किसी करेंसी को कैसे मिलता है ग्लोबल करेंसी का दर्जा, क्या हैं नियम?
BRICS Summit 2026: ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान एक बार फिर से रुपया-रूबल व्यापार को लेकर चर्चा शुरू हो चुकी है. आइए जानते हैं कि किसी भी करेंसी को ग्लोबल करेंसी का दर्जा कब मिलता है.

- ब्रिक्स देश अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने पर विचार कर रहे।
- मजबूत, स्थिर अर्थव्यवस्था, कम महंगाई वैश्विक मुद्रा बनाती है।
- खुले बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार उपयोग इसे और मजबूत करते हैं।
- कूटनीतिक प्रभाव, स्थिर नीतियां मुद्रा को विश्वसनीय बनाती हैं।
BRICS Summit 2026: भारत ब्रिक्स समिट की मेजबानी कर रहा है. इसमें कई देशों के बड़े नेता दिल्ली आ चुके हैं. समिट के साथ-साथ ब्रिक्स देशों की अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करने पर भी नई बहस छिड़ गई है. भारत, चीन और रूस के नेतृत्व वाला ब्रिक्स समूह कई सालों से डॉलर पर निर्भरता को कम करने के तरीकों पर चर्चा कर रहा है. इसी बीच डॉलर को छोड़कर रुपया-रूबल से कारोबार करने को लेकर भी बात चल रही है. आइए जानते हैं कि असल में किसी करेंसी को ग्लोबल करेंसी क्या बनता है और कौन से नियम उसका इंटरनेशनल स्टेटस तय करते हैं.
एक मजबूत और स्थिर अर्थव्यवस्था
पहली बड़ी जरूरत एक बड़ी और शक्तिशाली अर्थव्यवस्था है. जिन देशों की जीडीपी बड़ी होती है और जो ग्लोबल आर्थिक गतिविधि में बड़ी भूमिका निभाते हैं उनकी करेंसी के इंटरनेशनल स्तर पर इस्तेमाल होने की संभावना ज्यादा होती है. अमेरिकी डॉलर की स्थिति अमेरिकी अर्थव्यवस्था के बड़े आकार और मजबूती से गहराई से जुड़ी है.
आर्थिक स्थिरता भी उतनी ही जरूरी है. लगातार और अनिश्चित महंगाई से प्रभावित करेंसी विदेशी सरकारों, निवेशकों और बिजनेस के लिए कम आकर्षक हो जाती हैं. कम और काफी हद तक स्थिर महंगाई करेंसी की वैल्यू में भरोसा बनाए रखने में मदद करती है.

ग्लोबल विदेशी मुद्रा भंडार में मौजूदगी
एक और बड़ा पैमाना यह है कि सेंट्रल बैंक अपनी विदेशी मुद्रा भंडार के हिस्से के तौर पर किसी करेंसी को कितनी बड़ी मात्रा में रखते हैं. सेंट्रल बैंक आमतौर पर ऐसी करेंसी को प्राथमिकता देते हैं जिन्हें इंटरनेशनल पेमेंट और फाइनेंशियल सुरक्षा के लिए स्थिर, लिक्विड और भरोसेमंद माना जाता है.
अमेरिकी डॉलर सबसे प्रमुख रिजर्व करेंसी बनी हुई है. यह ग्लोबल विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 58% से 60% हिस्सा है. इसके बाद यूरो जापानी येन और ब्रिटिश पाउंड जैसी करेंसी आती हैं. ग्लोबल रिजर्व में किसी करेंसी की हिस्सेदारी जितनी ज्यादा होती है इंटरनेशनल मॉनेटरी सिस्टम में उसकी स्थिति उतनी ही मजबूत होती है.
खुले और लिक्विड कैपिटल मार्केट
ग्लोबल करेंसी के लिए ऐसे मार्केट की जरूरत होती है जहां पर पैसा आजादी से और कुशलता से आ जा सके. यह कन्वर्टिबिलिटी से गहराई से जुड़ा है. यानी निवेशकों को आमतौर पर बिना ज्यादा सरकारी पाबंदियों के उस करेंसी को दूसरी करेंसी में बदलने की सुविधा होनी चाहिए.
चीन इसका एक काफी बड़ा उदाहरण है. दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में से एक होने के बावजूद चीनी युवान को डॉलर जैसी इंटरनेशनल रिजर्व करेंसी वाले प्रमुखता नहीं मिली है. एक वजह चीन का कैपिटल फ्लो पर कंट्रोल है जो देश में पैसे के आने जाने पर रोक लगाता है. गहरे और लिक्विड फाइनेंशियल मार्केट इंटरनेशनल इन्वेस्टर्स को और ज्यादा भरोसा दिलाते हैं कि वह जरूरत पड़ने पर अपने एसेट्स बेच, खरीद और ट्रांसफर कर सकते हैं.

इंटरनेशनल ट्रेड में इस्तेमाल
जब किसी करेंसी का इस्तेमाल इंटरनेशनल ट्रेड में बड़े पैमाने पर किया जाता है तो वह काफी असरदार हो जाती है. कमोडिटी मार्केट में इसकी भूमिका खास तौर पर जरूरी है क्योंकि कच्चे तेल और सोने जैसी कमोडिटी का ट्रेड दुनिया भर में होता है.
इंटरनेशनल तेल ट्रांजैक्शन में डॉलर की लंबे समय से चली आ रही भूमिका ने इसकी ग्लोबल अहमियत को और भी ज्यादा मजबूत किया है. जब देश और कंपनियों को इंटरनेशनल ट्रेड करने के लिए रेगुलर तौर पर डॉलर की जरूरत होती है तो उस मुद्रा की मांग मजबूत बनी रहती है.
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भू राजनीतिक ताकत और स्थिर नीतियां
सिर्फ आर्थिक मजबूती ही काफी नहीं होती. राजनीतिक स्थिरता और भू राजनीतिक प्रभाव भी इस बात को तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं कि देश और इंटरनेशनल बिजनेस किसी करेंसी पर भरोसा करने को तैयार हैं या फिर नहीं.
जिस देश का कूटनीतिक, सैन्य और आर्थिक प्रभाव काफी ज्यादा होता है वह अपनी करेंसी की लंबे समय की स्थिरता के बारे में ज्यादा भरोसा दिला सकता है. सरकार की एक जैसी नीति और भरोसेमंद संस्था भी उतनी ही जरूरी है.
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