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Covid-19 कैसे मानसिक स्वास्थ्य के लिए बन गया है चुनौती, बाहर निकलने के तरीके जानिए यहां

नई रिसर्च के मुताबिक कोरोना महामारी ने उन लोगों के सामने भी चुनौती पेश की है जिन्होंने पहले कभी मानसिक समस्याओं का सामना नहीं किया.

कोविड-19 का मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ा है. अलगाव, नौकरी की असुरक्षा , कोविड-19 से संक्रमित होने का डर और महामारी ने संकट के समय हमारी कमजोरी को उजागर कर दिया है.

नए शोध के मुताबिक, महामारी ने उन लोगों के सामने भी चुनौती पेश की है जिन्होंने पहले कभी मानसिक समस्याओं का सामना नहीं किया. फ्रंटियर्स इन साइकियाट्री पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट कहती है कि कोविड-19 के कम मामले वाले देशों में भी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से लोगों को जूझना पड़ा.

1031 पुरुष और महिलाओं पर किए गए सर्वे के नतीजे से मालूम हुआ कि लोग दोगुने डिप्रेशन और चिंता से परेशान दिखे. आर्थिक दबाव, सख्त लॉकडाउन बंदिश और नौकरी की असुरक्षा इसके पीछे बुनियादी कारण बताए गए.

मानसिक स्वास्थ्य के लिए कोविड-19 नुकसानदेह 

शोध में बताया गया कि कोविड-19 के बड़ी लहर वाले मुल्कों में लोग जांच का नाम सुनकर दहल गए. ये पहली बार नहीं है जब हम अपने दिमाग पर संक्रमण के गहरे प्रभाव के बारे में सुन रहे हैं. जून में किए गए अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के शोध से पता चला कि 50 फीसद से ज्यादा युवा मानसिक बीमारियों के प्रति संवेदनशील थे. इसकी वजह लंबे समय तक लॉकडाउन रहा. और सत्तर वर्ष की उम्र वाले लोगों को ज्यादा तन्हाई का सामना करना पड़ा. यहां तक कि कोविड-19 से ठीक हो चुके लोगों को भी मानसिक बीमारी और मनोवैज्ञानिक समस्याओं के बढ़ने का खतरा दिखा.

लड़ाई से मुकाबला के लिए तत्काल उपाय की जरूरत

मानसिक बीमारी और मनोवैज्ञानिक समस्याओं से युवा भी अछूते नहीं रहे. लंबे समय तक स्कूल, सार्जनिक स्थल की बंदी ने भी उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित किया. ये सभी इस बात का संकेत है कि मानसिक स्वास्थ्य को हमें हल्के में नहीं लेना चाहिए बल्कि महामारी का एहसास दिलानेवाले कारणों के तौर पर समझना चाहिए. ज्यादा बड़ी महामारी में बदलने का इंतजार करने से पहले, सख्त उपाय अपनाए जाने की जरूरत है.

डूम सर्फिंग नया ट्रेंड है जो हमें बुरी तरह खौफजदा कर रहा है. बुरी खबर या सदमा की घटना भी हमारे तनाव बढ़ने का कारण हो सकता है. हम सभी जानते हैं कि निकट भविष्य में हालात नहीं बदलने जा रहे हैं. इसलिए बुरी खबरों के संपर्क को कम कर अपने दिमाग को संतुलित करना बेहतर रहेगा.

वायरस की तरह चिंता भी तेजी से फैल सकती है. इंसानों का इससे परेशान होना लाजिमी है. खास हालात में अपनी प्रतक्रिया को काबू करना ही सही उपाय हो सकता है. खुद को आसानी से सकारात्मक नहीं रखा जा सकता है. ये करने से ज्यादा कहना आसान होता है. कुछ समय के लिए हालात गंभीर रहेंगे. आपका कोई भी कदम व्यावहारिक होना चाहिए. अगर आपको गुस्सा या निराशा घर कर रहा है तो 15 मिनट समय अपने शेड्यूल में से खर्च करें. इससे हालात से निकलने में न सिर्फ आपकी मदद होगी बल्कि आप जुमीन से जुड़े भी रह सकते हैं.

अपने ख्याल को सत्यापित करें

बुरी खबर मिलने के बाद खास तरह की प्रतिक्रिया देना सामान्य बात है. नकारात्मक भावों से घिरे रहना खतरनाक हो सकता है. कैलोफोर्निया की एक यूनिवर्सिटी के शोध मुताबिक, बुरी खबर सुनने पर सांस लेने और प्रतिक्रिया देने के लिए 15 मिनट का समय दें. इससे भयानक खबर से लड़ने में मदद मिलेगी. घटना पर नाखून काटने के बजाए, आनेवाले सबसे बुरे प्रभाव के बारे में सोचें. याद रखिए वक्त चाहे कितना भी खराब हो, दुनिया खत्म होने नहीं जा रही है. आपको अपनी ताकत पर फोकस करना चाहिए और जहां तक हो सके पॉजिटिव रहने की कोशिश करें.

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