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'मुस्लिमों को डर है हिंदू सिविल कोड थोपा जा रहा', ये दलील सुनते ही बोले चीफ जस्टिस- UCC का धर्म से...

प्रशांत भूषण ने कहा कि किसी देश के दीवानी कानून सभी के लिए समान होने चाहिए, तो सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, 'समान नागरिक संहिता एक संवैधानिक महत्वाकांक्षा है.'

देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा है कि समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code, UCC) संविधान का लक्ष्य है और इसका किसी भी धर्म से कोई मतलब नहीं है. गुरुवार (16 अप्रैल, 2026) को सीजेआई सूर्यकांत ने उस वक्त यह टिप्पणी की जब सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम महिलाओं के विरासत के अधिकारों से जुड़े एक मामले की सुनवाई चल रही थी. 

सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचौली की बेंच मामले पर सुनवाई कर रही थी. पौलोमी पाविनी शुक्ला और न्याय नारी फाउंडेशन ने अनुच्छेद 32 के तहत जनहित याचिका (PIL) दाखिल करके मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है. याचिका में इन प्रावधानों को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि ये महिलाओं के खिलाफ कथित तौर पर भेदभावपूर्ण हैं, खासकर संपत्ति के अधिकारों के मामले में.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि आदर्श तौर पर एक ऐसा यूनिफॉर्म सिविल कोड होना चाहिए, जो सभी धर्मों के विरासत के अधिकारों को नियंत्रित करे, लेकिन मुसलमानों के मन में एक डर है कि प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड के जरिए हिंदू सिविल कोड थोपा जा सकता है. इस पर सीजेआई ने कहा कि यूसीसी  संविधान का लक्ष्य है और इसका किसी भी धर्म से कोई मतलब नहीं है.

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि पर्सनल लॉ संविधान के अनुच्छेद-25 के तहत संरक्षण प्राप्त नहीं है. अगर यह भेदभावपूर्ण है, तो इसे रद्द किया जाना चाहिए. शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट इस आधार पर हस्तक्षेप करने के लिए अनिच्छुक था कि शरीयत कानून में किसी भी शब्द या प्रावधान को हटाना अदालत की ओर से कानून बनाने जैसा होगा, लेकिन बाद में प्रशांत भूषण के यह कहने के बाद कि एक धारा संविधान के तहत महिलाओं के समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करती है, बेंच ने इस मुद्दे पर विचार करने पर सहमति व्यक्त की. कोर्ट ने वकील प्रशांत भूषण को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि कुछ पीड़ित मुस्लिम महिलाएं भी इस सुनवाई का हिस्सा बनें.

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सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, 'इसके अलावा, महिलाओं के संपत्ति अधिकार किसी धर्म की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं हो सकते और इसलिए, संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत इन्हें संरक्षित नहीं किया जा सकता.' अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है, जिसके तहत कोई भी व्यक्ति अपने धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने के लिए स्वतंत्र है. हालांकि, यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है और सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन है.

जब प्रशांत भूषण ने कहा कि किसी देश के दीवानी कानून सभी के लिए समान होने चाहिए, तो सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, 'समान नागरिक संहिता एक संवैधानिक महत्वाकांक्षा है.' याचिका में कहा गया कि वर्तमान शरीयत उत्तराधिकार नियम महिलाओं के खिलाफ स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण हैं.

प्रशांत भूषण ने कहा कि 1937 का अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है. उन्होंने कहा कि उत्तराधिकार से जुड़े मामले दीवानी प्रकृति के होते हैं और ये अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं हैं. प्रशांत भूषण ने कहा, 'यह कहना कि महिलाओं को पुरुष समकक्षों की तुलना में आधा या उससे भी कम हिस्सा मिलेगा, भेदभावपूर्ण है.'

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में लंबित इसी तरह के मामलों का हवाला दिया, जब बेंच ने जनहित याचिका पर सुनवाई करने में अपनी अनिच्छा व्यक्त की थी, और सुझाव दिया था कि अगर 1937 के कानून के भेदभावपूर्ण प्रावधानों को रद्द कर दिया जाता है, तो अदालत निर्देश दे सकती है कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम को मुसलमानों पर लागू किया जाए ताकि विधिक शून्यता से बचा जा सके.

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बेंच ने न्यायिक हस्तक्षेप की संभावना के संबंध में सतर्कता व्यक्त की और कहा कि कोर्ट को हस्तक्षेप करने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ सकता है. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि व्यक्तिगत कानूनों को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम से प्रतिस्थापित करना कानून बनाने के क्षेत्र में हस्तक्षेप हो सकता है, जो कि संसद के लिए आरक्षित अधिकार है.

उन्होंने कहा, 'हम न तो कानून बना सकते हैं और न ही संशोधन कर सकते हैं.' सुनवाई के दौरान, सीजेआई ने इस बात पर जोर दिया कि इन कानूनों से प्रभावित लोगों की बात सीधे तौर पर सुनी जानी चाहिए. जनहित के पहलू को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा, 'किसी न किसी पीड़ित व्यक्ति को तो आगे आना ही होगा.' इससे पहले, बेंच ने प्रशांत भूषण को याचिका में संशोधन करने के लिए कहा था और टिप्पणी की थी कि एक समान नागरिक संहिता का समय आ गया है.

बेंच ने 1937 के शरीयत कानून के उन प्रावधानों को रद्द करने के अनुरोध संबंधी याचिका को, एक बहुत अच्छा मामला करार दिया था, जिस पर केवल विधायिका को ही विचार करना चाहिए. कोर्ट ने प्रशांत भूषण को पौलमा पाविनी शुक्ला और अन्य की ओर से दायर याचिका में संशोधन करने की अनुमति दी थी और मामले को यह कहते हुए चार हफ्ते बाद अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था कि यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है.

Input By : PTI
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