अपनी कमाई का 80 पर्सेंट पैसा कहां खर्च कर रहे राज्य? जानें टॉप-5 राज्यों का हाल
Indian States Debts: राज्यों की कमाई का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और मुफ्त योजनाओं में फंस चुका है. अगर खर्च का संतुलन नहीं बदला, तो विकास और कर्ज के बीच की खाई और गहरी हो सकती है.

देश के राज्यों के खजाने में पैसा आता जरूर है, लेकिन रुकता नहीं. चुनावी वादों की चमक, मुफ्त योजनाओं का दबाव और बढ़ता कर्ज मिलकर ऐसा चक्र बना चुके हैं, जिसमें विकास सबसे पीछे छूटता जा रहा है. सवाल यह नहीं कि राज्य कमा कितना रहे हैं, सवाल यह है कि कमाई का बड़ा हिस्सा आखिर जा कहां रहा है. आंकड़ों में झांकें तो तस्वीर चौंकाने वाली नजर आती है.
मुफ्त योजनाएं और बिगड़ती वित्तीय सेहत
पिछले एक दशक में मुफ्त योजनाएं और सब्सिडी राज्यों की राजनीति का मजबूत हथियार बन चुकी हैं. सत्ता तक पहुंचने का यह आसान रास्ता अब राज्यों की वित्तीय सेहत पर भारी पड़ रहा है. अधिकांश राज्यों की आय का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन, सब्सिडी और ब्याज भुगतान में खर्च हो रहा है. नतीजा यह है कि बिजली, सड़क, आवास, अस्पताल और स्कूल जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए बजट में गुंजाइश लगातार घटती जा रही है.
कमाई का बड़ा हिस्सा कहां जा रहा है
राज्यों के आय-व्यय के आंकड़े बताते हैं कि कुल राजस्व का लगभग 75 से 80 फीसदी हिस्सा पहले से तय खर्चों में चला जाता है. सरकारी कर्मचारियों का वेतन और सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन राज्य बजट पर सबसे बड़ा बोझ है. शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अहम क्षेत्रों में भी खर्च का बड़ा हिस्सा वेतन मद में ही खत्म हो जाता है. इसके बाद मुफ्त बिजली, पानी और अन्य सब्सिडी योजनाएं बची-खुची राशि को भी निगल लेती हैं.
पंजाब- सबसे ज्यादा दबाव में
पंजाब की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक मानी जा रही है. तमाम खर्चों के बाद राज्य के पास अपनी कमाई का महज 7 फीसदी हिस्सा ही बचता है. इसी साल पंजाब को करीब 90 हजार करोड़ रुपये का मूलधन चुकाना है. इतनी बड़ी राशि चुकाने के लिए राज्य को फिर से कर्ज लेना पड़ रहा है. अक्टूबर 2025 तक पंजाब बाजार से लगभग 20 हजार करोड़ रुपये का कर्ज उठा चुका है, जबकि आगे भी जरूरत बनी रहेगी.
राजस्थान- कर्ज चुकाने के लिए कर्ज
राजस्थान की कहानी भी अलग नहीं है. राज्य के पास पैसा आता तो है पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है और इस साल उसे करीब 1.50 लाख करोड़ रुपये का मूलधन चुकाना है. अब तक राजस्थान 32 हजार करोड़ रुपये का कर्ज ले चुका है, लेकिन कुल देनदारी उसकी कर्ज लेने की सीमा से भी ज्यादा बताई जा रही है. ऐसे में विकास कार्यों पर खर्च करने की बजाय सरकार की प्राथमिकता कर्ज प्रबंधन बनती जा रही है.
बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की चुनौती
बिहार में चुनावी वादों और मुफ्त योजनाओं के चलते वित्तीय संतुलन कमजोर होता दिख रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर खर्च की यही रफ्तार रही, तो राज्य को गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है. महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे अपेक्षाकृत मजबूत अर्थव्यवस्था वाले राज्य भी गारंटी योजनाओं और बढ़ते सामाजिक खर्च के कारण दबाव में हैं.
बिजली और डिस्कॉम का असर
कई राज्यों में बिजली सब्सिडी और वितरण कंपनियों के घाटे ने वित्तीय स्थिति को और कमजोर किया है. डिस्कॉम के नुकसान की भरपाई राज्य सरकारों को करनी पड़ती है, जिससे बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है. इसके साथ ही पुरानी पेंशन योजना की बहाली ने भविष्य की देनदारियों को और बढ़ा दिया है.
विकास पर सीधा असर
जब आय का बड़ा हिस्सा अनिवार्य खर्चों में चला जाता है, तो पूंजीगत व्यय सबसे पहले कटता है. सड़कें, पुल, अस्पताल, स्कूल और औद्योगिक परियोजनाएं या तो टल जाती हैं या धीमी रफ्तार से आगे बढ़ती हैं. इससे रोजगार, निवेश और आर्थिक वृद्धि पर सीधा असर पड़ता है.
यह भी पढ़ें: सैनेटरी पैड पर 0% पर्सेंट तो कंडोम पर 12% टैक्स क्यों, क्या है दोनों हेल्थ प्रॉडक्ट में अंतर की वजह?
टॉप हेडलाइंस
Source: IOCL























