये कानून संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के अनुरूप हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे नए कानूनों की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है जो संवैधानिक मूल्यों से दूर जाकर अधिक अधिनायकवादी संस्कृति की ओर ले जाते हैं.

'एक लोकतांत्रिक देश नहीं बना सकते'

सिब्बल ने कहा, 'आप एक लोकतांत्रिक देश नहीं बना सकते जहां सरकार का कामकाज व्यक्तियों, संस्थाओं को धमकाने के उद्देश्य से कानूनों के दुरुपयोग पर आधारित हो. यही कारण है कि हम देख रहे हैं कि बेहद अमीर लोग इस देश को छोड़ रहे हैं और इसका प्रभाव यह है कि हमारी अर्थव्यवस्था स्थिर है और कोई भी अब निवेश नहीं करना चाहता है.' उन्होंने कहा, 'कोई भी इस तरह से निशाना नहीं बनना चाहता. कानून अधिकाधिक दखलंदाजी वाले होते जा रहे हैं और लोगों के वास्तविक मुद्दों का इससे कोई लेना-देना नहीं है.'

'ये कानून डालेंगे लोगों के जीवन को खतरे में'

सिब्बल ने कहा कि बच्चों सहित लोगों के सशक्तिकरण और युवाओं की बेरोजगारी जैसे वास्तविक मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय, सरकार अब ऐसे कानून बना रही है, जो लोगों के जीवन को खतरे में डालेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि वे संविधान के मूल्यों के अनुरूप नहीं, बल्कि शासन करने वालों के मूल्यों के अनुरूप काम करें. नयी दंड संहिता के नाम बीएनएस पर आपत्ति जताते हुए सिब्बल ने सवाल किया कि न्याय का इससे क्या लेना-देना है, क्योंकि दंड संहिता का उद्देश्य समाज के खिलाफ अपराध करने वाले लोगों को दंडित करना है और यही कारण है कि मुकदमा सरकार चलाती है, न कि कोई व्यक्ति.

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