Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि की 9 रातों का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व, क्यों कहते हैं इसे नव-रात्रि
Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से शुरू हो रही है. नवरात्रि की 9 रातों को नव-रात्रि क्यों कहते हैं, इन 9 रातों का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व जान लें.

Chaitra Navratri 2026: भारत में नवरात्रि को पर्व के रूप में मनाया जाता है. सबसे ज्यादा लोकप्रिय शारदीय नवरात्रि है, जोकि वर्तमान समय में पूरे देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है. शायद ही किसी को पता हो कि एक वर्ष में 4 नवरात्रि होते हैं. प्रत्येक नवरात्रि के अलग-अलग महत्व होते हैं. देवी पुराण में ऐसा कहा गया है कि साल भर में मुख्य रुप से नवरात्र का त्योहार 2 बार आता है.
नवरात्रि को नव-दिन नहीं नव-रात्रि क्यों कहते हैं
नवरात्र शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- नव और रात्र. नव का अर्थ है नौ और रात्र शब्द में पुनः दो शब्द निहित हैं: रा+त्रि. रा का अर्थ है रात और त्रि का अर्थ है जीवन के तीन पहलू- शरीर, मन और आत्मा. इंसान को तीन तरह की समस्याएं घेर सकती हैं-
भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक. इन समस्याओं से जो छुटकारा दिलाती है वह रात्रि है. रात्रि या रात आपको दुख से मुक्ति दिलाकर आपके जीवन में सुख लाती है. इंसान कैसी भी परिस्थिति में हो, रात में सबको आराम मिलता है. रात की गोद में सब अपने सुख-दुख किनारे रखकर सो जाते हैं
साल में दो बार नवरात्र रखने का विधान है. चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नौ दिन अर्थात नवमी तक, ओर इसी प्रकार ठीक छह महीने बाद आश्चिन मास, शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक माता की साधना और सिद्धि प्रारम्भ होती है. दोनों नवरात्रों में शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्व दिया जाता है.
नवरात्रि में यज्ञ करने का महत्व
- नवरात्र के नौ दिनों में यज्ञ और हवन का सिलसिला चलता रहता है. ये यज्ञ संसार में दुख और दर्द के हर तरह के प्रभाव को दूर कर देते हैं.
- नवरात्रि के हर दिन का अपना महत्व और प्रभाव है और उस दिन के अनुरूप ही यज्ञ और हवन किए जाते हैं. जीवन में हमें बुरे और अच्छे दोनों तरह के गुण प्रभावित करते हैं.
- नवरात्र हमें यह सिखाते हैं कि किस तरह इंसान अपने अंदर की मूलभूत अच्छाइयों से नकारात्मकता पर विजय प्राप्त कर सकता है और स्वयम् के अलौकिक स्वरूप से साक्षात्कार कर सकता है. जिस तरह मां के गर्भ में नौ महीने पलने के बाद ही एक जीव का निर्माण होता है ठीक वैसे ही ये नौ दिन हमें अपने मूल रूप, अपनी जड़ों तक वापस ले जाने में अहम भूमिका अदा करते हैं. इन नौ दिनों का ध्यान, सत्संग, शांति और ज्ञान प्राप्ति के लिए उपयोग करना चाहिए.
वसंत और शारदीय नवरात्रि
हिन्दू पंचाग के अनुसार चैत्र यानि मार्च-अप्रैल में मां दुर्गा के पहले नवरात्र पर 9 दिन आराधना जाती है, जिन्हें वासंतीय नवरात्र कहा जाता है. अश्विन मास यानि सितम्बर-अक्टूबर में आने वाले नवरात्र को मुख्य नवरात्र कहा जाता है, जिसे जनमानस शारदीय नवरात्र के नाम से जानता है. शारदीय नवरात्र के बाद से ही देश भर में त्योहारों की धूम मच जाती है. शारदीय नवरात्र के समापन पर ही दशहरे का त्योहार मनाया जाता है जो कि अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है. इसके अलावा एक वर्ष के भीतर 2 गुप्त नवरात्रि भी मनाई जाती है जो गृहस्थों के लिए नहीं होती है. यह दोनों नवरात्रि आषाढ़ यानि जून-जुलाई और दूसरा माघ यानि जनवरी-फरवरी में आते हैं.
चैत्र मास की शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 6:52 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 20 मार्च की सुबह 4:52 मिनट पर होगा. इसलिए इस वर्ष चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च को घटस्थापना के साथ होगी. उदया तिथि के अनुसार इस साल चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से शुरू होगी और इसका समापन 27 मार्च को होगा.
चैत्र नवरात्रि प्रतिपदा तिथि से ही नया हिंदू वर्ष प्रारंभ हो जाता है. शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा की आराधना के लिए नवरात्रा सर्वोत्तम समय माना जाता है. इन नौ दिनों में बाकी सारे क्रियाकलापों से ऊपर समारोह और व्रत को प्राथमिकता दी जाती है. हर शाम को डांडिया और गरबा जैसे धार्मिक नृत्य के जरिए मां दुर्गा की पूजा की जाती है. नौ रातों का यह उत्सव आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रथमा तिथि को आरंभ होता है. इस दौरान नौ ग्रहों की प्रतिष्ठा की जाती है.
इस दौरान 700 श्लोकों वाली दुर्गा शप्तशती जिसे देवी महात्म्य के नाम से भी जाना जाता है, का पाठ किया जाता है साथ ही दुर्गा चालीसा और देवी को समर्पित विभिन्न मंत्रों एवं श्लोकों के जरिए उन देवियों की आराधना की जाती है जिन्होंने दुष्टों का संहार किया.
नवरात्रि के आठवें दिन यज्ञ किया जाता है. महानवमीः इस रंगबिरंगे, ऊर्जा से भरपूर पर्व का समापन महानवमी को होता है. इस दिन कन्या पूजा की जाती है. नौ कुंवारी कन्याओं को भोजन कराया जाता है. इन नौ कन्याओं की पूजा मां के नौ रूप मानकर की जाती है. नव का शाब्दिक अर्थ नौ है और इसे नव अर्थात नया भी कहा जाता है.
इन दिनों में नौ दिनों के उपवास का विधान है. दरअसल, इस दौरान उपवासक संतुलित और सात्विक भोजन कर अपना ध्यान चिंतन और मनन में लगकर स्वयं को भीतर से शक्तिशाली बनाता है.
इससे न वह उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त करता है बल्कि वह मौसम के बदलाव को सहने के लिए आंतरिक रूप से खुद को मजूबत भी करता है. नवरात्रों में माता के नौ रुपों की आराधना की जाती है. माता के इन नौ रुपों को हम देवी के विभिन्न रूपों की उपासना, उनके तीर्थो के माध्यम से समझ सकते है.
इस दौरान घर-घर में भजन-कीर्तन आदि का आयोजन होता है. शारदीय नवरात्रि को पूर्वी भारत में दुर्गापूजा और पश्चिमी भारत में डांडिया के रूप में मनाया जाता है.
नवरात्रि की 9 रातों का महत्व
नवरात्र शब्द से 'नव अहोरात्रों (विशेष रात्रियां) का बोध' होता है. इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है क्योंकि 'रात्रि' शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है. भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है. यही कारण है कि दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है. यदि, रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता. जैसे- नवदिन या शिवदिन. लेकिन हम ऐसा नहीं कहते.
नवरात्रों में शक्ति के 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है और जो उपासक इन शक्ति पीठों पर नहीं पहुंच पाते वे अपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं. हालांकि आजकल अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं बल्कि पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं.
यहां तक कि सामान्य भक्त ही नहीं अपितु, पंडित और साधु-महात्मा भी अब नवरात्रों में पूरी रात जागना नहीं चाहते और ना ही कोई आलस्य को त्यागना चाहता है. आज कल बहुत कम उपासक ही आलस्य को त्याग कर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं. जबकि मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया.
अब तो यह एक सर्वमान्य वैज्ञानिक तथ्य भी है कि रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं. हमारे ऋषि-मुनि आज से कितने ही हजारों-लाखों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे. आप अगर ध्यान दें तो पाएंगे कि अगर दिन में आवाज दी जाए, तो वह दूर तक नहीं जाती है, किंतु यदि रात्रि में आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है.
इसके पीछे दिन के कोलाहल के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं. रेडियो इस बात का जीता-जागता उदाहरण है. आपने खुद भी महसूस किया होगा कि कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है.
इसका वैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियो तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं ठीक उसी प्रकार मंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती है. इसीलिए ऋषि-मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है.
मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर-दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है. यही रात्रि का तर्कसंगत रहस्य है. जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपनी शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं, उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि, उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य होती है.
नवरात्र के पीछे का वैज्ञानिक आधार यह है कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियां हैं जिनमें से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं. इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है.
ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियां बढ़ती हैं. अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तन-मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र' है. नवरात्र में नौ दिन या नौ रात को गिना जाना चाहिए? अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है. चूंकि यहां रात गिनते हैं इसलिए इसे नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है.
इंद्रियों पर काबू पाने का श्रेष्ठ समय
रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है और, इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है. इन मुख्य इन्द्रियों में अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है. इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन, नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं.
हालांकि शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुद्धि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर 6 माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है जिसमें सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुद्धि, साफ-सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुद्ध होता है, क्योंकि स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है.
नव का अर्थ है नौ और रात्र शब्द में पुनः दो शब्द निहित हैं: रा+त्रि. रा का अर्थ है रात और त्रि का अर्थ है जीवन के तीन पहलू- शरीर, मन और आत्मा. इंसान को तीन तरह की समस्याएं घेर सकती हैं- भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक. इन समस्याओं से जो छुटकारा दिलाती है वह रात्रि है. रात्रि या रात आपको दुख से मुक्ति दिलाकर आपके जीवन में सुख लाती है. इंसान कैसी भी परिस्थिति में हो, रात में सबको आराम मिलता है. रात की गोद में सब अपने सुख-दुख किनारे रखकर सो जाते हैं.
नवरात्र के नौ दिनों में यज्ञ और हवन का सिलसिला चलता रहता है. ये यज्ञ संसार में दुख और दर्द के हर तरह के प्रभाव को दूर कर देते हैं. नवरात्रि के हर दिन का अपना महत्व और प्रभाव है और उस दिन के अनुरूप ही यज्ञ और हवन किए जाते हैं. जीवन में हमें बुरे और अच्छे दोनों तरह के गुण प्रभावित करते हैं.
नवरात्र हमें यह सिखाते हैं कि किस तरह इंसान अपने अंदर की मूलभूत अच्छाइयों से नकारात्मकता पर विजय प्राप्त कर सकता है और स्वयम् के अलौकिक स्वरूप से साक्षात्कार कर सकता है. जिस तरह मां के गर्भ में नौ महीने पलने के बाद ही एक जीव का निर्माण होता है ठीक वैसे ही ये नौ दिन हमें अपने मूल रूप, अपनी जड़ों तक वापस ले जाने में अहम भूमिका अदा करते हैं. इन नौ दिनों का ध्यान, सत्संग, शांति और ज्ञान प्राप्ति के लिए उपयोग करना चाहिए.
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Source: IOCL


























