कौन और कैसे तय होती हैं क्रूड ऑयल की कीमत, अब क्यों बढ़ रहे दाम?
Crude Prices Hike: मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव के बीच क्रूड ऑयल की कीमतों में एक बार फिर से बढ़ोतरी आ रही है. आइए जानते हैं कि कीमतों में यह उछाल अचानक क्यों आया.

- मध्य पूर्व तनाव से ब्रेंट क्रूड चार महीने के उच्चतम पर।
- वैश्विक आपूर्ति, मांग और भू-राजनीति तेल कीमतें निर्धारित करती हैं।
- होर्मुज जलडमरूमध्य रुकावट, घटते वैश्विक तेल स्टॉक चिंताजनक।
Crude Prices Hike: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला है. शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड 108.77 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. यह चार महीनों में सबसे ऊंचा स्तर है. इस अचानक बढ़ोतरी ने वैश्विक तेल आपूर्ति और ऊर्जा बाजारों पर भू राजनीतिक तनाव के असर को लेकर चिंता फिर से बढ़ा दी है. लेकिन असल में कच्चे तेल की कीमत कौन तय करता है? आइए जानते हैं कि यह कीमत कैसे तय की जाती है और अभी इसमें इतनी तेजी क्यों आ रही है.
आपूर्ति और मांग तेल की कीमतों को तय करते हैं
कच्चे तेल की कीमतों पर असर डालने वाला सबसे जरूरी कारक वैश्विक आपूर्ति और मांग के बीच का संतुलन है. जब तेल की मांग बढ़ती है और उत्पादन या फिर उपलब्धता कम होती है तो खरीदार सीमित आपूर्ति के लिए होड़ करते हैं. इससे कीमतों में बढ़ोतरी आ जाती है.
दूसरी तरफ जब उत्पादन खपत से ज्यादा होता है और इन्वेंटरी बढ़ती है तो विक्रेता खरीदारों को आकर्षित करने के लिए कीमतों को कम कर सकते हैं. इस वजह से अनुमानित आपूर्ति या फिर मांग में मामूली बदलाव भी कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी हलचल पैदा कर सकते हैं.

वैश्विक कमोडिटी एक्सचेंजों की भूमिका
कच्चे तेल का कारोबार प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय कमोडिटी एक्सचेंजों पर बड़े पैमाने पर होता है. इनमें न्यूयॉर्क मर्केंटाइल एक्सचेंज और इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज शामिल हैं. खरीदार और विक्रेता फ्यूचर्स कांट्रैक्ट और दूसरे वित्तीय साधनों के जरिए तेल का कारोबार करते हैं. यह लेन-देन लगातार होते रहते हैं और बाजार में शामिल लोग उत्पादन डेटा, आर्थिक विकास, भू राजनीतिक घटना, इन्वेंटरी और भविष्य की मांग के अनुमानों जैसी स्थितियों पर प्रतिक्रिया देते हैं. इस ट्रेडिंग प्रक्रिया से बनी कीमतें कच्चे तेल के लिए बाजार में व्यापक रूप से मानी जाने वाली कीमतों को तय करने में मदद करती हैं.
ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई
वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों पर नजर रखने के लिए दो प्रमुख बेंचमार्क का इस्तेमाल किया जाता है. ब्रेंट क्रूड मुख्य अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क है और भारत जैसे देशों के लिए इंपोर्टेड तेल की लागत का आकलन करते समय यह खासतौर से जरूरी है.
डब्ल्यूटीआई अमेरिकी तेल बाजार से जुड़ा प्रमुख बेंचमार्क है. ये बेंचमार्क संदर्भ कीमतों को प्रदान करते हैं जिनके आधार पर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल के अलग-अलग ग्रेड की कीमतों को तय किया जाता है.
OPEC और OPEC+ कीमतों को कैसे प्रभावित करते हैं?
हालांकि कोई भी संगठन सीधे तौर पर कच्चे तेल की वैश्विक कीमत तय नहीं करता है, लेकिन OPEC और OPEC+ समूह का बाजार पर काफी प्रभाव है. सऊदी अरब और यूएई सहित तेल का उत्पादन करने वाले प्रमुख देश उत्पादन के स्तर में बदलाव करके वैश्विक आपूर्ति को प्रभावित कर सकते हैं. प्रोडक्शन में कटौती से बाजार में मौजूद तेल की मात्रा कम हो जाती है और कीमत बढ़ सकती है. इसी के साथ प्रोडक्शन बढ़ने से सप्लाई बढ़ती है और कीमतों पर नीचे की तरफ दबाव पड़ता है.
अभी कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी क्यों हो रही है?
ब्रेंट क्रूड की कीमतों में हालिया उछाल जिसमें यह $100 से ऊपर और $109 प्रति बैरल की तरफ बढ़ रहा है, कई वजह से हो रहा है. खासकर मिडल ईस्ट से सप्लाई को लेकर चिंताएं.

वेस्ट एशिया संकट
ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते मिलिट्री तनाव ने बड़े क्षेत्रीय संघर्ष का डर बढ़ा दिया है. हूथी विद्रोहियों के हमलों की खबरों और तेल के अहम इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर चिंताओं ने ट्रेडर्स के बीच बेचैनी और बढ़ा दी है. बाजार अक्सर असर कमी होने से पहले ही भविष्य में सप्लाई में रुकावट की संभावना पर प्रतिक्रिया देते हैं. इसी रिस्क से प्रीमियम कीमतों में उछाल आ सकता है.
होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट
होर्मुज स्ट्रेट तेल ट्रांसपोर्टेशन के लिए दुनिया के सबसे बड़े रास्तों में से एक है. दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई का लगभग पांचवा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है. संघर्ष की वजह से इस रास्ते में रूकावट या फिर पाबंदी से टैंकरों को लंबे रास्ते लेने पड़ सकते हैं. इससे ट्रांसपोर्टेशन, फ्रेट और इंश्योरेंस की लागत बढ़ जाती है और साथ ही इस बात का डर भी पैदा होता है कि क्या इंटरनेशनल बाजार में पूरा तेल पहुंच पाएगा.
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घटता ग्लोबल स्टॉक
एक और वजह ग्लोबल तेल स्टॉक में कमी है. रिपोर्ट के मुताबिक इस साल ग्लोबल स्टॉक में लगभग 400 से 410 मिलियन बैरल की कमी आई है. कम स्टॉक होने से अचानक सप्लाई में रुकावट आने पर बाजार के पास कम बफर बचता है. यही वजह है कि किसी भी बड़े जियोपॉलिटिकल झटके का कीमतों पर ज्यादा असर पड़ सकता है.
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