क्रूड ऑयल से कैसे बनते हैं डीजल-पेट्रोल और LPG-CNG? जान लें पूरा प्रोसेस
खाड़ी देशों की जंग ने कई मुल्कों के सामने नई चुनौतियां पेश कर दी हैं. हॉर्मुज से होने वाली सप्लाई पर संकट मंडराने से एलपीजी और सीएनजी की किल्लत की आशंका है. आइए जानें पेट्रोल और गैसे कैसे बनते हैं.

ईरान और इजराइल के बीच बढ़ता तनाव केवल विदेशी खबरों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर आपकी रसोई के बजट और आपकी गाड़ी की रफ्तार पर पड़ रहा है. हॉर्मुज जलमार्ग से तेल की सप्लाई बाधित होने की खबरों ने पूरी दुनिया को डरा दिया है. भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि समुद्र पार से आने वाला यह काला गाढ़ा पदार्थ आपके किचन की नीली लौ और गाड़ी के पारदर्शी ईंधन में कैसे बदल जाता है? चलिए इसकी प्रॉसेस समझें.
कच्चा तेल और खाड़ी देशों के युद्ध का बड़ा कनेक्शन
खाड़ी देशों में जब भी तनाव बढ़ता है, तो सबसे पहले कच्चे तेल की कीमतें और सप्लाई प्रभावित होती है. भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है, क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा आयातित तेल पर टिका है. हॉर्मुज जलमार्ग एक ऐसा संकरा रास्ता है, जहां से दुनिया का एक-तिहाई तेल गुजरता है. यदि यहां सप्लाई रुकती है, तो रिफाइनरियों को कच्चा माल नहीं मिलेगा, जिससे न केवल पेट्रोल-डीजल बल्कि घर में इस्तेमाल होने वाली एलपीजी और उद्योगों में चलने वाली सीएनजी की सप्लाई भी चरमरा सकती है.
रिफाइनरी की ओर कच्चे तेल का पहला कदम
विदेशों से बड़े-बड़े जहाजों के जरिए भारत पहुंचने वाले कच्चे तेल को सबसे पहले समुद्री तटों पर बने बड़े टैंकों में जमा किया जाता है. यहां से इसे पाइपलाइनों के जरिए देश की बड़ी रिफाइनरियों जैसे जामनगर, मथुरा या पानीपत भेजा जाता है. कच्चा तेल असल में एक ऐसा मिश्रण है जिसमें कार्बन और हाइड्रोजन के हजारों छोटे-बड़े अणु आपस में गुंथे होते हैं. इसे सीधे इस्तेमाल करना नामुमकिन है क्योंकि इसमें सल्फर, नाइट्रोजन और कई अशुद्धियां होती हैं जो इंजन और वातावरण दोनों के लिए जहर समान हैं.
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तेल को अलग करने का विज्ञान
रिफाइनरी के भीतर कच्चे तेल को साफ करने की सबसे मुख्य प्रक्रिया को 'फ्रैक्शनल डिस्टिलेशन' कहा जाता है. इसमें एक विशाल लोहे का टावर होता है जिसे 'फ्रैक्शनिंग कॉलम' कहते हैं. कच्चे तेल को एक भट्टी में लगभग 400 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है और फिर इस टावर के नीचे से छोड़ दिया जाता है. इस प्रक्रिया का मुख्य सिद्धांत यह है कि कच्चे तेल में मौजूद हर पदार्थ का उबलने का तापमान अलग-अलग होता है, जिससे वे अलग-अलग ऊंचाई पर एकत्र होते हैं.
टावर की ऊंचाई और ईंधन का बंटवारा
जैसे ही गर्म तेल की वाष्प टावर में ऊपर उठती है, वह ठंडी होने लगती है. टावर में अलग-अलग ऊंचाइयों पर ट्रे लगी होती हैं. सबसे भारी और गाढ़ा हिस्सा जैसे डामर सबसे नीचे बैठ जाता है. इसके थोड़ा ऊपर लुब्रिकेटिंग ऑयल और भारी डीजल एकत्र होता है. बीच के हिस्से में केरोसिन और जेट फ्यूल यानी हवाई जहाज का ईंधन निकलता है. टावर के ऊपरी हिस्से में सबसे हल्का तरल यानी पेट्रोल जमा होता है, जबकि जो पदार्थ गैस के रूप में रह जाते हैं, वे टावर के सबसे ऊपरी सिरे से बाहर निकलते हैं.
एलपीजी और सीएनजी कैसे बनती है?
रिफाइनरी के इस टावर में सबसे ऊपर जो गैसें निकलती हैं, उनमें प्रोपेन और ब्यूटेन की मात्रा अधिक होती है. इन गैसों को ठंडा करके और अत्यधिक दबाव में भरकर 'लिक्विड पेट्रोलियम गैस' यानी एलपीजी (LPG) बनाई जाती है, जिसे हम रसोई गैस सिलेंडर में इस्तेमाल करते हैं. दूसरी ओर, प्राकृतिक गैस जो सीधे कुओं से भी निकलती है, उसमें मीथेन ज्यादा होती है. इसे जब कंप्रेस किया जाता है, तो यह CNG बन जाती है. रिफाइनरी प्रोसेस के दौरान निकलने वाली गैसों का शुद्धिकरण करके ही इन्हें गाड़ियों और किचन तक पहुंचाया जाता है.
पेट्रोल और डीजल की गुणवत्ता का सुधार
टावर से निकलने के बाद भी पेट्रोल और डीजल सीधे बेचने लायक नहीं होते हैं. इन्हें 'क्रैकिंग' और 'रिफॉर्मिंग' जैसी प्रक्रियाओं से गुजारा जाता है. यहां बड़े अणुओं को तोड़कर छोटे अणुओं में बदला जाता है, ताकि ईंधन की गुणवत्ता बढ़ सके. इसी चरण में तेल से सल्फर जैसी अशुद्धियों को निकाला जाता है. भारत में वर्तमान में BS-VI मानक लागू हैं, जिसका मतलब है कि रिफाइनरी को तेल में सल्फर की मात्रा को न्यूनतम स्तर पर लाना होता है ताकि धुआं कम निकले और प्रदूषण नियंत्रित रहे.
केमिकल मिक्सिंग और अंतिम उत्पाद की तैयारी
पूरी तरह शुद्ध होने के बाद पेट्रोल और डीजल में कुछ खास 'एड्रिटिव्स' मिलाए जाते हैं. ये केमिकल इंजन के भीतर घर्षण को कम करते हैं और माइलेज बढ़ाने में मदद करते हैं. हर कंपनी के एड्रिटिव्स थोड़े अलग हो सकते हैं, जिससे पेट्रोल की परफॉरमेंस में अंतर आता है. रिफाइनरी से निकलने के बाद इन उत्पादों को अलग-अलग पाइपलाइनों या रेल टैंकरों के जरिए देश भर के ऑयल डिपो तक भेजा जाता है, जहां से ये आपके शहर के पेट्रोल पंपों और गैस एजेंसियों तक पहुंचते हैं.
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Source: IOCL




























