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सूर्यग्रहण में बाहर निकलने से क्या प्रेग्नेंट का हो जाता है अबॉर्शन? डॉक्टर्स से समझिए कितनी सच है यह बात

दुनियाभर में तमाम ऐसी धार्मिक मान्यताएं देखने और सुनने को मिलती हैं, जिनका साइंस और वास्तविकता से दूर-दूर तक का कोई नाता नहीं होता है. आपको ऐसी ही एक मान्यता के बारे में बताते हैं.

भारत एक ऐसा देश है जहां धार्मिक मान्यताओं की जड़ें काफी गहरी हैं. घर बनवाने से लेकर गृह प्रवेश तक, बच्चे पैदा होने से लेकर उसके नामकरण तक, हमारे रोजमर्रा के जीवन में धार्मिक जुड़ाव देखने को मिलता है. इनमें से कुछ मान्यताएं ऐसी हैं, जिनको धर्म को साइंस दोनों में सामान्य मान्यता दी गई है.  ऐसी ही एक धार्मिक मान्यता प्रेग्नेंट महिलाओं को लेकर है, जिनके बारे में कहा जाता है कि अगर वे सूर्य ग्रहण में बाहर निकलती हैं तो अबॉर्शन या बच्चे में दोष होने का खतरा बना रहता है. चलिए, आपको बताते हैं कि मेडिकल साइंस इस धार्मिक विश्वास पर क्या कहता है, इस बात में कितनी सच्चाई है. 

पहले जान लीजिए धार्मिक मान्यता 

भारतीय धार्मिक ग्रंथों में ग्रहण को राहू-केतु का ग्रास कहा गया है. यानी सूर्य या चंद्रमा को राहू, केतु ग्रसित कर लेते हैं तो ग्रहण लगता है. इसमें सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण दोनों शामिल है. इस समय को नुकसानदायक बताया जाता है और इस काल में कई कार्यों से परहेज बरतने की सलाह दी जाती है जैसे खाना न खाना, बाहर न निकलना और ग्रहण खत्म होते ही नहाना आदि. इनके अलावा एक सबसे जरूरी चीज, जिसकी सलाह भारतीय सभ्यता समेत दुनिया के हर प्राचीन सभ्यताओं में मिलता है, वह है ग्रहण की छाया गर्भ में पल रहे बच्चे पर नहीं पड़नी चाहिए. मैक्सिकन मान्यताओं के अनुसार, अगर कोई प्रेग्रेंट महिला ग्रहण को देखती है तो भ्रूण के चेहरे को काट लिया जाता है. यानी उसका बच्चा जन्म से ही विकृत चेहरा लेकर पैदा होता है. ये सारी बातें अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं में अलग-अलग तरीके से देखने को मिलती हैं. 

क्या कहते हैं डॉक्टर?

सर गंगाराम अस्पताल में वरिष्ठ गायनेकोलॉजिस्ट और असोसिएट कंसल्टेंट डॉ. साक्षी नायर ने मीडिया से बातचीत के दौरान इस पर अपनी राय रखी. उन्होंने कहा था कि अगर साइंस के हिसाब से देखा जाए तो ग्रहण का महिलाओं  के ऊपर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है. चाहे किसी तरह का भी ग्रहण हो, उसका प्रभाव महिलाओं में पड़ता है, यह सिर्फ एक मिथक है और इससे ज्यादा कुछ नहीं है. साइंस में यह स्पष्ट कहा गया है कि इससे महिलाओं को किसी तरह का कुछ भी नुकसान नहीं होता है. इस तरह की बातें सिर्फ अफवाह हैं और झूठ का पुलिंदा है. ऐसे नहीं होता है कि कोई प्रेग्रेंट महिला ग्रहण के समय बाहर निकल जाए तो उसका प्रभाव बच्चे पर पड़ेगा. हालांकि, उन्होंने इस बात का जरूर जिक्र किया कि ग्रहण के दौरान जो परेशानी आम लोगों को होती है, वह प्रेग्रेंट महिला को भी हो सकती है. हालांकि, उस पर या उसके बच्चे पर कोई प्रभाव नहीं होता है. 

इसे भी पढ़ें- मॉनसून में टूटने लगे हैं बाल तो क्या गंजा होना है सटीक इलाज, क्या कहते हैं हेयर एक्सपर्ट्स?

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें. 

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About the author सोनम

जर्नलिज्म की दुनिया में करीब 15 साल बिता चुकीं सोनम की अपनी अलग पहचान है. वह खुद ट्रैवल की शौकीन हैं और यही वजह है कि अपने पाठकों को नई-नई जगहों से रूबरू कराने का माद्दा रखती हैं. लाइफस्टाइल और हेल्थ जैसी बीट्स में उन्होंने अपनी लेखनी से न केवल रीडर्स का ध्यान खींचा है, बल्कि अपनी विश्वसनीय जगह भी कायम की है. उनकी लेखन शैली में गहराई, संवेदनशीलता और प्रामाणिकता का अनूठा कॉम्बिनेशन नजर आता है, जिससे रीडर्स को नई-नई जानकारी मिलती हैं. 

लखनऊ यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में ग्रैजुएशन रहने वाली सोनम ने अपने पत्रकारिता के सफर की शुरुआत भी नवाबों के इसी शहर से की. अमर उजाला में उन्होंने बतौर इंटर्न अपना करियर शुरू किया. इसके बाद दैनिक जागरण के आईनेक्स्ट में भी उन्होंने काफी वक्त तक काम किया. फिलहाल, वह एबीपी लाइव वेबसाइट में लाइफस्टाइल डेस्क पर बतौर कंटेंट राइटर काम कर रही हैं.

ट्रैवल उनका इंटरेस्ट  एरिया है, जिसके चलते वह न केवल लोकप्रिय टूरिस्ट प्लेसेज के अनछुए पहलुओं से रीडर्स को रूबरू कराती हैं, बल्कि ऑफबीट डेस्टिनेशन्स के बारे में भी जानकारी देती हैं. हेल्थ बीट पर उनके लेख वैज्ञानिक तथ्यों और सामान्य पाठकों की समझ के बीच बैलेंस बनाते हैं. सोशल मीडिया पर भी सोनम काफी एक्टिव रहती हैं और अपने आर्टिकल और ट्रैवल एक्सपीरियंस शेयर करती रहती हैं.

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