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अजित डोभाल को क्यों कहा जाता है भारत का जेम्स बॉन्ड? इन तीन मिशन से समझें

Ajit Doval Birthday Special: अजित डोभाल भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार है. इससे पहले वह इंटेलिजेंस ब्यूरो के चीफ भी रह चुके हैं. उन्होंने जासूस रहते हुए कई महत्वपूर्ण मिशनों को अंजाम दिया है.

Ajit Doval Birthday: अजित डोभाल वर्तमान में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं. वह मई 2014 से इस पद पर बने हुए हैं. यह उनका तीसरी कार्यकाल है. भारत की सुरक्षा हितों के लिहाज से इस सबसे महत्वपूर्ण पद पर इतने लंबे समय तक बने रहने का कारण उनका दमदार रिकॉर्ड रहा है. डोकलाम विवाद को शांत कराना हो या फिर बालाकोट में एयर स्ट्राइक करनी हो, उन्होंने अपने अनुभव से बीते 10 सालों में ऐसे हर एक मिशन में उल्लेखनीय भूमिकाएं निभाई हैं.

इससे पहले जब वह IB चीफ थे और उससे भी पहले जब वह एक जासूस थे, तब भी उन्होंने भारत की एकता और अखंडता को आंच न आने देने के लिए कई यादगार मिशन को अंजाम दिए थे. यही कारण भी है कि अक्सर उनके लिए 'भारत का जेम्स बॉन्ड' जैसा शब्द उपयोग किया जाता है. बीते सोमवार (20 जनवरी) को इस शख्सियत ने अपने 80 बरस पूरे कर लिए. ऐसे में क्यों न इस महानायक के तीन सबसे महत्वपूर्ण मिशन आपके साथ साझा किए जाएं...

पहला मिशन: 1968 में आईपीएएस अधिकारी बनने के कुछ ही सालों में उनकी योग्यताएं देख उन्हें पूर्वोत्तर भेजा गया. 1980 के दशक में पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में उग्रवाद हावी था. 1972 में जब यहां डोभाल गए तो उन्होंने खुफिया अधिकारी के तौर पर रहते हुए उग्रवादियों के बीच अपनी अच्छी पैठ बना ली. बताते हैं कि उग्रवादी संगठन मिजो नेशनल आर्मी के ज्यादातर कमांडर से उन्होंने गहरी दोस्ती कर ली थी. इसी दोस्ती ने आगे चलकर सरकार और इस उग्रवादी संगठन के बीच शांति समझौते की राह तैयार की.

दूसरा मिशन: अजीत डोभाल ने पाकिस्तान में भी जासूस बन कर रहे. उन्होंने वहां कई अंडरकवर ऑपरेशन चलाए. इसके बाद जब वह कश्मीर आए तो उन्होंने यहां भी उग्रवादियों को साधने की कोशिश की. उन्होंने उग्रवादी मोहम्मद यूसुफ पारे (कुका पारे) और उसके समर्थकों को आत्मसमर्पण के लिए तैयार किया, जिससे बाद 1996 में जम्मू-कश्मीर के चुनावों के लिए रास्ता खुल सका.

तीसरा मिशन: 1980 के दशक में पंजाब को एक अलग सिख राज्य बनाने के लिए खालिस्तानी आंदोलन चल रहा था. अमृतसर का स्वर्ण मंदिर खालिस्तानियों का अड्डा बन गया था. 1984 के ऑपरेशन ब्लू स्टार ने खालिस्तानियों के मंसूबों पर पानी फेर दिया, लेकिन 1988 में फिर से अशांति फैलने लगी. इसके बाद ऑपरेशन ब्लैक थंडर शुरू किया गया. इसमें कोशिश थी कि मंदिर को पिछली बार की तरह नुकसान न पहुंचाते हुए उग्रवादियों को बाहर निकालना. यहां अजित डोभाल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

वह अमृतसर में पहले तो रिक्शा चालक बने और खालिस्तानियों के बीच खुद को पाकिस्तान की खूफिया एजेंसी ISI का एजेंट बताने लगे. खालिस्तानियों के बीच उनकी गहरी पैठ हुई और उन्होंने महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाते हुए भारतीय सुरक्षाबलों को अवगत कराया.

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