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Shoe Measurement: अब भारत में UK या US नहीं बल्कि इस कोड से तैयार होंगे जूते

भारतीयों के लिए खुशखबरी है. अब उन्हें फुटवियर चुनते समय अपने साइज से समझौता नहीं करना पड़ेगा क्योंकि अब भारतीयों के पैरों के मुताबिक जूते तैयार किए जाएंगे. आइये इसके बारे में जानते हैं विस्तार से.

भारतीय कंज्यूमर्स एक अरसे से फुटवियर्स से जुड़ी एक बड़ी समस्या से जूझ रहे थे. दरअसल भारत में मिलने वाले इंटरनेशनल ब्रांड्स के फुटवियर्स यूके/यूरोपीय और अमेरिकी साइज में ही आते थे. लेकिन शेप के मामले में भारतीयों का पैर उनसे अपेक्षाकृत चौड़े होते हैं. खासतौर पर बच्चों और किशोरों के मामले में ये परेशानी और ज्यादा है. क्योंकि हमारा ग्रोथ पैटर्न पश्चिमी देशों से अलग है. ऐसे में ज्यादा पैसा खर्च करने के बावजूद कंफर्टेबल फुटवियर नहीं मिल पाता था. ऐसे में अब भारतीयों के फुटवियर के लिए अपना खुद का साइज तय किया कर दिया गया है. इसे ‘भा’ (Bha) नाम दिया गया है. 

भा जैसी स्वदेशी आकार प्रणाली विकसित करने से यह सुनिश्चित होगा कि जूते भारतीय उपभोक्ताओं की ही आवश्यकताओं के अनुरूप हों, जो बेहतर आराम, पैरों के स्वास्थ्य और ओवरओल सेटिस्फेक्शन को बढ़ावा देंगे. इसके अतिरिक्त, यह मैन्युफैक्चरिंग सिस्टम को व्यवस्थित कर बर्बादी को कम करेगा. इससे ना सिर्फ प्रदूषण जैसी पर्यावरणीय समस्याएं घटेंगी बल्कि आत्मनिर्भरता और इनोवेशन के लिहाज से भारत के घरेलू फुटवियर इंडस्ट्री को आगे बढ़ने का मौका देगा. 

इसकी क्यों जरूरत पड़ी?

दिसंबर 2021 से मार्च 2022 के बीच एक सर्वे करवाया गया. यह सर्वे पांच भौगोलिक क्षेत्रों में 79 स्थानों पर आयोजित हुआ. सैंपल के लिए इसमें 1,01,880 व्यक्तियों को शामिल किया गया. रिसर्चर्स ने 3डी फुट स्कैनिंग मशीनों का उपयोग करके एक औसत भारतीय पैर के साइज, डायमेंशन और शेप को समझने की कोशिश की. शुरुआती धारणाओं के विपरीत, सर्वे से पता चला कि भारतीयों के पैर आमतौर पर यूरोपीय या अमेरिकियों की तुलना में चौड़े होते हैं. नतीजतन, मौजूदा आकार प्रणालियों के तहत उपलब्ध आगे से पतले जूते के कारण, कई भारतीय आवश्यकता से अधिक बड़े जूते पहन रहे हैं, जिससे असुविधा और संभावित स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो रही हैं.

विश्लेषण से यह भी पता चला कि भारतीय महिलाओं के पैर का आकार आम तौर पर लगभग 11 वर्ष की उम्र में अधिकतम होता है, जबकि पुरुषों के लिए, यह स्थिति 15 या 16 वर्ष की आयु में आती है. इसके अलावा देखा गया कि बड़ी संख्या में भारतीय, पुरुष और महिलाएं दोनों, खराब फिटिंग वाले और तंग जूते पहनने को मजबूर हैं. इसके परिणामस्वरूप अक्सर चोटें लगती थीं और पैरों का स्वास्थ्य खराब हो जाता था. खासकर बुजुर्ग महिलाओं और मधुमेह रोगियों को इस समस्या का अधिक सामना करना पड़ता है. 

इतिहास पर नजर डालें तो आजादी से पहले  अंग्रेजों ने भारत में यूके साइजिंग की शुरुआत की थी, जिसमें एक औसत भारतीय महिला 4 से 6 साइज के फुटवियर पहनती थी, और पुरुष 5 से 11 के बीच पहनते थे. लेकिन भारतीयों के पैरों की संरचना से जुड़े व्यापक डेटा की कमी ने स्वदेशी प्रणाली के पनपने में सहायता नहीं की और हमें असुविधाजनक फुटवियर पहनने पड़े.

भा क्या करेगी?

प्रस्तावित बीएचए (BHA) प्रणाली के तहत शिशुओं से लेकर वयस्कों तक आठ फुटवियर आकारों का सुझाव दिया गया है. जिसमें अधिकांश आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए कमर्शियल मैन्युफैक्चरिंग की शुरुआत में III से VIII आकार पर ध्यान केंद्रित करता है. भा को अपनाने से, कंज्यूमर और मैन्युफैक्चर्र दोनों को लाभ होगा. निर्माताओं को आधे आकार की आवश्यकता को समाप्त करने और उत्पादन प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए केवल आठ आकार विकसित करने की आवश्यकता होगी.

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