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In Depth: अरविंद केजरीवाल के लिए संजीवनी है बवाना-विजय!

ये सीट आप के विधायक रहे वेदप्रकाश के इस्तीफे के कारण खाली हुई थी और एक बार फिर आप ने इस सीट को अपनी झोली में डाल लिया. उपचुनाव में सत्ताधारी पार्टी का जीतना कोई बड़ी बात नहीं मानी जाती लेकिन बवाना में केजरीवाल की जीत काफी अहम है.

नई दिल्ली: दिल्ली की बवाना विधानसभा उपचुनाव में आम आदमी पार्टी ने बड़ी जीत दर्ज करते हुए बीजेपी को लगभग 24 हजार वोटों से हराया. कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही और उसने अपने प्रदर्शन में काफी सुधार किया. ये सीट आप के विधायक रहे वेदप्रकाश के इस्तीफे के कारण खाली हुई थी और एक बार फिर आप ने इस सीट को अपनी झोली में डाल लिया. उपचुनाव में सत्ताधारी पार्टी का जीतना कोई बड़ी बात नहीं मानी जाती लेकिन बवाना में केजरीवाल की जीत काफी अहम है.

हारते तो केजरीवाल की राजनीति पर सवाल उठते

दरअसल 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की आंधी में आप को 70 में से 67 सीट मिली थी. लेकिन इसके बाद से अब तक ढाई साल में केजरीवाल सरकार लगातार विवादों में घिरी रही है. केजरीवाल कभी मंत्री की फर्जी डिग्री विवाद में फंसे तो कभी मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण. अरविंद केजरीवाल दिल्ली सरकार के अधिकारों को लेकर उपराज्यपाल कार्यालय तो राजनीतिक वजहों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बयानबाजी करते रहे.

bawana

उन पर ये भी आरोप लगा कि दिल्ली सरकार के कामकाज की बजाय उनका पूरा ध्यान पंजाब और गोवा में सरकार बनाने को लेकर है. कुल मिला कर केजरीवाल की लोकप्रियता घटती गई. पहले उन्हें पंजाब और गोवा में निराशा मिली फिर दिल्ली के राजौरी गार्डन विधानसभा उपचुनाव में उनके उम्मीदवार की जमानत जब्त हो गई.

दिल्ली नगर निगम चुनाव में भी आम आदमी पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा. नगर निगम चुनाव से ठीक पहले बवाना से आप के विधायक इस्तीफा दे कर बीजेपी में शामिल हो गए. नगर चुनाव की हार के3 बाद केजरीवाल के लाडले मंत्री रहे कपिल मिश्रा ने केजरीवाल के खिलाफ आरोपों की बौछार कर दी. इन सब हालातों के बीच बवाना सीट पर उपचुनाव हो रहा था जिसमें केजरीवाल का पूरी राजनीति दांव पर लगी थी. आम आदमी पार्टी ने स्थिति की गंभीरता को समझा और प्रचार में पूरी ताकत झोंक दी.

कैसे बनी जीत की रणनीति? इसके लिए मोर्चे पर पार्टी के दिल्ली संयोजक और दिल्ली सरकार में मंत्री गोपाल राय लगाए गए. गोपाल राय और उनकी टीम ने बवाना में खूंटा गाड़ दिया और 2 महीने तक हर गली-मुहल्ले में प्रचार किया. उन्होंने ना केवल नाराज कार्यकर्ताओं फिर से जोड़ा बल्कि 2013 में बवाना से बीजेपी में विधायक रहे गुग्गन सिंह को भी पार्टी में शामिल करा लिया.

पार्टी के छोटे-बड़े नेताओं से लेकर खुद मुख्यमंत्री केजरीवाल ने घर-घर जा कर प्रचार किया और जम कर वादे किए. आप लोगों को ये समझाने में कामयाब रही कि ढाई सालों में उसने शिक्षा-स्वास्थ्य आदि क्षेत्र में अच्छे काम किए हैं और बचे हुए कार्यकाल में इलाके का विकास वही विधायक कर सकता है जिसकी सरकार हो. इसके अलावा पार्टी की रणनीति थी कि बीजेपी के उम्मीदवार वेदप्रकाश पर 'गद्दार और भगौड़ा' का ठप्पा लग जाए. साथ ही कांग्रेस के कद्दावर उम्मीदवार सुरेंद्र कुमार के खिलाफ आप ने लोगों से कहा कि कांग्रेस को वोट करने से उनका वोट खराब होगा. आम आदमी पार्टी की सारी रणनीति कामयाब रही.

केजरीवाल सरकार ने 2016 में किसानों को खराब फसल का काफी बढ़िया मुआवजा दिया था. इसका भी उसे बवाना के ग्रामीण इलाकों में फायदा मिला. हालांकि उसे गांवों में लीड नहीं मिली. लेकिन झुग्गियों और अनाधिकृत कॉलोनियों में बड़ी बढ़त मिली. इन सब के अलावा आप ने चुपचाप पूर्वांचल कार्ड खेलते हुए पूर्वांचल पृष्ठभूमि के रामचंद्र को उम्मीदवार बनाया. इसका भी उसे लाभ मिला और उन्हें कुल 1,31,950 वोटों में से 59,886 हजार वोट मिले. बीजेपी को 35,834 और कांग्रेस को 31,919 वोट मिले. आप लगभग 24 हजार वोटों से चुनाव जीत गई.

पल-पल बदला समीकरण हालांकि आप के लिए ये जीत आसान नहीं थी. केवल 45 फीसदी मतदान होने से उनके कैम्प में रिजल्ट को लेकर आशंका भी थी. सोमवार को जब गिनती शुरू हुई तो सात राउंड तक कांग्रेस आगे थी. छठे राउंड में आप तीसरे स्थान पर लुढ़क गई. लेकिन सातवें राउंड से जब उसके मजबूत किलों के बूथ की गिनती शुरू हुई तो उसने बढ़त बनानी शुरू कर दी और आठवें और नवें राउंड सबसे आगे हो गई.

दसवें राउंड में कांग्रेस फिर आगे आई लेकिन बारहवें राउंड के बाद पीछे छूटती गई और आखिर में 22 वें राउंड में बीजेपी से भी पिछड़ गई और आखिर में 28 वें राउंड के साथ जब गिनती खत्म हुई तो कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही. हालांकि पिछले चुनाव के 8 फीसदी वोट के मुकाबले कांग्रेस ने 24 फीसदी वोट प्राप्त कर अपने प्रदर्शन में काफी सुधार किया है. बीजेपी को उसके परम्परगत वोटरों ने वोट दिया. लेकिन उसके उम्मीदवार को इस्तीफे और दलबदल के कारण लोगों की नाराजगी का सामना करना पड़ा.

जीत का मतलब बवाना अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित सीट है. इस जीत में आम आदमी पार्टी के लिए सबसे बड़ी राहत की बात ये है कि मिडिल क्लास और उसके नीचे के तबके के वोटर और दलित-अल्पसंख्यक पार्टी के साथ मजबूती से खड़े दिखे हैं. झटके पर झटके लगने और केजरीवाल की लोकप्रियता में गिरावट के बावजूद वोटरों को उनसे उम्मीद है. उपचुनाव में जीत से केजरीवाल और आदमी पार्टी को नया आत्मविश्वास मिला है.

लाभ का पद के मामले में आप के 20 विधायकों की सदस्यता पर तलवार लटक रही है और अगर इन सीटों पर उपचुनाव हुए तो उसमें आप के लिए बवाना का कॉन्फिडेंस बोनस का काम करेगा. हालांकि कांग्रेस की लगातार मजबूत होती स्थिति उसके लिए चिंता की बात है लेकिन तसल्ली की बात ये है कि केजरीवाल को बराबरी की टक्कर देने के लिए दिल्ली बीजेपी के पास कोई चेहरा नहीं है.

जहां तक आम आदमी पार्टी की अंदरूनी राजनीति की बात है तो MCD में हार के बाद पार्टी की कमान और बवाना का मोर्चा संभालने वाले गोपाल राय का कद काफी मजबूत हो गया है. 'असंतुष्ट' चल रहे कुमार विश्वास ने भी जीत की श्रेय गोपाल राय को दिया और केजरीवाल का नाम तक नहीं लिया. अब आगे नजरें इस बात पर रहेंगी की विवादों से दूर और खामोशी से काम करने की अपनी नई रणनीति को केजरीवाल कब तक जारी रखते हैं.

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