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पहले विश्व युद्ध में दुश्मनों को ढेर करने वाली ये राइफल बनेगी इतिहास, इस्तेमाल पर लगाई गई रोक

प्रदेश भर के थानों को 63 हजार इंसास और 23 हजार एसएलआर राइफलें दी जा चुकी हैं. जिसके बाद पुलिसकर्मियों को थ्री नॉट थ्री रायफल का प्रयोग ना करने के निर्देश दिए गए हैं.

लखनऊ. 70 सालों से अपराधियों के लिए दहशत का सबब कही जाने वाली थ्री नॉट थ्री राइफल आज से इतिहास बन जाएगी. कभी यूपी पुलिस का ये भरोसेमंद साथी समय के हिसाब से बूढ़ा हो चला है. आज के दौर की ऑटोमैटिक राइफलों के आगे इस नायाब असलहे का रौब खत्म हो गया है. शासन के इसके प्रयोग पर पूरी तरह पाबंदी लगाने का आदेश जारी कर दिया है.

अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी ने गुरुवार को जारी अपने आदेश में कहा है कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के मकसद से 63 हजार इंसास और 23 हजार एसएलआर राइफलें प्रदेश भर के थानों को दी जा चुकी हैं. ऐसे में पुलिसकर्मियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे थ्री नॉट थ्री रायफल का प्रयोग न करें. अब अगर किसी थाने पर इसका इस्तेमाल होता पाया गया तो संबंधित थाने और जिले की पुलिस लाइन के आरआई के खिलाफ कार्रवाई होगी.

अवनीश अवस्थी ने यह भी बताया कि सिपाहियों की भर्ती प्रक्रिया के मद्देनजर 8 हजार इंसास राइफल रिजर्व में गई है. इसके अलावा इतनी ही इंसास राइफल व 10 हजार नाइन एमएम पिस्टल खरीदने के लिए प्रस्ताव शासन को भेजा जा रहा है.

पहले विश्व युद्ध में मिली थी अलग पहचान थ्री नॉट थ्री राइफल को पहले विश्व युद्ध का हीरो माना जाता है. जानकारों के मुताबिक थ्री नॉट थ्री का सबसे पहले इस्तेमाल 1914 में पहले विश्व युद्ध में हुआ था. इसकी मारक क्षमता लगभग 2 किलोमीटर थी. यूपी पुलिस के पास यह हथियार 1945 में आई. इससे पहले मस्कट राइफल 410 का प्रयोग होता था. इसके बाद 80 के दशक में पुलिस को एसएलआर पुलिस को मिली. बाद में एके-47 समेत दूसरे ऑटोमैटिक असलहों का प्रयोग बढ़ने लगा तो थ्री नॉट थ्री उस दौड़ से बाहर होती गई.

अब 70 साल पुराने इस हथियार के प्रयोग पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी गई है. थ्री नॉट थ्री की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि तमाम कंपनियों के उत्पाद भी इस नाम से निकाले जाते हैं.

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