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राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन: 6 लाख लोगों को रोजगार देने की तैयारी, 2 हजार करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को मंजूरी दे दी है.

पूरी दुनिया में प्रदूषण और भविष्य में होने वाले ऊर्जा संकट से निपटने के लिए कई स्तर पर प्रयास जारी हैं. रूस और यूक्रेन युद्ध के बाद जिस तरह से तेल और गैस की कीमतों में उछाल और कमी आई है उससे भारत भी अछूता नहीं रहा है. 

हालांकि अमेरिका सहित पश्चिम देशों के विरोध के बावजूद भारत ने अपने एनर्जी सेक्टर की जरूरत को देखते हुए रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखा है. यही वजह है कि देश में अभी तक यूरोपीय देशों की तरह महंगे तेल की मार झेलनी नहीं पड़ी है. 

लेकिन जिस तरह से रूस-यूक्रेन को लेकर तनाव बढ़ रहा है और पूरी दुनिया दो खेमों में बंटती नजर आ रही है उससे साफ हो गया है कि भारत को ऊर्जा संकट से निपटने के लिए आत्मनिर्भर बनना ही होगा. 
 
भारत के एनर्जी सेक्टर के लिए अच्छी खबर ये है कि मोदी सरकार की कैबिनेट ने राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन की मंजूरी दे दी है. पीआईबी की ओर से जारी एक एक प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक मिशन का उद्देश्य भारत को ग्रीन हाइड्रोजन और इसके सहायक उत्पादों के उत्पादन, इस्तेमाल और निर्यात के लिए एक वैश्विक हब बनाना है.यह मिशन भारत को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनने और अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने में मदद करेगा. 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की ओर से मंजूर किए गए इस मिशन में के शुरुआत में ही 19,744 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है. जिसमें साइट कार्यक्रम के लिए 17,490 करोड़ रुपये, पायलट परियोजनाओं के लिए 1,466 करोड़ रुपये, अनुसंधान एवं विकास के लिए 400 करोड़ रुपये और अन्य मिशन घटकों के लिए 388 करोड़ रुपये शामिल हैं.  नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) संबंधित घटकों के कार्यान्वयन के लिए योजना के दिशानिर्देश तैयार करेगा. 

इस महत्वाकांक्षी मिशन से देश को क्या मिलेगा

  • देश में लगभग 125 जीडब्ल्यू की संबद्ध अक्षय ऊर्जा क्षमता वृद्धि के साथ प्रति वर्ष कम से कम 5 एमएमटी (मिलियन मीट्रिक टन) की हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता का विकास.
  • आठ लाख करोड़ रुपये से अधिक का कुल निवेश.
  • छह लाख से अधिक रोजगार का सृजन.
  • कुल मिलाकर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के जीवाश्म ईंधन के आयात में कमी.
  • वार्षिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 50 एमएमटी की कमी.

इसके अलावा मिशन से विभिन्न प्रकार के लाभ प्राप्त होंगे, जैसे- ग्रीन हाइड्रोजन और इसके सहायक उत्पादों के लिए निर्यात के अवसरों का सृजन; औद्योगिक, आवागमन और ऊर्जा क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन में कमी; आयातित जीवाश्म ईंधन और फीडस्टॉक पर निर्भरता में कमी; स्वदेशी विनिर्माण क्षमताओं का विकास; रोजगार के अवसरों का सृजन; और अत्याधुनिक तकनीकों का विकास.

भारत की ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता कम से कम 5 एमएमटी प्रति वर्ष तक पहुंचने की संभावना है, जिसमें लगभग 125 जीडब्ल्यू की संबद्ध अक्षय ऊर्जा क्षमता शामिल है.  2030 तक 8 लाख करोड़ रुपये का निवेश होने का लक्ष्य है और 6 लाख से अधिक रोजगार सृजित होने की संभावना है 2030 तक कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में प्रति वर्ष लगभग 50 एमएमटी की कमी होने की संभावना है

इस मिशन से ग्रीन हाइड्रोजन की मांग, उत्पादन, उपयोग और निर्यात की सुविधा प्राप्त होगी. ग्रीन हाइड्रोजन ट्रांजिशन प्रोग्राम (एसआईजीएचटी) के लिए रणनीतिक क्रियाकलाप को लेकर, मिशन के तहत दो अलग-अलग वित्तीय प्रोत्साहन तंत्र- इलेक्ट्रोलाइजर के घरेलू निर्माण और ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन को लक्षित किया जाएगा. 

मिशन उभरते अंतिम उपयोग वाले क्षेत्रों और उत्पादन मार्गों में पायलट परियोजनाओं का भी समर्थन करेगा.  बड़े पैमाने पर उत्पादन और/या हाइड्रोजन के इस्तेमाल का समर्थन करने में सक्षम क्षेत्रों की पहचान की जाएगी और उन्हें ग्रीन हाइड्रोजन हब के रूप में विकसित किया जाएगा.

ग्रीन हाइड्रोजन इकोसिस्टम की स्थापना का समर्थन करने के लिए एक सक्षम नीतिगत कार्यक्रम विकसित किया जाएगा. एक मजबूत मानक और नियमन संरचना भी विकसित की जाएगी. इसके अलावा, मिशन के तहत अनुसंधान एवं विकास (रणनीतिक हाइड्रोजन नवाचार भागीदारी- एसएचआईपी) के लिए एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी की सुविधा प्रदान की जाएगी; अनुसंधान एवं विकास परियोजनाएं लक्ष्य-उन्मुख, समयबद्ध और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी प्रौद्योगिकियों को विकसित करने के लिए उपयुक्त रूप से बढ़ाई जाएंगी. मिशन के तहत एक समन्वित कौशल विकास कार्यक्रम भी चलाया जाएगा. 

केंद्र और राज्य सरकारों के सभी संबंधित मंत्रालय, विभाग, एजेंसियां और संस्थान मिशन के उद्देश्यों की सफल उपलब्धि सुनिश्चित करने के लिए केंद्रित और समन्वित कदम उठाएंगे. मिशन के समग्र समन्वय और कार्यान्वयन के लिए नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय उत्तरदायी होगा. बता दें कि ये सारी जानकारी पीआईबी की ओर से दी गई है.

वहीं बीती 3 जनवरी को एनटीपीसी ने पीएनजी नेटवर्क में पहली हरित हाइड्रोजन मिश्रण परियोजना की शुरुआत की है. गुजरात के सूरत के आदित्यनगर में कवास टाउनशिप के घरों में एच2-एनजी (प्राकृतिक गैस) की सप्‍लाई करने के लिए व्‍यवस्‍था की गई है. 

कवास में ग्रीन हाइड्रोजन पहले से स्थापित एक मेगावाट फ्लोटिंग सौर परियोजना से बिजली का उपयोग करके पानी के इलेक्ट्रोलिसिस द्वारा बनाया गया है.  नियामक निकाय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस विनियामक बोर्ड (पीएनजीआरबी) ने पीएनजी के साथ ग्रीन हाइड्रोजन के 5 प्रतिशत वॉल्यूम मिश्रण के लिए मंजूरी दे दी है और मिश्रण स्‍तर को चरण के अनुसार 20 प्रतिशत तक पहुंचाया जाएगा. प्राकृतिक गैस के साथ मिलाए जाने पर ग्रीन हाइड्रोजन शुद्ध हीटिंग सामग्री को समान रखते हुए कार्बन उत्सर्जन को कम करता है. यह उपलब्धि केवल ब्रिटेन, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसे कुछ गिने-चुने देशों द्वारा प्राप्‍त की गई है. 

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