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क्या आपके अंदर भी हैं ये 5 आदतें? फिर अपने बच्चे के लिए टॉक्सिक पैरेंट्स बन चुके हैं आप

बच्चों की अपब्रिंगिंग करना कोई आसान काम नहीं है. इसके लिए पैरेंट्स कई तरीके अपनाते हैं. ऐसे में कई बार पैरेंट्स की कुछ आदतें उनकी पेरेंटिंग को टॉक्सिसिटी में बदल देती हैं.

माता-पिता का हमारे जीवन में काफी इंपॉर्टेंट रोल होता है. एक बच्चे के लिए उसके पैरेंट्स ही उसका परिवार और उसके फर्स्ट टीचर्स होते हैं. हर बच्चे का सेफ स्पेस उसके पैरेंट्स ही होते हैं. लेकिन कई बार यही पैरेंट्स जब बच्चे के प्रति ओवर केरिंग, रिस्ट्रिक्टिव और ओवर प्रोटेक्टिव हो जाते हैं तो इससे बच्चे को परेशानी होने लगती है.

दरअसल, पैरेंट्स सोचते हैं कि वह अपने बच्चे को डिसिप्लिन में रख रहे हैं. लेकिन ये स्ट्रिक्ट पेरेंटिंग कब टॉक्सिसिटी में बदल जाती है, इसका उन्हें पता नहीं चलता. ऐसे में आइए जानते हैं कि किन आदतों को देखकर पहचान सकते हैं कि कहीं आप भी तो टॉक्सिक पैरेंट्स नहीं हैं. 

जरूरत से ज्यादा ओबीडिएंसी 

कई बार पैरेंट्स अपने बच्चों से कुछ ज्यादा ही एक्सपेक्ट करने लगते हैं और चाहते हैं कि बच्चे बिना कोई सवाल किए उनकी सारी बातें मानें. ऐसे में बच्चों के मन की एक्साइटमेंट और सवाल पूछने की इच्छा इतनी बढ़ जाती है कि वह इसके लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाते हैं. साथ ही, ऐसे घरों में डिस्कशन का स्कोप खत्म हो जाता है. कई केसेज में इसका उल्टा भी होता है, जहां बच्चे बात करना ही बंद कर देते हैं क्योंकि वह पैरेंट्स से डरने लगते हैं.

जब हर चीज में परफेक्शन मांगी जाए 

हर पैरेंट्स अपने बच्चों को तरक्की करता देखना चाहते हैं. लेकिन जब पैरेंट्स अपने बच्चों के लिए सक्सेस का एक लेवल सेट कर देते हैं, जिसे उन्हें क्रॉस करना ही होता है तो कंडीशन खराब हो जाती है. इससे बच्चा सिर्फ प्रेशर फील करता है और एंग्जाइटी के साथ जीने लगता है. इस तरह की पेरेंटिंग जल्द ही  टॉक्सिसिटी में कन्वर्ट हो जाती है.

जब केयर के नाम पर कंट्रोल किया जाए

स्ट्रिक्ट पैरेंट्स अक्सर अपने बच्चों पर पाबंदियां लगाते हैं, जैसे यहां नहीं जाना, वहां नहीं जाना. इससे बच्चे का कुछ भी पर्सनल नहीं रहता और उसके करियर से लेकर लाइफ पार्टनर तक हर चीज पैरेंट्स ही डिसाइड करने लगते हैं. ऐसे में ये बेहद टॉक्सिक सिचुएशन होती है और बच्चा कभी भी इंडिपेंडेंट नहीं बनता और पूरी जिंदगी डरकर की गुजार देता है.

जब इमोशंस को वीकनेस समझा जाए 

कुछ स्ट्रिक्ट पैरेंट्स अपने बच्चों को अपने इमोशंस जैसे दर्द, उदासी और कमजोरियों को दबाकर रखने पर मजबूर करते हैं ताकि कोई उनका फायदा न उठा सकें. लेकिन ऐसा करना बिल्कुल गलत होता है और ये टॉक्सिसिटी की निशानी होती है. 

जब प्यार एक शर्त बन जाए

कई घरों में पैरेंट्स अपने बच्चों को डिसिप्लिन और अचीवमेंट्स लाने पर ही प्यार करते हैं. यहां बच्चों को तारीफ और शाबाशी न के बराबर मिलती है. बच्चों को लगने लगता है कि प्यार सिर्फ अच्छे मार्क्स लाकर या मेडल-ट्रॉफीज लाने पर ही मिलता है. ऐसे में इस तरह की पेरेंटिंग बच्चे और पैरेंट्स दोनों के लिए खतरनाक होती है और उनके बीच का रिलेशन खराब कर देती है.

इसे भी पढे़ं: लो ब्लड प्रेशर से हो सकता है कार का एक्सिडेंट! इस स्टडी में मिला इस प्रॉब्लम का समाधान

आंखों में सपने लिए, घर से हम चल तो दिए, जानें ये राहें अब ले जाएंगी कहां... कहने को तो ये सिंगर शान के गाने तन्हा दिल की शुरुआती लाइनें हैं, लेकिन दीपाली की जिंदगी पर बखूबी लागू होती हैं. पूरा नाम दीपाली बिष्ट, जो पहाड़ की खूबसूरत दुनिया से ताल्लुक रखती हैं. किसी जमाने में दीपाली के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ कंधे पर झोला टांगकर और हाथों में अखबार लेकर घूमने वाले लोग होते थे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी आंखों में इसी दुनिया का सितारा बनने के सपने पनपने लगे और वह भी पत्रकारिता की दुनिया में आ गईं. उन्होंने अपने इस सफर का पहला पड़ाव एबीपी न्यूज में डाला है, जहां वह ब्रेकिंग, जीके और यूटिलिटी के अलावा लाइफस्टाइल की खबरों से रोजाना रूबरू होती हैं. 

दिल्ली में स्कूलिंग करने वाली दीपाली ने 12वीं खत्म करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन लिया और सत्यवती कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस ऑनर्स में ग्रैजुएशन किया. ग्रैजुएशन के दौरान वह विश्वविद्यालय की डिबेटिंग सोसायटी का हिस्सा बनीं और अपनी काबिलियत दिखाते हुए कई डिबेट कॉम्पिटिशन में जीत हासिल की. 

साल 2024 में दीपाली की जिंदगी में नया मोड़ तब आया, जब उन्होंने गुलशन कुमार फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (नोएडा) से टीवी जर्नलिज्म में पोस्टग्रेजुएट डिप्लोमा की डिग्री हासिल की. उस दौरान उन्होंने रिपोर्टिंग, एडिटिंग, कंटेंट राइटिंग, रिसर्च और एंकरिंग की बारीकियां सीखीं. कॉलेज खत्म करने के बाद वह एबीपी नेटवर्क में बतौर कॉपीराइटर इंटर्न पत्रकारिता की दुनिया को करीब से समझ रही हैं. 

घर-परिवार और जॉब की तेज रफ्तार जिंदगी में अपने लिए सुकून के पल ढूंढना दीपाली को बेहद पसंद है. इन पलों में वह पोएट्री लिखकर, उपन्यास पढ़कर और पुराने गाने सुनकर जिंदगी की रूमानियत को महसूस करती हैं. इसके अलावा अपनी मां के साथ मिलकर कोरियन सीरीज देखना उनका शगल है. मस्ती करने में माहिर दीपाली को घुमक्कड़ी का भी शौक है और वह आपको दिल्ली के रंग-बिरंगे बाजारों में शॉपिंग करती नजर आ सकती हैं.

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