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पढ़िए हाजी मस्तान की असली कहानी जिससे खौफ खाती थी पूरी मुंबई

हाजी मस्तान वो नाम है जिसे मुंबई अंडरवर्ल्ड कभी भुला नहीं सकता. दाऊद और पठान गैंग को एक करने वाला मस्तान, नामी माफिया वर्धा को भी अपने इशारों पर नचाता था. दिलीप कुमार से लेकर संजीव कुमार तक के साथ उसकी मुलाकातें थीं

हाजी मस्तान वो नाम है जिसे मुंबई अंडरवर्ल्ड कभी भुला नहीं सकता. दाऊद और पठान गैंग को एक करने वाला मस्तान, नामी माफिया वर्धा को भी अपने इशारों पर नचाता था. दिलीप कुमार से लेकर संजीव कुमार तक के साथ उसकी मुलाकातें थीं. फिर ऐसा क्या हुआ कि मस्तान की ठसक और चमक पर वक्त की धूल जम गई? मुंबई के सबसे बड़े तस्कर को पुरानी फिएट क्यों इस्तेमाल करनी पड़ी? और क्यों उसकी मौत पर कोई फिल्मी हस्ती नहीं पहुंची? हाजी मस्तान की कहानी यकीनन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं. बचपन बेहद गरीबी में गुजारने वाला मस्तान जब अमीरी की सीढ़ियां चढ़ा तो ऐसी ऊंचाई पर पहुंचा जहां तक पहुंचने के लिए किस्मत की देवी का बेटा बनना पड़ता है... और शायद हाजी मस्तान के लिए ये बात सही थी. किसने सोचा था साइकिल मरम्मत की दुकान चलाने वाला मस्तान एक दिन लंबी गाड़ियों से घूमेगा और पूरी मुंबई उसके इर्द गिर्द घूमेगी. 1926 को शुरू हुई मस्तान की कहानी 1994 में खत्म हो गई. चलिए आज आपको यही कहानी सुनाते हैं. एबीपी न्यूज़ के प्रमुख संपादक मिलिंद खांडेकर ने 1991 में 'प्रभात किरण' नाम के अखबार के लिए मस्तान का इंटरव्यू किया था. इस इंटरव्यू में मस्तान ने अपने ऊपर लगे तमाम आरोपों को खारिज कर दिया था और खुद को व्यापारी बताया था. जेपी (जयप्रकाश नारायण) के सामने तस्करी छोड़ने की कसम खाने वाले मस्तान ने इस इंटरव्यू में कहा था कि उसने जेपी को मुल्क के खिलाफ काम ना करने का वचन दिया था. साफ था कि 1991 तक पहुंचते-पहुंचते मस्तान मंझा हुआ नेता बन चुका था. पढ़िए हाजी मस्तान की असली कहानी जिससे खौफ खाती थी पूरी मुंबई शुरुआती सफर तमिलनाडु का रहने वाला मस्तान आठ साल की उम्र में मुंबई पहुंचा था. पहले साइकिल की दुकान खोली और फिर डॉक पर कुली बन गया. यहां उसकी दोस्ती एक अरब से हुई जो तस्कर था. एक मामले में वो जेल चला गया. जब वो जेल से लौटा तो मस्तान ने उसकी पेटी खोली तक नहीं थी. इस पेटी में सोना भरा था. इसमें से आधा सोना उसने मस्तान को दे दिया और अपने धंधे में शामिल कर लिया. इसके बाद तो मस्तान की जिंदगी ही बदल गई. तस्करी की इस राह पर चल कर वो अमीरी की ऊंचाइयों तक पहुंच गया. दूसरों से कराता था काम कहा जाता है कि मस्तान डॉन जरूर था लेकिन उसने कभी गोली नहीं चलाई और ना ही किसी की जान ली. ऐसा नहीं था कि वो अहिंसावादी था लेकिन वो खुद ये सब नहीं करना चाहता था. डॉक पर उसका एकछत्र राज चलता था और कुली भी उसे बहुत मानते थे. सभी लोग उसके लिए काम करने को तत्पर रहते थे. कहा जाता है कि पुलिसवालों और बाकी अधिकारियों को वह खूब तोहफे देता था और उनका जमीर इन्हीं तोहफों के बोझ तले दब जाता था. एक वक्त था जब वर्दराजन मुदालियार, करीम लाला, पठान गैंग और दाऊद गैंग सभी उसकी सरपरस्ती में थे. पढ़िए हाजी मस्तान की असली कहानी जिससे खौफ खाती थी पूरी मुंबई मधुबाला से मुहब्बत मस्तान मिर्जा उर्फ हाजी मस्तान फिल्मों का बहुत बड़ा शौकीन था और फिल्म अभिनेत्री मधुबाला को बहुत पसंद करता था. कहा तो ये भी जाता है कि वो उनसे मुहब्बत करता था. यकीनन ये पसंद एकतरफा थी. मस्तान को मधुबाला तो नहीं मिलीं लेकिन एक स्ट्रगल कर रही अभिनेत्री सोना मिल गईं. सोना की शक्ल बहुत हद तक मधुबाला से मिलती थी और शायद यही वजह थी कि मस्तान के जीवन में उनकी एंट्री हुई. फिल्मों के दीवाने राज कपूर, दिलीप कुमार और संजीव कुमार के साथ उनकी खासी मेल मुलाकात थी. कहा तो ये भी जाता है कि दीवार के रोल को सही से निभाने की चाहत में अमिताभ बच्चन भी उसके घर जाते थे. सोना और मस्तान ने कई फिल्मों में पैसा लगाया लेकिन सफलता नहीं मिली. लेकिन बाद के दिनों में बदनामी का खौफ इतना था कि फिल्मी दुनिया से इतनी नजदीकियां होने के बाद भी उसकी मौत पर सिवाय मुकरी के कोई फिल्मी हस्ती नहीं पहुंची. इंदिरा तक थी धमक की गूंज एक वक्त था जब मस्तान का रुआब अपने चरम पर था और पूरे महाराष्ट्र में उसका जलवा था. कहा जाता है कि इंदिरा गांधी तक उसकी धमक की गूंज थी. जब आपातकाल लगा तो इंदिरा के आदेश पर कई लोगों को गिरफ्तार किया गया. मस्तान भी उन्हीं में से एक था. जेल में उसकी मुलाकात जेपी से हुई. इसी मुलाकात ने मस्तान की जिंदगी बदल दी. उसने राजनीति में आने का मन बना लिया और एक पार्टी बना कर मैदान में उतर आया. दिलीप कुमार ने इस पार्टी का खूब प्रचार भी किया. उसका इरादा दलित, मुस्लिम वोट के सहारे सत्ता हासिल करना था लेकिन ऐसा हो ना सका. मस्तान ने वीपी सिंह का प्रचार भी किया था और कांशीराम, वीपी की तरह ही वह भी राजनीति में आगे बढ़ना चाहता था. वह खुद को 'बाबा साहेब' कहलवाना पसंद करता था. डूबने लगा जब सूरज एक वक्त आया जब वह तस्करी छोड़ रहा था और साथ ही माफियागिरी से भी पीछे हट रहा था. ये वो वक्त था जब वर्दराजन मुदालियार वापस दक्षिण लौट गया था. करीम लाला और पठान गैंग का खेल खत्म होने को था और दाऊद का सूरज चढ़ने लगा था. पैसा फिल्मों और राजनीति में खत्म हो गया था और धमक, दाऊद गैंग जैसे नए गैंग्स के कारण खत्म हो रही थी. हालांकि 555 सिगरेट पीने वाले मस्तान पर किसी अदालत में कोई गुनाह साबित नहीं हुआ.
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