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मुमताज की मौत के बाद 'चश्मा' क्यों पहनने लगा था शाहजहां? मुगलों से जुड़ा यह इतिहास नहीं जानते होंगे आप 

17 जून, 1631 को बुरहानपुर में मुमताज की मौत हो गई थी. इसका शाहजहां पर बहुत बुरा असर हुआ. शाहजहां इतने ज्यादा गमजदा हो गए कि पूरे एक हफ्ते तक अपने कक्ष से ही बाहर नहीं निकले.

दुनिया में जब भी किसी को मुहब्बत की मिसाल देनी होती है, तो ताजमहल सबसे पहले जुबान पर आता है. दुनिया के सात अजूबों में से एक यह इमारत मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज की याद में बनवाई थी. वह मुमताज से इतना प्रेम करते थे कि उनकी मौत भी ताजमहल का दीदार करते हुए हुई और बाद में दोनों को एकसाथ ताजमहल में ही दफन किया गया. 

वैसे तो मुगल बादशाह शाहजहां के अय्याशी के किस्से बहुत मशहूर हैं. वह शान-ओ-शौकत पसंद करने वाला बादशाह था, लेकिन इतिहासकार लिखते हैं कि जब तक मुमताज महल जीवित रहीं, शाहजहां उनके प्रति पूरी तरह समर्पित रहे. मुमताज महल के मरने के बाद भी शाहजहां उनकी याद में ही खोए रहते थे यहां तक कि उन्होंने मुमताज की मौत के बाद चश्मा लगाना भी शुरू कर दिया था. आइए जानते हैं कि मुगल बादशाह को मुमताज की मौत के बाद चश्मा लगाने की जरूरत क्यों पड़ी थी. 

शाहजहां पर मुमताज की मौत का पड़ा था बुरा असर

17 जून, 1631 को अपने 14वें बच्चे को जम्न देते समय बुरहानपुर में मुमताज की मौत हो गई थी. इसका शाहजहां पर बहुत बुरा असर हुआ. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, मुगल बादशाह शाहजहां के दरबारी इतिहासकार इनायत खां ने अपनी किताब 'शाहजहांनामा' में इस किस्से का वर्णन किया है. वह लिखते हैं कि मुमताज की मौत के बाद शाहजहां इतने ज्यादा गमजदा हो गए कि वह पूरे एक हफ्ते तक अपने कक्ष से बाहर ही नहीं निकले. उन्होंने दरबार में आना तक छोड़ दिया था. यहां तक कि बुधवार को सफेद कपड़े भी पहनने लगे थे, क्योंकि मुमताज की मौत बुधवार के दिन ही हुई थी.

रोते-रोते आंखे हो गई थी कमजोर

इतिहासकार इनायत खां आगे लिखते हैं कि शाहजहां पर मुमताज की मौत को इतना बुरा असर हुआ कि उनकी दाड़ी अचानक सफेद होने लगी थी. इससे पहले उनकी दाढ़ी के इक्का-दुक्का बाल ही सफेद हुआ करते थे. मुमताज की मौत से गमजदा बादशाह शाहजहां के लगातार रोने के कारण उनकी आंखे कमजोर हो गई, जिस कारण उन्हें चश्मा पहनने के लिए भी मजबूर होना पड़ा था.

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प्रांजुल श्रीवास्तव एबीपी न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. फिलहाल फीचर डेस्क पर काम कर रहे प्रांजुल को पत्रकारिता में 9 साल तजुर्बा है. खबरों के साइड एंगल से लेकर पॉलिटिकल खबरें और एक्सप्लेनर पर उनकी पकड़ बेहतरीन है. लखनऊ के बाबा साहब भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का 'क, ख, ग़' सीखने के बाद उन्होंने कई शहरों में रहकर रिपोर्टिंग की बारीकियों को समझा और अब मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं. प्रांजुल का मानना है कि पाठक को बासी खबरों और बासी न्यूज एंगल से एलर्जी होती है, इसलिए जब तक उसे ताजातरीन खबरें और रोचक एंगल की खुराक न मिले, वह संतुष्ट नहीं होता. इसलिए हर खबर में नवाचार बेहद जरूरी है.

प्रांजुल श्रीवास्तव काम में परफेक्शन पर भरोसा रखते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं को पहुंचाने का काम नहीं है, यह भी जरूरी है कि पाठक तक सही और सटीक खबर पहुंचे. इसलिए वह अपने हर टास्क को जिम्मेदारी के साथ शुरू और खत्म करते हैं. 

अलग अलग संस्थानों में काम कर चुके प्रांजुल को खाली समय में किताबें पढ़ने, कविताएं लिखने, घूमने और कुकिंग का भी शौक है. जब वह दफ्तर में नहीं होते तो वह किसी खूबसूरत लोकेशन पर किताबों और चाय के प्याले के साथ आपसे टकरा सकते हैं.

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