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इस्लाम में हिजरी यानी चंद्र कैलेंडर की मान्यता क्यों? कुरान और हदीस में छिपा है इसका जवाब

Islamic calendar: इस्लामी कैलेंडर एक चंद्र कैलेंडर है. जो चंद्रमा के चक्रों पर आधारित है. इस कैलेंडर में महीनों की संख्या 12 रखी गई है और कुरान में सख्त आदेश दिया गया है कि उसमें कोई कमीबेशी नहीं करे.

Islam: हिजरी या इस्लामी कैलेंडर एक चंद्र कैलेंडर है जो चंद्रमा के चक्रों पर आधारित 12 महीनों का होता है, जबकि मॉडर्न कैलेंडर, जिसे हम ग्रेगोरियन कैलेंडर कहते हैं, सूरज के हिसाब से काम करता है. हिजरी कैलेंडर की शुरुआत पैगंबर मोहम्मद के मक्का से मदीना हिजरत (पलायन) करने से हुई थी. 

चंद्र कैलेंडर की पद्धति पहले से भी मौजूद थी. इसके तहत पहले दिन का चांद देखने से महीने की शुरुआत होती है और फिर 29 या 30 दिन बाद दूसरे महीने की शुरुआत होती है.

अगर 29 को नया चांद दिख गया तो महीने की शुरुआत उसी दिन से हो जाएगी, अगर चांद नहीं दिखा तो 30 दिन पूरे करके नए महीने की शुरुआत होगी. इसलिए इसे रूयत-ए-हिलाल (चांद दिखने के हिसाब से) से तय होने वाला कैलेंडर कहा जाता है. 

इस्लाम में चंद्र कैलेंडर की मान्यता क्यों? 

पवित्र कुरान में एक महीने में दिन की संख्या क्या होगी और एक साल में महीनों की संख्या क्या होगी, इसको लेकर पूरा जिक्र है. इसके साथ ही मुसलमानों के पर्व रमजान, हज, ईद और आशूरा जैसे पवित्र समय भी इसी कैलेंडर के मुताबिक तय किए जाते हैं.

इस्लामी कैलेंडर में महीनों की संख्या 12 रखी गई है और साफ आदेश दिया गया है कि इसमें कोई कमीबेशी नहीं करे. 

इस्लामी कैलेंडर में 12 महीनों के नाम 

इस्लामी कैलेंडर में चार महीनों को पवित्र महीने करार दिए गए हैं और इस दौरान जंग से मनाही की गई है.

मुहर्रम: चार पवित्र महीनों में से एक; आशूरा के दिन के लिए जाना जाता है. इस दिन को मुहर्रम मनाया जाता है. 

सफर: सांस्कृतिक अंधविश्वासों के कारण अक्सर गलत समझा जाने वाला एक महीना, लेकिन इस्लाम में इसका कोई नकारात्मक महत्व नहीं है.

रबी अल: अव्वल पैगंबर मुहम्मद ﷺ का जन्म इसी महीने में हुआ. उनकी वफात भी इसी महीने में हुई. 

रबी अल-सानी: पिछले महीने का विस्तार; अक्सर चिंतन और सीखने के लिए उपयोग किया जाता है.

जुमादा अल-अव्वल : ऐतिहासिक रूप से शुष्क मौसम से जुड़ा हुआ.

जुमादा अल-सानी: पिछले महीने की तरह, मौसम के मिजाज़ के कारण इस्लाम-पूर्व अरब में इसका नाम रखा गया था.

रजब: एक और पवित्र महीना; बढ़ी हुई भक्ति का समय.

शाबान: रमजान से पहले का महीना; स्वैच्छिक उपवास और आध्यात्मिक तैयारी के लिए जाना जाता है.

रमजान: उपवास, कुरआन के अवतरण और अपार दया का महीना.

शव्वाल ईद-उल: फित्र से शुरू होता है; रमजान के बाद खुशी का समय.

ज़ुल-कादा: एक पवित्र महीना और युद्धविराम के महीनों में से एक.

ज़ुल-हिज्जाछ हज और ईद-उल-अजहा का महीना; साल के सबसे आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण दिन यहीं पड़ते हैं. इसी महीने में हज किया जाता है.

पवित्र महीने- मुहर्रम, रजब, ज़ुल-कादा, और ज़ुल-हिज्जा- कुरआन में वर्णित हैं और विशेष दर्जा रखते हैं. इन महीनों के दौरान, इस्लाम-पूर्व युग में युद्ध निषिद्ध था, और इस्लाम ने समय और स्थान की पवित्रता को बनाए रखने के लिए इस परंपरा को कायम रखा.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

बिहार के पूर्वी चम्पारण जिले की रहने वाली निशात अंजुम लंगट सिंह कॉलेज मुजफ्फरपुर से बैचलर ऑफ मास कम्यूनिकेशन कर रही हैं. निशात बतौर इंटर्न एबीपी न्यूज़ के डिजिटल विंग में काम कर रही है और फीचर सेक्शन की जिम्मेदारी संभाल रही हैं.

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