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कितना खतरनाक है एग्रो टेरेरिज्म, इससे दुनिया में कैसे बदल जाएगा युद्ध का तरीका?

एग्रो टेरेरिज्म (कृषि आधारित आतंकवाद) एक दुर्लभ तरीका है, जिसमें फसलों को निशाना बनाया जाता है और कई तरह के फंगस को खतरनाक जैविक हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता है.

आतंकवाद के खतरे से निपटने के लिए दुनिया के कई देशों ने जैसे-जैसे अपने सिक्योरिटी सिस्टम में बदलाव किया है, ठीक वैसे ही आतंकवादी संगठनों ने भी अपनी तौर तरीकों को बदला है. अभी तक आपने धर्म आधारित, राजनीतिक, वैचारिक, राज्य समर्थित या साइबर आतंकवाद के बारे में सुना होगा, लेकिन हाल ही में एक नया तरह का आतंकवाद देखने को मिला है. 

दरअसल, अमेरिका में 3 जून को एग्रो टेरेरिज्म का मामला सामने आया है. यहां जांच एजेंसी FBI ने एग्रो टररिज्म के आरोप में दो चीनी नागरिकों को गिरफ्तार किया है. चलिए जानते हैं कि अमेरिका में सामने आया पूरा मामला क्या है? यह मामला एग्रो टेरेरिज्म कैसे है और इससे दुनिया में युद्ध का तरीका कैसे बदल सकता है? 

क्या है पूरा मामला?

अमेरिकी जांच एजेंसी FBI ने दो चीनी नागरिकों के पास से फ्यूजेरियम ग्रामिनेरियम नामक खतरनाक फंगस बरामद किया है. यह फंगस चीन से तस्करी करके अमेरिका लाया गया था औ इसका प्रयोग एग्रीकल्चरल टेररिज्म वेपन के तौर पर किया जा सकता था. दरअसल, यह एक ऐसा फंगल है, जो फसलों में रोग पैदा करे उन्हें पूरी तरह से बर्बाद कर सकता था, जिससे अमेरिका को अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता था. 

क्या है एग्रो टेरेरिज्म?

एग्रो टेरेरिज्म (कृषि आधारित आतंकवाद) एक दुर्लभ तरीका है, जिसमें फसलों को निशाना बनाया जाता है और कई तरह के फंगस को खतरनाक जैविक हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता है. एग्रो टेरेरिज्म में इन फंगस को खेतों में छोड़ दिया जाता है, जिससे बड़े स्तर पर फसलों को नुकसान होता है. अमेरिका में जो फंगल पाया गया है वह पांच सबसे विनाशकारी फंगसों में एक माना जाता है और इससे गेहूं, जौ, मक्का जैसी अनाज की फसलें संक्रमित हो सकती थीं. 

कैसे बदल जाएगा युद्ध का तरीका?

भले ही एग्रो टेरेरिज्म एक दुर्लभ मामला हो, लेकिन यह तरीका अनोखा नहीं है. जानकारी के मुताबिक, द्वितीय विश्व युद्ध के समय जर्मनी ने ब्रिटेन में आलू की फसलों को नुकसान पहुंचाने के लिए बीटल का इस्तेमाल किया था. 1943 में बीटल को विमान से छोड़ दिया गया था, जिससे बड़े स्तर पर फसलों को नुकसान हुआ था. इस तरह देखा जाए तो एग्रो टेरेरिज्म किसी देश को आर्थिक तौर पर नुकसान पहुंचाने का खतरनाक तरीका है. यह तरीका उन देशों में खतरनाक हो सकता है, जिनकी अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है. 

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प्रांजुल श्रीवास्तव एबीपी न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. फिलहाल फीचर डेस्क पर काम कर रहे प्रांजुल को पत्रकारिता में 9 साल तजुर्बा है. खबरों के साइड एंगल से लेकर पॉलिटिकल खबरें और एक्सप्लेनर पर उनकी पकड़ बेहतरीन है. लखनऊ के बाबा साहब भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का 'क, ख, ग़' सीखने के बाद उन्होंने कई शहरों में रहकर रिपोर्टिंग की बारीकियों को समझा और अब मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं. प्रांजुल का मानना है कि पाठक को बासी खबरों और बासी न्यूज एंगल से एलर्जी होती है, इसलिए जब तक उसे ताजातरीन खबरें और रोचक एंगल की खुराक न मिले, वह संतुष्ट नहीं होता. इसलिए हर खबर में नवाचार बेहद जरूरी है.

प्रांजुल श्रीवास्तव काम में परफेक्शन पर भरोसा रखते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं को पहुंचाने का काम नहीं है, यह भी जरूरी है कि पाठक तक सही और सटीक खबर पहुंचे. इसलिए वह अपने हर टास्क को जिम्मेदारी के साथ शुरू और खत्म करते हैं. 

अलग अलग संस्थानों में काम कर चुके प्रांजुल को खाली समय में किताबें पढ़ने, कविताएं लिखने, घूमने और कुकिंग का भी शौक है. जब वह दफ्तर में नहीं होते तो वह किसी खूबसूरत लोकेशन पर किताबों और चाय के प्याले के साथ आपसे टकरा सकते हैं.

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