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BJP On Freebies: मुफ्त की रेवड़ी और कल्‍याणकारी योजनाओं के बीच क्या है अंतर? BJP ने चुनाव आयोग को बताया

राजनीतिक दलों ने फ्रीबीज पर चुनाव आयोग को अपना जवाब सौंप दिया है. बीजेपी का कहना है कि मुफ्त उपहार मतदाताओं को लुभाने के लिए होते हैं, लेकिन कल्याणवाद समावेशी विकास सुनिश्चित करता है.

Political Parties On Freebies: आदर्श आचार संहिता में संशोधन के चुनाव आयोग (Election Commission) के प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने मुफ्त और कल्याणकारी योजनाओं के के बीच अंतर पर अपना रुख साफ कर दिया है. वहीं कांग्रेस (Congress) और अधिकांश विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग के इस कदम की निंदा की है. उन्होंने 'फ्रीबीज' को लेकर चुनाव आयोग के प्रस्ताव को अतिश्योक्तिपूर्ण बताया है. दूसरी ओर, अकाली दल ने चुनाव आयोग के इस कदम का स्वागत किया है.

बीजेपी ने कहा- फ्रीबीज मतदाताओं को लुभाने के लिए है

बीजेपी ने कहा कि 'मुफ्त उपहार' मतदाताओं को लुभाने के लिए हैं, जबकि कल्याणवाद एक नीतिगत हस्तक्षेप है जो समावेशी विकास सुनिश्चित करता है. बीजेपी ने चुनाव आयोग के इस विचार पर भी कोई आपत्ति नहीं जताई कि राजनीतिक दलों को अपने घोषणा पत्र में किए गए चुनावी वादों की वित्तीय व्यवहार्यता प्रस्तुत करनी चाहिए.

द इंडिनय एक्सप्रेस के मुताबिक, एक उदाहरण का हवाला देते हुए बीजेपी के एक नेता ने कहा, "एक गरीब घर में बिजली पहुंचाना जहां 75 वर्षों में बिजली नहीं पहुंची है, बुनियादी ढांचा दे रहा है, लेकिन उनका बिजली उपयोग शुल्क माफ करना या उन्हें मुफ्त बिजली देना फ्रीबीज है."

टीओआई के मुताबिक, एक बीजेपी नेता ने कहा, "पार्टी को लगता है कि राजनीतिक दलों को लोगों/मतदाताओं को सशक्त बनाने और उनके समग्र विकास के लिए उनकी क्षमता बढ़ाने पर जोर देना चाहिए." मुफ्त घर और राशन देने पर पार्टी नेता ने कहा कि घर, एक बुनियादी आवश्यकता, एक बार की मदद थी, जबकि राशन वितरण कोविड संकट की शुरुआत के बाद शुरू हुआ था.

कांग्रेस ने चुनाव आयोग से क्या कहा?

चुनाव आयोग को दिए जवाब में कांग्रेस ने कहा कि मुफ्त उपहार "एक जीवंत लोकतांत्रिक व्यवस्था की हिस्सा है." पार्टी नेता जयराम रमेश ने चुनाव पैनल को लिखे पत्र में कहा, "यह वास्तव में कुछ ऐसा है जिसे तय किया जाना है, चाहे वह चुनाव से पहले हो या चुनाव के बाद, चुनावी सजा या चुनावी स्वीकृति और इनाम के रूप में, मतदाता ऐसे चुनावी वादों या अभियान आश्वासनों का समझदारी से फैसला करता है. ऐसे मुद्दों को विनियमित करने का अधिकार न तो चुनाव आयोग, न ही सरकार और न ही अदालतों के पास है. इसलिए आयोग के लिए ऐसा करने से बचना सबसे अच्छा होगा."

अधिकार क्षेत्र पर, पार्टी ने कहा, "यदि चुनाव आयोग इस तरह के प्रतिबंध पर विचार करता है तो उसे पहले संसद में इसे पारित कराने की आवश्यकता होगी. इसके अलावा, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के मार्गदर्शन के लिए आदर्श आचार संहिता, 2015 के भाग आठ में भी, ईसीआई सामान्य दिशानिर्देश रखता है, जो अनिवार्य रूप से एक जिम्मेदार तरीके से अभियान के वादे करने के लिए कहते हैं."

'अजीबोगरीब वादे एक्सपायरी डेट के साथ आते हैं'

कांग्रेस ने कहा, "प्रणाली को ठीक करने की आवश्यकता नहीं है, हमारी राय में, यह समस्या एक काल्पनिक है. तथ्य यह है कि राजनीतिक दलों को अपने घोषणापत्र को ऐसी भाषा में लिखने में सक्षम होना चाहिए जो उनकी विचारधारा को सर्वोत्तम रूप से व्यक्त करे और यह कहना बेमानी है कि आपको यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आप एक विस्तृत रोडमैप प्रदान करें कि वास्तव में वादा कैसे पूरा किया जाएगा….अजीबोगरीब वादे एक एक्सपायरी डेट के साथ आते हैं और खुद ही एक्सपोज हो जाते हैं."

वाम दलों ने की चुनाव आयोग की आलोचना

वामपंथी दलों सीपीआई (एम) और सीपीआई, साथ ही डीएमके ने भी तर्क दिया कि प्रस्तावित संशोधन ठीक नहीं है और चुनाव आयोग अपने दायरे से बाहर जाकर ये कदम उठा रहा है. माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने पत्र में कहा है, "आदर्श आचार संहिता में प्रस्तावित संशोधन और चुनावी वादों और उनके वित्तीय प्रभावों के विवरण के खुलासे के लिए प्रोफार्मा आयोग को राजनीतिक और नीतिगत मामलों में शामिल करेगा जो इसके दायरे में नहीं आते हैं."

डीएमके के राज्यसभा सदस्य पी विल्सन ने संविधान में निहित राज्य नीति के निदेशक सिद्धांतों का उल्लेख किया और कहा, "यह राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों को पूरा करने वाला एक कल्याणकारी उपाय है. यहां तक ​​कि अदालतों को भी इस मामले में जाने का अधिकार नहीं है. अदालतों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को लागू करने के लिए कोई निर्देश नहीं दे सकती और न ही इसे लागू करने वाले राज्य को प्रतिबंधित कर सकती है."

अकाली दल ने किया चुनाव आयोग के कदम का समर्थन

हालांकि, अकाली दल ने चुनाव आयोग के इस कदम का समर्थन किया है और कहा है कि चुनाव आयोग को पार्टियों से मिले आंकड़ों की "सत्यता" की जांच करने के लिए अपनाए जाने वाले तंत्र को विस्तृत करना चाहिए. SAD ने चुनाव आयोग को अपने जवाब में कहा, "अतिरिक्त संसाधन जुटाने के काल्पनिक आंकड़ों का हवाला देकर मतदाताओं को गुमराह करने की कोशिश की जाती है."

अकाली दल के वरिष्ठ उपाध्यक्ष दलजीत सिंह चीमा के एक पत्र में कहा गया है, "सरकार बनने के बाद भी अगर कोई पार्टी अपने बड़े वादों को लागू करने में विफल रहती है .... तो अगले आम चुनाव से पहले उस पार्टी के खिलाफ कुछ ठोस कार्रवाई की जानी चाहिए."

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