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Stroke Risk: जलवायु परिवर्तन से सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, अब मेंटल हेल्थ को भी खतरा

Stroke Risk: जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ पर्यावरण तक सीमित समस्या नहीं रहा, बल्कि यह हमारे स्वास्थ्य, खासकर दिमाग पर गंभीर असर डाल रहा है. आइए जानते हैं क्या कहते हैं स्ट्रोक...

Stroke Risk: जलवायु परिवर्तन से जुड़ी परेशानी अब बस पर्यावरण की समस्या जैसे ग्लेशियर के पिघलने या समुद्री जलस्तर के बढ़ने तक ही सीमित नहीं रह गया है. यह कहीं न कहीं हमारे स्वास्थ्य, खासकर दिमाग पर गहरा असर डाल रहा है. बढ़ती गर्मी से लेकर बदलते मौसम और प्रदूषण तक अब सीधे तौर पर स्ट्रोक जैसे गंभीर रोगों से जुड़ने लगे हैं. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अब स्ट्रोक का खतरा केवल खान-पान या लाइफस्टाइल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस हवा और तापमान से भी जुड़ा है जिसमें हम जी रहे हैं. साथ ही यह एक दुनिया भर में मृत्यु और विकलांगता के प्रमुख कारणों में से एक बनता जा रहा है. 

गर्मी और डिहाइड्रेशन से बढ़ता स्ट्रोक का खतरा

रिपोर्ट के अनुसार, अत्यधिक गर्मी स्ट्रोक के खतरे को काफी बढ़ा देती है. इंटरनेशनल जर्नल ऑफ स्ट्रोक में छपे वर्ल्ड स्ट्रोक ऑर्गनाइजेशन के एक नए वैज्ञानिक बयान में यह बताया गया है कि बाहर का मौसम अब हमारे दिमाग के अंदर होने वाली गतिविधियों को प्रभावित करना शुरू कर रहा है. इसका कारण है कि जब तापमान बहुत ज्यादा बढ़ता है तो शरीर से पानी तेजी से निकलने लगता है, जिससे डिहाइड्रेशन हो जाता है. इसी वजह से खून गाढ़ा हो जाता है और खून के थक्के बनने का खतरा बढ़ जाता है यानी खून गाढ़ा होकर जमने लगता है, जो इस्केमिक स्ट्रोक का कारण बन सकता है. इसके अलावा गर्मी दिल और ब्लड वेसल्स पर भी दबाव डालती है, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है. 

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अचानक बदलते मौसम का असर

अक्सर लोगों को लगता है कि ऐसा गर्मी का कारण हो रहा है लेकिन इस स्थिति में सिर्फ गर्मी ही नहीं, बल्कि मौसम मे अचानक बदलाव भी शरीर पर असर डालते हैं. तापमान, नमी और हवा के दबाव मे तेजी से बदलाव होने पर ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है, जो स्ट्रोक का मुख्य कारण बनता है. इस पर विशेषज्ञों का मानना है कि जब शरीर को बार-बार बदलते मौसम के अनुसार खुद को ढालना पड़ता है, तो यह दिल और दिमाग पर अतिरिक्त दबाव डालता है और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है. 

प्रदूषण और कंपाउंड वेदर का खतरा

इसके बाद ऐसी स्थितियां आती हैं जिन्हें विशेषज्ञ “संयुक्त घटनाएं” कहते हैं, यानी ऐसा मौसम जो एक साथ कई समस्याएं लेकर आता है. हम बात कर रहें है जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ वायु प्रदूषण का बढ़ना. ऐसे हालात में ये समस्याएं एक-दूसरे को और बढ़ा देती हैं, जिससे शरीर पर ज्यादा असर पड़ता है. जलवायु परिवर्तन के साथ बढ़ता वायु प्रदूषण भी स्ट्रोक के खतरे को बढ़ा देता है. गाड़ियों के धुएं, फैक्ट्रियों और जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाली घटनाएं जैसे जंगल की आग और धूल भरी आंधी से बहुत छोटे-छोटे कण हवा में फैल जाते हैं जो फेफड़ों के जरिए खून मे पहुंच जाते हैं और ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे ब्लॉकेज या फटने का खतरा बढ़ जाता है. दुनियाभर मे लगभग 20 प्रतिशत से ज्यादा स्ट्रोक के मामले प्रदूषण से जुड़े माने गए हैं.  इसके अलावा जब एक साथ कई मौसम की स्थितियां जैसे गर्मी और सूखा या ठंड और नमी आती हैं, तो यह खतरा और बढ़ जाता है. 

किन लोगों पर ज्यादा असर और क्या उपाय

रिपोर्ट के अनुसार बुजुर्ग, बाहर काम करने वाले लोग और जो लोग पहले से ही कमजोर या बीमार हैं, उनके लिए यह स्थिति खतरनाक और कभी-कभी जानलेवा साबित होती है. खासकर कम आय वाले देशों मे स्ट्रोक के लगभग 89 प्रतिशत मामले देखे जाते हैं, जहां जलवायु का असर भी ज्यादा होता है, और उनके पास इससे निपटने के लिए संसाधन भी कम होते हैं.  विशेषज्ञों का कहना है कि इस खतरे को कम करने के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाना, साफ ऊर्जा अपनाना और लोगों को जागरूक करना बहुत जरूरी है.  साथ ही हेल्थ सिस्टम को भी मौसम से जुड़े जोखिमों के लिए तैयार करना भी बहुत आवश्यकता है.

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