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डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता बन गई है आवश्यकता, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बयान के पीछे की समझें वजह

India Defence Sector: दुनिया में जिस तरह के राजनीतिक समीकरण बनते जा रहे हैं, भारत के लिए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बहुत जरूरी हो गई है. भारत के ऊपर अभी भी सबसे बड़ा रक्षा आयातक देश का टैग है.

Self Reliance in Defence Sector: भारत के लिए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता अब एक विकल्प नहीं है, बल्कि बदलते भू राजनीतिक संदर्भ और समीकरणों की वजह से भारत के लिए अब ये एक आवश्यकता है. देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इस बात को स्वीकार किया है.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 17 जून को लखनऊ में  'आत्मनिर्भर भारत' पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि भारत आज दोहरे खतरे का सामना कर रहा है. इसमें पहला खतरा ये है कि तेजी से बदलते विश्व में युद्धकला के नए-नए आयाम उभर रहे हैं. इसके साथ ही भारत को अपनी सीमाओं पर भी दोहरी चुनौतियां का भी सामना करना पड़ रहा है.

पाकिस्तान और चीन से दोहरी चुनौती

रक्षा मंत्री का स्पष्ट संकेत पाकिस्तान और चीन के साथ सीमा से जुड़ी चुनौतियों की ओर था. हालांकि राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूती से कदम बढ़ा रहा है. भारत चाहता है कि देश की सेना हथियारों और उपकरणों के लिए बाहरी मुल्क पर निर्भर न हो. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में केंद्र सरकार इस दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रही है और इसे सुनिश्चित करने में जुटी हुई है.

तेजी से बदल रहे हैं वैश्विक समीकरण

सबसे पहले तो इस बात को समझना होगा कि वे कौन से हालात हैं जिसकी वजह से अब रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता विकल्प की जगह आवश्यकता बन गई है. इसके लिए कई कारक जिम्मेदार हैं. पिछले कुछ सालों में वैश्विक राजनीति में काफी तेजी से बदलाव हुआ. चाहे इंडो-पैसिफिक रीजन हो या फिर अफ्रीका और अरब जगत में हो रही राजनीतिक उथल-पुथल. पिछले साल फरवरी से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध से भी दुनिया राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता से जूझ रही है. इस युद्ध से वैश्विक स्तर पर पावर ऑफ बैलेंस के तहत ध्रुवीकरण की कोशिशों को भी बल मिला है.

बाहरी मुल्कों पर कम हो निर्भरता

इन सबका प्रभाव किसी न किसी तरह से भारत के ऊपर भी पड़ता ही है. उसमें भी दो प्रमुख वजह है जिसको लेकर पिछले कुछ सालों में भारत के लिए ये ज्यादा जरूरी हो गया है कि वो अपनी रक्षा जरूरतों के लिए बाहरी मुल्कों पर निर्भरता को कम करें. इसमें पहली वजह है उत्तर पश्चिम में हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान राजनीतिक और आर्थिक बदहाली के दौर से गुजर रहा है. इसके साथ ही पिछले 3-4 साल से उत्तर-पूर्व में पड़ोसी देश चीन के साथ संबंध लगातार बिगड़ते जा रहे हैं.

चीन से भारत को कई तरह के खतरे

चीन हमारे साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तो उलझ ही रहा है. इसके साथ ही चीन इंडो-पैसिफिक रीजन में अपने सैन्य अड्डों के विस्तार में भी तेजी से जुटा हुआ है. चीन अरब सागर के तीन तरफ तीन नौसैनिक अड्डों को स्थापित करने में जुटा है. ग्वादर में नौसैनिक अड्डा बना रहा है. लाल सागर के मुहाने पर स्थित जिबूती में पहले से ही नौसैनिक अड्डा ऑपरेशनल है. इसके साथ ही चीन की नजर मॉरीशस पर भी टिकी हुई है.

इंडो-पैसिफिक रीजन में संतुलन जरूरी

इसके अलावा साउथ चाइना सी में भी चीन का सैन्य दखल लगातार बढ़ रहा है. पिछले साल नवंबर में अमेरिका के रक्षा विभाग की ओर जारी रिपोर्ट में कहा गया था कि चीन, कंबोडिया और दूसरे देशों में अपने नेवी, एयरफोर्स और आर्मी की सहायता के लिए ज्यादा से ज्यादा मिलिट्री लॉजिस्टिक सेंटर बनाने की योजना पर लगातार आगे बढ़ रहा है. अतीत से ही चीन का कंबोडिया के साथ काफी बेहतर संबंध रहा है. कंबोडिया की भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर चीन साउथ चाइना सी और गल्फ ऑफ थाईलैंड में अपना प्रभाव बढ़ना चाह रहा है. अमेरिका कहता भी रहा है कि गल्फ ऑफ थाईलैंड में मौजूद कंबोडिया के रियम नौसेना ठिकाना (Ream naval base) चीन के दूसरे विदेशी सैन्य अड्डे और इंडो-पैसिफिक रीजन में इसके पहले सैन्य अड्डे में बदला जा रहा है.

पहले से ही भारत के साथ सीमा विवाद को लेकर जारी तनातनी के बीच चीन का इंडो-पैसिफिक रीजन में इस तरह का आक्रामक और विस्तारवादी रुख भारत के नजरिए से सही नहीं कहा जा सकता है. चीन का पूरा जोर भारत के दोनों ओर अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में नियंत्रण बढ़ाने पर है. ऐसे में भारत के लिए सुरक्षा से जुड़ी चिंता बढ़ जाती है.

बदहाल पाकिस्तान भी भारत के पक्ष में नहीं

आजादी के बाद से ही पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते कैसे रहे हैं, ये हर कोई जानता है. लंबे वक्त से भारत को पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से  जूझना पड़ा है. पिछले 7 दशक से ये हमारे सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती रही है. हाल के दिनों में जिस तरह से पाकिस्तान राजनीतिक और आर्थिक दोनों ही मोर्चों पर बदहाली से जूझ रहा है, उससे भारत के लिए खतरा और भी बढ़ जाता है. पाकिस्तान में अभी जिस तरह का माहौल है, उससे आतंकवादियों को पनपने का मौका मिल सकता है, जो भारत के लिए किसी भी नजरिए से सही नहीं है. यानी भारतीय सुरक्षा बलों के सामने चीन के साथ ही पाकिस्तान सीमा पर भी होने वाली हर हलचल से निपटने के लिए हर वक्त तैयार रहने की चुनौती है. इसके लिए भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना ही होगा.

रूस-यूक्रेन युद्ध से भी बदले हालात

रूस-यूक्रेन युद्ध से भी भारत के लिए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की अहमियत और भी बढ़ गई है. भारत पिछले कई साल से दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बना हुआ है. पिछले कुछ सालों से रूस ही वो देश है, जिससे हम सबसे ज्यादा हथियार खरीदते हैं. हम अपने आधे से भी ज्यादा सैन्य उपकरण के लिए रूस पर निर्भर रहते हैं. यूक्रेन युद्ध की वजह से टैंक और अपने जंगी जहाज के बेड़े को मेंटेन करने के लिए जरूरी कल-पुर्जे रूस से मिलने में देरी हो रही है. रूस से एयर डिफेंस सिस्टम की डिलीवरी में भी देरी हो रही है.

हाल के कुछ वर्षों में हमारा चीन के साथ जितनी तेजी से संबंध  बिगड़े हैं, उतनी ही तेजी से चीन का रूस के साथ संबंध प्रगाढ़ हुए हैं. यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और चीन काफी करीब आ गए हैं. ऐसे में रूस के ऊपर रक्षा जरूरतों के लिए निर्भरता कम करना भारत के लिए सामरिक नजरिए से भी भविष्य में सबसे महत्वपूर्ण है. 

तकनीक से युद्ध के तरीकों में हो रहा है बदला

युद्ध के तरीके भी बदल रहे हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध में हमने देखा है कि अब आमने-सामने की लड़ाई की बजाय तकनीक आधारित हाईब्रिड वार का जमाना है. नए-नए तकनीकों से युद्धकला की प्रकृति में आमूलचूल बदलाव हो चुका है और भविष्य में जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का विकास होगा, युद्ध के तौर-तरीके भी उतनी ही तेजी बदलेंगे.  रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि इस नजरिए से भी भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की सख्त जरूरत है. राजनाथ सिंह का कहना है कि मौजूदा वक्त में ज्यादातर हथियार हथियार इलेक्ट्रॉनिक बेस्ड सिस्टम से जुड़े हैं. इससे दुश्मनों के सामने संवेदनशील जानकारी जाहिर होने का खतरा बढ़ जाता है. 

आधुनिक रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भरता जरूरी

ऐसे में हम जो भी हथियार बाहर से मंगवाते हैं, इलेक्ट्रॉनिक बेस्ड सिस्टम से जुड़े होने की वजह से वो हमारे लिए उतने सुरक्षित नहीं हैं. रक्षा जरूरतों के लिए आयातित उपकरणों की कुछ सीमाएं होती हैं. भारत को इस दायरे से आगे निकल कर आधुनिक तकनीक में आत्मनिर्भरता हासिल करने की जरूरत है. यही वजह है कि रक्षा मंत्री का मानना है कि नवीनतम हथियार और उपकरण सैनिकों की बहादुरी के समान ही महत्वपूर्ण हैं. गोपनीयता सुनिश्चित करने और संवेदनशील जानकारियों तक दुश्मनों की पहुंच न हो, इस लिहाज से भी रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता अब जरूरत है. इसलिए जरूरी है कि भारत आधुनिक तकनीक वाले उपकरणों को देश में विकसित करे. 

रक्षा क्षेत्र में खर्च बढ़ाने की मजबूरी

सीमा पर और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन से मिल रही चुनौतियों से निपटने के लिए भारत को रक्षा क्षेत्र में खर्च लगातार बढ़ाने की जरूरत है. भारत ऐसा कर भी रहा है. मौजूदा वित्तीय वर्ष के बजट में भी रक्षा क्षेत्र को 5.94 लाख करोड़ रुपये मिले हैं, जो पिछले साल की तुलना में 13% ज्यादा है. रक्षा क्षेत्र में आधुनिकीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास पर पूंजीगत व्यय भी बढ़ ही रहा है. इस साल के बजट में आधुनिकीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास से संबंधित खर्च को बढ़ाकर 1.63 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया. हालांकि मौजूदा वक्त में बदलते हालात और चुनौतियों को देखते हुए अभी भी भारत को इस मद में खर्च बढ़ाना पड़ सकता है. चीन का रक्षा बजट भारत से करीब 3 गुना ज्यादा है. ये अलग बात है कि रक्षा बजट तय करने में हर देश के लिए अलग-अलग परिस्थितियां और कारक जिम्मेदार होते हैं.

बाहरी मुल्कों पर निर्भरता खतरनाक

1971 और 1999 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में भारत का जो अनुभव रहा था, वो भी आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित करता है. 1971 के वक्त कई देशों ने भारत को रक्षा उपकरण देने से इनकार कर दिया था. 1999 के कारगिल युद्ध के वक्त भी सेना को रक्षा उपकरणों की काफी जरूरत महसूस हुई थी. इन दोनों मौकों पर पारंपरिक तौर से हथियारों की आपूर्ति करने वाले मुल्कों से भी भारत को इनकार हासिल हुआ था.

रक्षा क्षेत्र के लिए ज्यादा निवेश की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को आयात पर खर्च कम करना होगा और ये तभी संभव है जब घरेलू उत्पादन बढ़े और हम रक्षा क्षेत्र में जल्द से जल्द आत्मनिर्भर हो जाएं. 

डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर पर मिशन मोड में काम

भारत सरकार आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ते हुए एक मजबूत रक्षा इकोसिस्टम बनाने के लिए भी लगातार कदम उठा रही है. इस दिशा में उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की स्थापना करने का फैसला मील का पत्थर साबित होने वाला है. उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में जो रक्षा औद्योगिक कॉरिडोर बनाए गए हैं, उनके जरिए एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर में निवेश को बढ़ावा मिल रहा है.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के मुताबिक यूपी के डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर पर मिशन मोड में काम चल रहा है. अब तक करीब 1,700 हेक्टेयर भूमि के 95% अधिग्रहण का काम पूरा हो गया है. इनमें से 36 उद्योगों और संस्थानों को करीब 600 हेक्टेयर जमीन आवंटित हो चुकी है. अलग-अलग 109 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर हो चुके हैं, रक्षा क्षेत्र के उत्पादन के लिए 16,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश हो सकेगा. अलग-अलग कंपनियां करीब 2,500 करोड़ रुपये का निवेश कर चुकी हैं. वहीं तमिलनाडु डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर करीब 4,000 करोड़ रुपये का निवेश किया जा चुका है. इन दोनों रक्षा कॉरिडोर में स्पेयर पार्ट्स के उत्पादन के साथ ही ड्रोन/ मानव रहित हवाई वाहन, इलेक्ट्रॉनिक युद्धकला से जुड़े उपकरण, विमान और ब्रह्मोस मिसाइलों का निर्माण और असेम्बलिंग का भी काम किया जाएगा. 

रक्षा क्षेत्र में घरेलू खरीद को प्रोत्साहन

आत्मनिर्भरता के लिए घरेलू उद्योगों और घरेलू खरीद का प्रोत्साहन बेहद जरूरी है. यही वजह है कि वित्तीय वर्ष 2023-24 में घरेलू उद्योग के लिए रक्षा पूंजी खरीद बजट का रिकॉर्ड 75%  तय किया गया है. इसके तहत मौजूदा वित्तीय वर्ष में रक्षा क्षेत्र के लिए घरेलू उद्योगों से करीब एक लाख करोड़ रुपये की खरीदारी की जाएगी. भारत रक्षा क्षेत्र में विदेशों से खरीद के मुकाबले घरेलू खरीद की हिस्सेदारी को बढ़ा रहा है. 2018-19 में, घरेलू खरीद, कुल खरीद का 54% था, जो 2019-20 में बढ़कर 59% और 2020-21 में 64% हो गया. 2022-23 के लिए इसे 68% कर दिया गया था. इसमें से 25% बजट निजी उद्योग से खरीद के लिए निर्धारित किया गया था. 2023-24 के लिए इसे 75% तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है. इस सब प्रयासों का ही नतीजा था कि 2018-19 से 2021-22 के बीच चार साल की अवधि में विदेशी स्रोतों से रक्षा खरीद पर खर्च 46% से घटकर 36% हो गया और अब इसे इस साल 25% पर ले जाना है.

रक्षा क्षेत्र में घरेलू उद्योगों को बढ़ावा

घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने के मकसद से निजी उद्योग के लिए 25 प्रतिशत आरएंडडी बजट तय किया गया है. रक्षा क्षेत्र में स्टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए रक्षा उत्कृष्टता के लिए नवोन्मेषण (iDEX) पहल और प्रौद्योगिकी विकास कोष जैसे कदम उठाए गए हैं.  पिछले 7 से 8 साल में उद्योगों को जारी किए गए रक्षा उत्पादन लाइसेंस की संख्या में करीब 200% का इजाफा हुआ है. हाल के वर्षों में जारी किए गए रक्षा उद्योग लाइसेंस की संख्या करीब तीन गुना हो गई है.

रक्षा उत्पादन और निर्यात बढ़ाने पर ज़ोर

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए घरेलू उत्पादन को बढ़ाना ही होगा, इसके साथ रक्षा निर्यात को भी बढ़ाना होगा. पिछले कुछ सालों के दौरान नीतियों में बड़े बदलाव की वजह से भी हम इन दोनों ही मोर्चों पर नई लकीर खींचने में कामयाब हुए हैं. घरेलू उत्पादन को बढ़ाने के लिए रक्षा मंत्रालय समय- समय पर सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची जारी कर रही है. इस सूची में शामिल सामानों के आयात पर तय अवधि के लिए पाबंदी लग जाती है. इस साल मई में रक्षा मंत्रालय की ओर से  चौथी 'सकारात्मक स्वदेशीकरण' सूची (PIL) जारी की गई. ये सूची घरेलू खरीद बढ़ाने का बेहद ही कारगर तरीका है. घरेलू खरीद की हिस्सेदारी बढ़ाना रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का सबसे प्रमुख कारक है.

रक्षा उत्पादन में तेजी से बढ़ रहे हैं आगे

पिछले साल यानी वित्तीय वर्ष 2022-23 में रक्षा उत्पादन और रक्षा निर्यात में भारत ने ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है. भारत ने साल 2022-23 में रक्षा उत्पादन के मामले में एक बड़ा पड़ाव पार किया. इस अवधि में भारत का घरेलू रक्षा उत्पादन एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का रहा. ये पहला मौका है, जब रक्षा उत्पादन में हम एक लाख करोड़ रुपये के स्तर को पार कर पाए हैं.  वित्तीय वर्ष 2021-22 में रक्षा उत्पादन 95,000 करोड़ रुपये रहा था. 2022-23 में रक्षा उत्पादन में मूल्यों के हिसाब से 12 फीसदी तक का इजाफा हुआ है. 

85 से ज्यादा देशों को रक्षा निर्यात

इसके साथ ही भारत का रक्षा निर्यात भी नई ऊंचाई पर पहुंच गया है. साल 2022-23 में भारत का रक्षा निर्यात करीब 16,000 करोड़ रुपये (160 अरब रुपये) रहा. पिछले साल के मुकाबले रक्षा निर्यात में 24% का इजाफा हुआ है. भारत का रक्षा निर्यात जल्द ही 20,000 करोड़ रुपये के स्तर को भी पार कर लेगा. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसका पूरा भरोसा जताया है. पिछले 6 साल में भारत का रक्षा निर्यात 10 गुना से ज्यादा बढ़ गया है. 2016-17 में हमारा रक्षा निर्यात 1,521 करोड़ रुपये ही था. आने वाले कुछ वर्षों में रक्षा निर्यात को भारत सरकार 40,000 करोड़ रुपये तक ले जाना चाहती है.

भारत फिलहाल छोटे-मोटे उपकरणों के साथ ही लड़ाकू टैंक, लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, पनडुब्बी और बड़े से बड़े हथियारों को देश में बना रहा है. भारत अब न सिर्फ अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा कर रहा है, बल्कि निर्यात बढ़ाकर मित्र देशों की रक्षा जरूरतों को भी बड़े पैमाने पर पूरा कर रहा है. भारत का रक्षा उद्योग मित्र देशों की सुरक्षा जरूरतों को भी पूरा कर रहा है. अब हम 85 से ज्यादा देशों को रक्षा निर्यात कर रहे हैं. 

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की राह में चुनौतियां

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों यानी MSMEs की भूमिका रक्षा उत्पादन में और बढ़ानी होगी. तकनीक के विकास के लिए इनोवेशन और उससे जुड़े स्टार्टअप को बढ़ावा देना होगा. ऐसा माहौल तैयार करना होगा जिससे रक्षा डिजाइन, विकास और उत्पादन में ज्यादा से ज्यादा संख्या में स्टार्टअप आगे आएं.

ये बात सही है कि हम तेजी और मजबूती से रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रहे हैं, लेकिन ये तथ्य है कि भारत कई सालों से  वैश्विक स्तर पर हथियारों के सबसे बड़े आयातक देशों में से एक रहा है. अभी भी भारत इस मामले में टॉप देशों में शामिल है.

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट की मानें तो भारत 2018 से 2022 के बीच दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश था. इस दौरान भारत के हथियारों का आयात दुनिया के कुल आयात का करीब 11% प्रतिशत था. ये सही है कि 2011-15 और 2016-20 के बीच तुलना करने पर भारत के हथियारों के आयात में 33% की कमी आई है. उसी तरह से  2013-2017 और 2018-22 के बीच तुलना करने पर भारत के हथियार आयात में 11% की कमी आई है. लेकिन जिस तरह से तमाम कोशिशों के बावजूद हम दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातक देश बने हुए हैं, उसे देखते हुए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत को अभी भी लंबा सफ़र तय करना है.

सबसे बड़ा रक्षा आयातक के टैग को होगा हटाना 

पश्चिमी देशों ख़ासकर अमेरिका और रूस के बीच ध्रुवीकरण को लेकर होड़ मची है, जबकि भारत बहुध्रुवीय दुनिया का हिमायती है. ध्रुवीकरण के लिए होड़ के साथ ही चीन और पाकिस्तान से जुड़े खतरों और सुरक्षा चुनौतियों के हिसाब से भी रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का महत्व और भी बढ़ता जा रहा है. भारत के लिए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की संकल्पना में घरेलू उत्पादन को बढ़ाना और निर्यात को बढ़ाना दोनों ही शामिल हैं. अगर भारत वैश्विक स्तर पर सैन्य ताकत बनना चाहता है, तो रक्षा निर्माण में आत्मनिर्भर होने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है. इसके लिए सबसे बड़ा रक्षा आयातक देश के टैग को हटाकर भारत को रक्षा निर्यात के लिहाज से दुनिया की बड़ी ताकत बनना होगा.

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