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प्रौद्योगिकी क्षेत्र में तेजी के साथ बढ़ने से होगा बदलाव, अमिताभ कांत की वार्निंग- अवसर का फायदा न उठाया तो चीन पर हो जाएंगे निर्भर

कार्बन उत्सर्जन को लेकर लगातार विकासशील देशों को टारगेट किया जाता है. लेकिन अमिताभ कांत ने कहा- वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन की वजह हम नहीं हैं.

देश और दुनिया में लगातार नई प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल ने पूरी तरह से कार्यशैली को बदलकर रख दिया है. ऐसे में प्रौद्योगिकी क्षेत्र में तेजी के साथ आगे बढ़ने पर भारत में बदलाव आएगा, ऐसा मानना है नीति आयोग के पूर्व सीईओ और जी 20 शेरपा अमिताभ कांत का. समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए एक इंटव्यू में कांत ने कहा कि देश को वैश्विक व्यवधानों के बीच स्वच्छ प्रौद्योगिकी विनिर्माण में आगे बढ़ने के अवसर का लाभ उठाना चाहिए.

अमिताभ कांत ने ये माना कि जलवायु परिवर्तन के लिए ऐतिहासिक रूप से जिम्मेदार विकसित देशों से वित्तीय सहायता की कमी विकासशील देशों के नए जलवायु लक्ष्यों को प्रभावित कर सकती है. उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यापार में व्यवधानों ने भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर उत्पन्न किया है.

नीति आयोग के पूर्व सीईओ ने आगे कहा, ‘‘एक शून्यता है जिसे भारत भर सकता है. ऐसा कर हम आर्थिक वृद्धि को गति दे सकते हैं.’’ उन्होंने इसके लिए UPI पेमेंट का उदाहरण देते हुए कहा कि वित्तीय प्रौद्योगिकी (फिनटेक) जैसे क्षेत्रों में भारत ने उल्लेखनीय प्रौद्योगिकी प्रगति हासिल की है.

प्रौद्योगिकी से आ रहा बदलाव

अमिताभ कांत ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि ‘‘हमें सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, बैटरी और इलैक्ट्रिक वाहनों समेत स्वच्छ-प्रौद्योगिकी विनिर्माण में इस सफलता को दोहराना चाहिए. ये भारत के लिए 2030 तक 500 गीगावाट अक्षय ऊर्जा क्षमता को पार करने का अवसर है. प्रौद्योगिकी व्यवधान अपरिहार्य हैं और हमें सबसे पहले इसमें अग्रणी बनना चाहिए. प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ना भारत में बदलाव लाएगा.’’

उन्होंने आगाह किया कि अगर भारत इस अवसर का लाभ उठाने में विफल रहता है, तो वह आयात पर निर्भर हो जाएगा. अमिताभ कांत ने आगे कहा- ‘‘अगर भारत इस अवसर का लाभ नहीं उठाता है, तो हम आयात के लिए चीन पर निर्भर हो जाएंगे. तब स्वच्छ प्रौद्योगिकी आयात पर हमारा खर्च तेल पर वर्तमान खर्च से कहीं अधिक होगा.’’

एक सवाल के जवाब में कि क्या विकसित देशों से अपर्याप्त धनराशि मिलने से विकासशील देशों के नए जलवायु लक्ष्यों पर असर पड़ेगा? अमिताभ कांत ने कहा- ‘‘विकासशील देशों में जलवायु कार्रवाई के लिए वित्तपोषण करने के लिए जिम्मेदार विकसित देश पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराने में विफल रहे हैं. उन्होंने 2020 तक सालाना 100 अरब अमेरिकी डॉलर देने का अपना वादा पूरा नहीं किया. विकासशील देशों को हर साल 1300 अरब डॉलर की जरूरत है और जलवायु व सतत विकास लक्ष्यों के लिए कुल 3000 अरब अमेरिकी डॉलर की जरूरत है.’’ कांत ने साथ ही कहा कि विकासशील देश जलवायु संकट के लिए जिम्मेदार नहीं हैं.

विकसित देश 80% कार्बन उत्सर्जन के जिम्मेदार

कार्बन उत्सर्जन को लेकर लगातार विकासशील देशों को टारगेट किया जाता है. लेकिन अमिताभ कांत ने कहा- वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन की वजह हम नहीं हैं... ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में विकसित देशों की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत है. विकासशील देशों के लिए, पर्याप्त समर्थन के बिना अपने जलवायु लक्ष्यों को पूरा करना और कार्बन मुक्त करना बेहद मुश्किल है.’’

गौरतलब है कि देशों को 2031-2035 की अवधि के लिए राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) या जलवायु योजनाओं का अपना अगला खाका इस साल पेश करना आवश्यक है. इन जलवायु योजनाओं का सामूहिक उद्देश्य औद्योगिक क्रांति की शुरुआत के बाद से वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करना है, जो कि 2015 के पेरिस समझौते का प्रमुख लक्ष्य है. इसके लिए विकसित देशों ने 2035 तक मात्र 300 अरब अमेरिकी डॉलर की मदद की पेशकश की है जो कि 2025 से हर साल आवश्यक कम से कम 1300 अरब डॉलर का एक छोटा सा अंश मात्र है.

भारत ने इस राशि को ‘‘बेहद कम...’’, ‘‘नगण्य’’ आदि करार दिया है. संसद में जनवरी के महीने में पेश की गई सरकार की आर्थिक समीक्षा 2024-25 में कहा गया कि ‘ग्लोबल साउथ’ में जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए विकसित देशों से धन की कमी विकासशील देशों को अपने जलवायु लक्ष्यों को ‘‘फिर से तैयार’’ करने के लिए मजबूर कर सकती है. ‘ग्लोबल साउथ’ शब्द का इस्तेमाल आम तौर पर आर्थिक रूप से कम विकसित देशों को संदर्भित करने के लिए किया जाता है.

ज्यादातर ‘ग्लोबल साउथ’ देश औद्योगीकरण वाले विकास की दौड़ में पीछे रह रह गए हैं. इनका उपनिवेश वाले देश के पूंजीवादी और साम्यवादी सिद्धांतों के साथ विचारधारा का भी टकराव रहा है.

 

राजेश कुमार पत्रकारिता जगत में पिछले करीब 14 सालों से ज्यादा वक्त से अपना योगदान दे रहे हैं. राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों से लेकर अपराध जगत तक, हर मुद्दे पर वह स्टोरी लिखते आए हैं. इसके साथ ही, किसी खबरों पर किस तरह अलग-अलग आइडियाज के साथ स्टोरी की जाए, इसके लिए वह अपने सहयोगियों का लगातार मार्गदर्शन करते रहे हैं. इनकी अंतर्राष्ट्रीय जगत की खबरों पर खास नज़र रहती है, जबकि भारत की राजनीति में ये गहरी रुचि रखते हैं. इन्हें क्रिकेट खेलना काफी पसंद और खाली वक्त में पसंद की फिल्में भी खूब देखते हैं. पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर ऑफ ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म किया है. राजनीति, चुनाव, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर राजेश कुमार लगातार लिखते आ रहे हैं.
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