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Narak Chaturdashi 2024: नरक चतुर्दशी पर क्यों मनाते हैं कौमुदी उत्सव, इसका महत्व और पूजन विधि जान लें

Narak Chaturdashi 2024: नरक चतुर्दशी 30 अक्टूबर 2024 को है. इस दिन विधिवत श्रीकृष्ण, लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है. इस दिन कौमुदी उत्सव भी मनाया जाता है. नरक चतुर्दशी की संपूर्ण पूजा विधि यहां देखें.

Narak Chaturdashi 2024: नरक चतुर्दशी, जो दिवाली के लक्ष्मी पूजन से एक दिन पहले मनाई जाती है. इसका उल्लेख भविष्य पुराण के उत्तरपर्व अध्याय 140 में मिलता है. इसमें भगवान श्रीकृष्ण, महाराज युधिष्ठिर को बताते हैं कि भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर दानव राजा बलि को हराया और इन्द्र को उनका राज्य वापस दिलाया.

इसके बाद, राजा बलि को पाताल लोक में स्थापित किया गया और भगवान विष्णु ने बलि के साथ रहने का वचन दिया. कार्तिक अमावस्या की रात को पृथ्वी पर दैत्यों की गतिविधियाँ बढ़ जाती हैं.

युधिष्ठिर ने पूछा- भगवन! कौमुदी तिथि की विधि को विशेष–रूप से बताने की कृपा करें. उस दिन किस वस्तु का दान किया जाता है. किस देवता की पूजा की जाती है तथा कौन-सी क्रीडा करनी चाहिये.

भगवान श्रीकृष्ण बोले— राजन् ! कार्तिक मास के कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी को प्रभात के समय नरक के भय को दूर करने के लिये स्नान अवश्य करना चाहिये. अपामार्ग (चिचड़ा) के पत्र सिरके ऊपर मन्त्र पढ़ते हुए घुमाये. मन्त्र इस प्रकार है : –

हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाणं पुनः पुनः ।आपदं किल्बिषं चापि ममापहर सर्वशः । अपामार्ग नमस्तेऽस्तु शरीरं मम शोधय ॥ (भविष्य पुराण उत्तरपर्व 140.9)

इसके बाद धर्मराज (यमराज) के नामों- यम, धर्मराज, मृत्यु, वैवस्वत, अन्तक, काल तथा सर्वभूतक्षय का उच्चारण कर तर्पण करे. देवताओं की पूजा करने के बाद नरक से बचने के उद्देश्य से दीप जलाये. प्रदोष के समय शिव, विष्णु, ब्रह्मा आदि के मन्दिरों में, कोष्ठागार, चैत्य, सभामण्डप, आदि स्थानों में दीप प्रज्वलित करने चाहिये.

नरक चतुर्दशी पूजा विधि (Narak Chaturdashi Puja Vidhi)

  • अमावास्या के दिन प्रातःकाल स्नानकर देवता और पितरों का भक्तिपूर्वक पूजन तर्पण करें.
  • ब्राह्मण को भोजन करा कर दक्षिणा प्रदान करें. दोपहर में राजा द्वारा अपने राज्य में यह घोषित करना चाहिये कि आज इस लोकव में बलि का शासन है.
  • नगर के सभी लोगों को अपनी सामर्थ्यके अनुसार अपने घरको स्वच्छ-साफ-सुथरा करके नाना प्रकार के रंग-बिरंगे तोरण-पताकाओं, पुष्पमालाओं तथा बंदन वारों से सजाना चाहिये.
  • सवेरे उबटन लगाकर स्नान पूजा करें, नए वस्त्र पहने. शाम को दीप प्रज्वलित करें. प्रदोष के समय राक्षस लोक में विचरण करते हैं.
  • उनके भय को दूर करने के लिये कन्याओं को वृक्षों पर ताण्डुल (धान का लावा) फेंकते हुए दीपकों से नीराजन करना चाहिये.
  • दीपमालाओं के जलाने से प्रदोष वेला दोषरहित हो जाती है और राक्षसादिका भय दूर हो जाता है.
  • आधी रात बीत जाने पर जब सब लोग निद्रामें हों, उस समय घर की स्त्रियों को चाहिये कि वे सूप बजाते हुए घर भर में घूमती हुई आँगन तक आयें और इस प्रकार वे दरिद्रा-अलक्ष्मी को अपने घर से निस्सारण करें.
  • प्रातःकाल होते ही  वस्त्र, आभूषण आदि देकर सत्पुरुषों को संतुष्ट करें और भोजन, ताम्बूल देकर मधुर वचनों से पण्डितों का सत्कार करे.
  • अनेक प्रकार के मल्लक्रीडा आदि का आयोजन करें.  मध्याह्न के अनन्तर नगर के पूर्व दिशा में ऊंचे स्तंभ अथवा वृक्षों पर कुश की बनी मार्गपाली बाँधकर उसकी पूजा करे फिर हवन करे.
  • मार्गपाली की आरती करनी चाहिये यह आरती विजय प्रदान करती है. उसके बाद सभी लोगों को उस मार्गपालीके नीचे से निकलना चाहिये.
  • मार्गपाली को बांधनेवाला अपने दोनों कुलों का उद्धार करता है. राजा बलिकी मूर्ति की स्थापना करे और कमल, कुमुद, कहार, रक्त कमल आदि पुष्पों तथा गन्ध, दीप, नैवेद्य, अक्षत और दीपकों तथा अनेक उपहारों से राजा बलि की पूजा करें.

इस प्रकार प्रार्थना करें- बलिराज नमस्तुभ्यं विरोचनसुत प्रभो। भविष्येन्द्रसुराराते पूजेयं प्रतिगृह्यताम् ॥ (भविष्या पुराण उत्तरपर्व 140.54)

इस प्रकार पूजन कर रात्रि को जागरणपूर्वक महोत्सव करना चाहिये. नगर के लोग अपने घर में शय्या में श्वेत तण्डुल बांधकर राजा बलि को उसमें स्थापित कर फल - पुष्पादि से पूजन करें और बलि के उद्देश्य से दान करें, क्योंकि राजा, बलि के लिये जो व्यक्ति दान देता है, उसका दिया हुआ दान अक्षय हो जाता है.

कौमुदी उत्सव (Kaumudi Utsav)

भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर बलि से पृथ्वी को प्राप्त किया और यह कार्ति की अमावास्या तिथि राजा बलि को प्रदान की, उसी दिन से यह कौमुदी का उत्सव प्रवृत्त हुआ है. 'कु' यह बाद पृथ्वी का वाचक शब्द है और 'मुदी' का अर्थ  होता है प्रसन्नता. इसलिये पृथ्वी पर सबको हर्ष देने के कारण इसका नाम कौमुदी पड़ा.

वर्षभर में एक दिन बलि का उत्सव होता है,  राज्य में रोग, शत्रु, महामारी और दुर्भिक्ष का भय नहीं होता. सुभिक्ष, आरोग्य और सम्पत्तिकी वृद्धि होती है. इस कौमुदी तिथिको जो व्यक्ति जिस भाव में रहता है, उसे वर्षभर उसी भाव की प्राप्ति होती है,  इसलिये इस तिथिको हृष्ट और प्रसन्न रहना चाहिये.

यह तिथि वैष्णवी भी है, दानवी भी है और पैत्रिकी भी है.दीपमाला के दिन जो व्यक्ति भक्तिसे राजा बलिका पूजन-अर्चन करता है, वह वर्षभर आनन्दपूर्वक सुखसे व्यतीत करता है और उसके सारे मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं.

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नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

मुंबई के रहने वाले अंशुल पांडेय धार्मिक और अध्यात्मिक विषयों के जानकार हैं. 'द ऑथेंटिक कॉंसेप्ट ऑफ शिवा' के लेखक अंशुल के सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म और समाचार पत्रों में लिखते रहते हैं. सनातन धर्म पर इनका विशेष अध्ययन है. पौराणिक ग्रंथ, वेद, शास्त्रों में इनकी विशेष रूचि है, अपने लेखन के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का कार्य कर रहें.
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